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अमेरिका में पढ़ने वाले छात्रों के लिए बड़ी खबर, 15 सितंबर से बदलेंगे इमिग्रेशन नियम
अमेरिका में पढ़ने वाले भारतीय और अन्य अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए 15 सितंबर 2026 से इमिग्रेशन नियमों में बड़ा बदलाव प्रस्तावित है। नई व्यवस्था में F-1 और J-1 छात्रों के लिए मौजूदा Duration of Status प्रणाली की जगह निश्चित अवधि के आधार पर अमेरिका में रहने की व्यवस्था लागू की जाएगी। छात्रों को अपने I-94 रिकॉर्ड में दर्ज अधिकृत रहने की अवधि पर विशेष ध्यान देना होगा और जरूरत पड़ने पर समय रहते एक्सटेंशन की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इस बदलाव से छात्रों को अपनी पढ़ाई, यात्रा, OPT और इमिग्रेशन स्टेटस की योजना पहले से अधिक सावधानी से बनानी होगी।

नई दिल्ली: अमेरिका में पढ़ाई कर रहे अंतरराष्ट्रीय छात्रों, खासकर F-1 वीजा पर रहने वाले विद्यार्थियों के लिए 15 सितंबर 2026 की तारीख बेहद महत्वपूर्ण होने जा रही है। अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) ने एक नया अंतिम नियम जारी किया है, जिसके तहत अंतरराष्ट्रीय छात्रों और एक्सचेंज विजिटर्स के अमेरिका में रहने की अवधि तय करने के मौजूदा तरीके में बड़ा बदलाव किया जाएगा। नई व्यवस्था में लंबे समय से लागू Duration of Status यानी D/S मॉडल को हटाकर छात्रों को एक निश्चित अवधि के लिए प्रवेश देने की व्यवस्था लागू की जाएगी। यह नियम 15 सितंबर 2026 से प्रभावी होने वाला है।
इस बदलाव के मद्देनजर अमेरिका की कई यूनिवर्सिटीज ने अपने अंतरराष्ट्रीय छात्रों को समय रहते अमेरिका लौटने और अपनी यूनिवर्सिटी के इंटरनेशनल स्टूडेंट ऑफिस से संपर्क में रहने की सलाह दी है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर छात्र के लिए 15 सितंबर से पहले अमेरिका पहुंचना कानूनी रूप से अनिवार्य है। सलाह का मुख्य उद्देश्य यह है कि जो छात्र नए नियम लागू होने से पहले अमेरिका में मौजूद रहेंगे, वे संक्रमण संबंधी प्रावधानों के तहत कुछ महत्वपूर्ण सुविधाएं और सुरक्षा बनाए रख सकें। छात्रों को अपनी व्यक्तिगत स्थिति के अनुसार यूनिवर्सिटी के Designated School Official यानी DSO से सलाह लेने की जरूरत होगी।
क्या है Duration of Status व्यवस्था और क्या बदलेगा
अब तक F-1 छात्र आम तौर पर अपने Form I-20 में दर्ज कार्यक्रम की अवधि तक अमेरिका में रह सकते थे, बशर्ते वे अपनी पढ़ाई और वीजा स्टेटस की शर्तों का पालन करते रहें। अमेरिकी प्रवेश रिकॉर्ड में ऐसे छात्रों के लिए D/S यानी Duration of Status दर्ज किया जाता था। नए नियम के तहत यह व्यवस्था समाप्त होगी और अमेरिका में प्रवेश करने वाले छात्रों को एक निश्चित Admit Until Date दी जाएगी, जो उनके I-94 रिकॉर्ड में दर्ज होगी। तय तारीख तक छात्र को या तो अमेरिका से बाहर जाना होगा या पात्र होने पर अपने स्टे की अवधि बढ़ाने के लिए आवेदन करना होगा।
नई व्यवस्था में सामान्य तौर पर प्रवेश की अवधि चार साल तक सीमित हो सकती है। यदि किसी छात्र का कोर्स चार साल से अधिक लंबा है या वह निर्धारित अवधि में अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाता है, तो उसे अमेरिका में अपनी कानूनी स्थिति बनाए रखने के लिए Extension of Stay की प्रक्रिया अपनानी पड़ सकती है। इससे खासतौर पर लंबे PhD, रिसर्च और कुछ विशेष अकादमिक कार्यक्रमों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए अतिरिक्त प्रशासनिक प्रक्रिया बढ़ सकती है।
मौजूदा छात्रों के लिए क्या है व्यवस्था
