crime
तकनीकी चूक से नहीं बचेगा दोषी: POCSO की उपधारा का उल्लेख छूटने पर भी सजा रहेगी बरकरार, सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने POCSO मामलों में कानून की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि फैसले में किसी विशेष उपधारा का उल्लेख छूट जाना मात्र तकनीकी त्रुटि है। यदि अभियोजन के साक्ष्य यह साबित करते हैं कि अपराध संबंधित प्रावधान के दायरे में आता है, तो दोषसिद्धि और सजा को केवल इसी आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता। त्रिपुरा के एक मामले में अदालत ने इसी सिद्धांत को लागू करते हुए आरोपी की 20 वर्ष की सजा बरकरार रखी।
Sonali27 जुल. 2026, 01:23 PM IST

सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने 24 जुलाई 2026 को त्रिपुरा के एक POCSO मामले में यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। मामला त्रिपुरा का है, जहां आरोपी सुप्तान मराक (Suptan Marak) पर 16 वर्ष से कम आयु की एक नाबालिग बच्ची के साथ पेनेट्रेटिव यौन हमला (Penetrative Sexual Assault) करने का आरोप था। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को POCSO Act और भारतीय दंड संहिता (IPC) के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत दोषी ठहराते हुए कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। बाद में त्रिपुरा हाई कोर्ट ने भी दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
अपील में आरोपी की ओर से दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट के सजा आदेश में POCSO Act की धारा 4(2) का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था, इसलिए उसे दी गई सजा कानूनन टिक नहीं सकती। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि रिकॉर्ड से यह निर्विवाद रूप से साबित है कि पीड़िता की उम्र 16 वर्ष से कम थी और आरोपी ने उसके साथ पेनेट्रेटिव यौन हमला किया था। ऐसी स्थिति में POCSO Act की धारा 4(2) स्वतः लागू होती है, जिसमें न्यूनतम 20 वर्ष के कठोर कारावास का प्रावधान है।
अदालत ने कहा कि यदि आरोप, साक्ष्य और रिकॉर्ड किसी विशेष उपधारा को स्पष्ट रूप से आकर्षित करते हैं, तो केवल उस उपधारा का उल्लेख फैसले में छूट जाने जैसी तकनीकी त्रुटि के आधार पर दोषसिद्धि या सजा को अवैध नहीं ठहराया जा सकता। न्यायालय ने यह भी कहा कि अभियुक्त को आरोपों की पूरी जानकारी थी और उसे अपना बचाव करने का पर्याप्त अवसर मिला था, इसलिए उसके अधिकारों का कोई हनन नहीं हुआ।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी के पक्ष में प्रस्तुत कुछ परिस्थितियों, जैसे उसका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड न होना और जेल में संतोषजनक आचरण, पर भी विचार किया। इसके बावजूद अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 4(2) के तहत निर्धारित न्यूनतम सजा से कम दंड नहीं दिया जा सकता। इसलिए अदालत ने सजा को संशोधित करते हुए 20 वर्ष के कठोर कारावास तक सीमित कर दिया, जो इस प्रावधान के तहत न्यूनतम अनिवार्य सजा है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि गंभीर यौन अपराधों के मामलों में केवल तकनीकी त्रुटियों के आधार पर दोषसिद्धि को निरस्त नहीं किया जा सकता, यदि रिकॉर्ड और साक्ष्य अपराध को स्पष्ट रूप से सिद्ध करते हों।
