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सिर्फ पुलिस की कहानी से नहीं होगी सजा! FSL रिपोर्ट के बिना ढह गया पूरा केस, अदालत ने आरोपी को किया बरी
अवैध शराब बनाने के आरोप में दर्ज मामला करीब तीन साल तक अदालत में चला, लेकिन जब फैसला आया तो पूरा केस वैज्ञानिक साक्ष्यों के अभाव में धराशायी हो गया। उल्हासनगर कोर्ट ने कहा कि केवल पुलिस अधिकारी की गवाही के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि जब्त पदार्थ वास्तव में शराब था, इसलिए आरोपी को दोषमुक्त किया जाता है।
Sonali27 जुल. 2026, 01:22 PM IST

उल्हासनगर की एक अदालत ने महाराष्ट्र दारूबंदी अधिनियम के तहत दर्ज एक मामले में आरोपी संदीप ज्ञानदेव पाटील को बरी कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल पुलिस अधिकारी की गवाही के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि जब्त किया गया पदार्थ वास्तव में अवैध शराब था। जब्त नमूनों की फॉरेंसिक (FSL/रासायनिक विश्लेषक) रिपोर्ट पेश नहीं की गई और अभियोजन जब्ती से लेकर प्रयोगशाला तक नमूने की सुरक्षित श्रृंखला (Chain of Custody) भी साबित नहीं कर सका। ऐसे में आरोपी के खिलाफ अपराध संदेह से परे सिद्ध नहीं हुआ।
23 जुलाई 2026 को उल्हासनगर के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC), पांचवें न्यायालय की न्यायाधीश पी. ए. माने ने यह फैसला सुनाया। मामला महाराष्ट्र सरकार बनाम संदीप ज्ञानदेव पाटील (क्रिमिनल केस संख्या 3670/2023) से संबंधित था। आरोपी पर महाराष्ट्र दारूबंदी अधिनियम, 1949 की धारा 65(फ) के तहत अवैध शराब निर्माण के लिए सामग्री रखने और शराब बनाने का आरोप लगाया गया था।
मामले के अनुसार 1 मार्च 2023 को हिललाइन पुलिस थाना क्षेत्र में पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी कि अंबरनाथ तालुका के मांगरूल गांव के पास आरोपी कथित रूप से हाथभट्टी शराब बनाने के लिए गुड़ और नवसागर से वॉश तैयार कर रहा है। इसके बाद पुलिस टीम ने छापा मारकर आठ प्लास्टिक ड्रमों में भरा कथित वॉश और शराब बनाने के उपकरण बरामद करने का दावा किया तथा आरोपी के खिलाफ अपराध दर्ज किया। बाद में जांच पूरी होने पर न्यायालय में आरोपपत्र दाखिल किया गया।
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष केवल एक गवाह—शिकायतकर्ता पुलिस अधिकारी—की गवाही ही प्रस्तुत कर सका। अदालत ने रिकॉर्ड पर पाया कि अभियोजन बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद अन्य गवाहों को पेश नहीं कर पाया। इतना ही नहीं, जब्त किए गए नमूने की रासायनिक विश्लेषण रिपोर्ट भी न्यायालय में प्रस्तुत नहीं की गई।
फैसले में अदालत ने कहा कि महाराष्ट्र दारूबंदी अधिनियम की धारा 65(फ) के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए यह साबित होना आवश्यक है कि जब्त पदार्थ वास्तव में प्रतिबंधित शराब था। इसके लिए वैज्ञानिक परीक्षण रिपोर्ट अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। केवल पुलिस अधिकारी के बयान के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि जब्त पदार्थ शराब ही था। साथ ही अभियोजन यह भी साबित नहीं कर सका कि नमूने को जब्त करने से लेकर प्रयोगशाला भेजने तक उसकी सुरक्षित श्रृंखला बनी रही।
अदालत ने यह भी माना कि घटना के संबंध में किसी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष गवाह का साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया। आरोपी के कब्जे से कथित बरामदगी को लेकर भी अभियोजन पर्याप्त और स्वतंत्र साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। इन परिस्थितियों में आरोपी के खिलाफ आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं हुए।
इन सभी कमियों को देखते हुए अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 255(1) के तहत आरोपी संदीप ज्ञानदेव पाटील को महाराष्ट्र दारूबंदी अधिनियम, 1949 की धारा 65(फ) के आरोप से दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि आरोपी धारा 437-ए के तहत आवश्यक बंधपत्र दाखिल करेगा ताकि यदि राज्य सरकार अपील करती है तो वह अपीलीय अदालत के समक्ष उपस्थित हो सके।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला एक बार फिर इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि किसी भी आपराधिक मामले में अभियोजन पक्ष पर आरोपों को संदेह से परे साबित करने की जिम्मेदारी होती है। विशेष रूप से दारूबंदी कानून से जुड़े मामलों में जब्त पदार्थ की वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट और साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि ये मूलभूत साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराए जाते तो केवल पुलिस की गवाही के आधार पर दोषसिद्धि करना कठिन हो जाता है। यह सिद्धांत महाराष्ट्र दारूबंदी अधिनियम के तहत होने वाले अभियोजन की प्रकृति तथा आपराधिक न्यायशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप भी है।
