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APAAR ID योजना पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त हिदायत: छात्रों का निजी डेटा किसी थर्ड पार्टी से नहीं होगा शेयर, स्कूल नहीं बना सकते दबाव

अगर आप अपने बच्चे के स्कूल में APAAR ID के लिए आधार डिटेल्स जमा करने को लेकर असमंजस में थे, तो सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आपके लिए बड़ी राहत लेकर आया है। अदालत ने ओडिशा हाईकोर्ट के फैसले को पूरे देश में लागू करते हुए मॉडल कंसेंट फॉर्म में "सहमति न देने" (Refusal of Consent) का विकल्प जोड़ना अनिवार्य कर दिया है। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के तहत बच्चों के डिजिटल अधिकारों और निजता की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।

Sonali27 जुल. 2026, 01:22 PM IST
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APAAR ID योजना पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त हिदायत: छात्रों का निजी डेटा किसी थर्ड पार्टी से नहीं होगा शेयर, स्कूल नहीं बना सकते दबाव

नई दिल्ली: बच्चों के आधार (Aadhaar) और शैक्षणिक डेटा की सुरक्षा से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) और APAAR (Automated Permanent Academic Account Registry) योजना लागू करने वाली सभी एजेंसियों को निर्देश दिया है कि पूरे देश में अभिभावकों को अपने बच्चों की APAAR ID बनवाने के लिए आधार विवरण साझा करने से इनकार (Opt-Out/Refusal of Consent) करने का स्पष्ट विकल्प दिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि APAAR योजना के तहत एकत्र की गई किसी भी छात्र की व्यक्तिगत जानकारी कानून में निर्धारित परिस्थितियों को छोड़कर किसी निजी संस्था या तीसरे पक्ष के साथ साझा नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि बच्चों के डेटा की सुरक्षा और अभिभावकों की स्वतंत्र सहमति सुनिश्चित करना अनिवार्य है।

यह आदेश 20 जुलाई 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने पारित किया। आदेश बाद में सार्वजनिक किया गया।

क्या है APAAR योजना?

APAAR (Automated Permanent Academic Account Registry) राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत शुरू की गई एक डिजिटल व्यवस्था है। इसके तहत प्रत्येक छात्र को एक यूनिक आजीवन अकादमिक आईडी दी जाती है, जिसमें उसकी पढ़ाई, परीक्षा परिणाम, प्रमाणपत्र, छात्रवृत्ति और अन्य शैक्षणिक उपलब्धियों का डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाता है।

सरकार का कहना है कि इससे स्कूल बदलने, प्रमाणपत्र सत्यापन, छात्रवृत्ति और शैक्षणिक रिकॉर्ड के प्रबंधन में आसानी होगी। हालांकि योजना में आधार से जुड़ी जानकारी और बच्चों के व्यक्तिगत डेटा के उपयोग को लेकर कई अभिभावकों ने निजता संबंधी चिंताएं जताई थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी योजना को स्वैच्छिक (Voluntary) बताया जा रहा है तो केवल सहमति लेने वाला कॉलम पर्याप्त नहीं है। अभिभावकों को स्पष्ट रूप से "सहमति देने" और "सहमति से इनकार करने" दोनों विकल्प मिलने चाहिए।

अदालत ने कहा,

"ऐसा सुरक्षा उपाय आवश्यक है ताकि सहमति वास्तव में स्वतंत्र, सूचित और सार्थक मानी जा सके।"

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा हाईकोर्ट के 12 दिसंबर 2025 के फैसले के पैरा-19 को पूरे देश में लागू करने का निर्देश दिया।

ओडिशा हाईकोर्ट ने क्या कहा था?

ओडिशा हाईकोर्ट ने 'रोहित आनंद दास बनाम राज्य ओडिशा' मामले में कहा था कि APAAR के मॉडल कंसेंट फॉर्म में संशोधन कर अभिभावकों को स्पष्ट रूप से "ऑप्ट-आउट" या "सहमति से इनकार" करने का विकल्प दिया जाए।

हाईकोर्ट ने कहा था कि यदि योजना वास्तव में स्वैच्छिक है, तो अभिभावकों के पास पहले ही चरण में इंकार करने का अधिकार भी होना चाहिए।

याचिकाकर्ताओं ने क्या दलील दी?

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि APAAR योजना छात्रों की पूरी शैक्षणिक यात्रा का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करती है, जिससे भविष्य में उनकी प्रोफाइलिंग, ट्रैकिंग और निगरानी की आशंका पैदा हो सकती है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि बड़ी मात्रा में बच्चों का व्यक्तिगत डेटा लंबे समय तक संग्रहित किया जाएगा, जिससे निजता और डेटा सुरक्षा के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। याचिका में यह भी कहा गया कि यदि APAAR ID को व्यवहारिक रूप से अनिवार्य बना दिया जाता है, तो यह शिक्षा के अधिकार और आधार पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों की भावना के विपरीत होगा।

सुनवाई के दौरान क्या हुई अहम बहस?

सुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने दलील दी कि बच्चों को एक गैर-सांविधिक (Non-Statutory) योजना में शामिल होने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से बाध्य नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि मौजूदा सहमति फॉर्म में अभिभावकों के पास वास्तविक विकल्प नहीं है और यह डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। याचिका में "राइट टू बी फॉरगॉटन", डेटा वापस लेने के अधिकार (Withdrawal of Consent) और बच्चों के संवेदनशील डेटा की सुरक्षा जैसे मुद्दे भी उठाए गए।

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की दलील पर क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि APAAR योजना का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था को डिजिटल और अधिक प्रभावी बनाना है तथा इसके कई संभावित लाभ हैं। अदालत ने कहा कि किसी भी सरकारी पहल को केवल संदेह की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए।

हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अच्छी मंशा होने के बावजूद योजना को संविधान, निजता के अधिकार और डेटा सुरक्षा कानूनों के अनुरूप लागू करना सरकार की जिम्मेदारी है।

छात्रों की पढ़ाई पर नहीं पड़ेगा कोई असर

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई अभिभावक अपने बच्चे के लिए APAAR ID नहीं बनवाना चाहता या आधार विवरण साझा करने से इनकार करता है, तो इसका असर छात्र के प्रवेश, परीक्षा, परिणाम, छात्रवृत्ति, अंकपत्र या किसी अन्य शैक्षणिक सुविधा पर नहीं पड़ना चाहिए। योजना स्वैच्छिक है और किसी भी छात्र को इससे वंचित नहीं किया जा सकता।

डेटा सुरक्षा पर अदालत की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए कि APAAR योजना प्रशासनिक आदेश के तहत लागू की गई है, सरकार डेटा सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो जाती।

अदालत ने स्पष्ट किया कि APAAR योजना के तहत डेटा का संग्रह, प्रोसेसिंग, स्टोरेज, उपयोग और साझा करना केवल डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के अनुरूप होगा। डेटा का उपयोग केवल उसी उद्देश्य तक सीमित रहेगा जिसके लिए उसे एकत्र किया गया है।

फैसले का महत्व

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल APAAR योजना तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों के डिजिटल अधिकार, अभिभावकों की सूचित सहमति, डेटा गोपनीयता और सरकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर व्यक्तिगत जानकारी के उपयोग से जुड़े मामलों में भी महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा।

यह आदेश स्पष्ट करता है कि भविष्य में किसी भी डिजिटल सरकारी योजना में नागरिकों की निजता, स्वतंत्र सहमति और डेटा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।