नए नियम का असर केवल भविष्य में अमेरिका जाने वाले छात्रों पर ही नहीं पड़ेगा, बल्कि मौजूदा F-1 और J-1 स्टेटस धारकों के लिए भी संक्रमण संबंधी प्रावधान महत्वपूर्ण होंगे। उपलब्ध विश्वविद्यालयी मार्गदर्शन के अनुसार, जो F-1 छात्र 15 सितंबर 2026 को अमेरिका में D/S स्टेटस के तहत मौजूद होंगे और अपनी स्थिति बनाए रखेंगे, उन्हें कुछ परिस्थितियों में अपने मौजूदा कार्यक्रम या OPT की अवधि तक रहने की अनुमति मिल सकती है। हालांकि, यह सुरक्षा सभी परिस्थितियों में एक जैसी नहीं होगी और यात्रा करने या अमेरिका से बाहर निकलने के बाद दोबारा प्रवेश करने पर नियम अलग तरीके से लागू हो सकते हैं। इसलिए किसी भी अंतरराष्ट्रीय यात्रा से पहले छात्रों को अपनी यूनिवर्सिटी के अंतरराष्ट्रीय छात्र कार्यालय से व्यक्तिगत सलाह लेने की जरूरत है।
एक महत्वपूर्ण बदलाव यह भी है कि 15 सितंबर के बाद अमेरिका में प्रवेश करने वाले F-1 और F-2 छात्रों को I-94 पर निश्चित Admit Until Date मिल सकती है। इसका मतलब है कि छात्रों को अपने I-94 रिकॉर्ड की तारीख पर विशेष ध्यान देना होगा। वीजा की वैधता और अमेरिका में रहने की अधिकृत अवधि एक ही चीज नहीं होती; अमेरिका पहुंचने पर प्रवेश और अधिकृत रहने की अवधि का अंतिम निर्धारण संबंधित अमेरिकी इमिग्रेशन अधिकारी और I-94 रिकॉर्ड के आधार पर होता है।
छात्रों के लिए एक और अहम बदलाव
नई नीति के तहत F-1 छात्रों के लिए अमेरिका में पढ़ाई के दौरान अकादमिक कार्यक्रम बदलने और यूनिवर्सिटी ट्रांसफर से जुड़े नियम भी अधिक सख्त किए जा रहे हैं। उपलब्ध विश्वविद्यालयी विश्लेषण के अनुसार, अंडरग्रेजुएट छात्रों के लिए पहले अकादमिक वर्ष में स्कूल ट्रांसफर या मेजर बदलने पर अतिरिक्त सीमाएं लागू हो सकती हैं, जबकि ग्रेजुएट छात्रों के लिए भी शैक्षणिक उद्देश्य बदलने और संस्थान बदलने से संबंधित नए प्रतिबंध सामने आए हैं। हालांकि, कुछ असाधारण परिस्थितियों में अपवाद की व्यवस्था हो सकती है।
इसके अलावा, F-1 छात्रों के लिए पढ़ाई पूरी होने के बाद अमेरिका में रहने की ग्रेस पीरियड अवधि को भी 60 दिनों से घटाकर 30 दिन करने का प्रावधान बताया गया है। इसका अर्थ है कि कोर्स पूरा होने के बाद छात्रों को आगे की योजना बनाने, OPT या अन्य पात्र इमिग्रेशन प्रक्रिया पूरी करने और अमेरिका से बाहर जाने के लिए पहले की तुलना में कम समय मिल सकता है।
भारतीय छात्रों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव
अमेरिका भारतीय छात्रों के लिए दुनिया के सबसे लोकप्रिय उच्च शिक्षा गंतव्यों में से एक है। बड़ी संख्या में भारतीय विद्यार्थी अमेरिका में इंजीनियरिंग, कंप्यूटर साइंस, डेटा साइंस, बिजनेस, मेडिकल रिसर्च और अन्य क्षेत्रों में पढ़ाई करते हैं। इसलिए वीजा और इमिग्रेशन नियमों में किसी भी बड़े बदलाव का सीधा असर भारतीय छात्रों की पढ़ाई, यात्रा, इंटर्नशिप, OPT और भविष्य के रोजगार की योजनाओं पर पड़ सकता है।
नई व्यवस्था का सबसे बड़ा असर उन छात्रों पर पड़ सकता है जिनके अकादमिक कार्यक्रम में देरी होती है या जिन्हें अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय की जरूरत पड़ती है। पहले D/S व्यवस्था में छात्र अपने वैध स्टेटस और अकादमिक कार्यक्रम की शर्तों का पालन करते हुए अपेक्षाकृत अधिक लचीले तरीके से पढ़ाई जारी रख सकते थे। अब निश्चित समय सीमा और संभावित Extension of Stay प्रक्रिया के कारण छात्रों को अपनी अकादमिक योजना और इमिग्रेशन स्थिति की अधिक सावधानी से निगरानी करनी होगी।
इस बदलाव का उद्देश्य क्या है
अमेरिकी प्रशासन की ओर से इस तरह के बदलावों का उद्देश्य इमिग्रेशन सिस्टम की निगरानी को मजबूत करना, छात्रों के स्टेटस को अधिक स्पष्ट समयसीमा से जोड़ना और संभावित वीजा उल्लंघनों या ओवरस्टे को नियंत्रित करना बताया जा रहा है। निश्चित प्रवेश अवधि से सरकार के लिए यह ट्रैक करना आसान हो सकता है कि किसी छात्र का अमेरिका में रहने का अधिकृत समय कब समाप्त हो रहा है और उसे आगे रहने के लिए किस प्रक्रिया का पालन करना होगा।
हालांकि, शिक्षा क्षेत्र से जुड़े संगठनों और विश्वविद्यालयों को चिंता है कि अतिरिक्त प्रशासनिक प्रक्रियाएं अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए अनिश्चितता बढ़ा सकती हैं। विशेष रूप से PhD और लंबे रिसर्च कार्यक्रमों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए समय सीमा और एक्सटेंशन की प्रक्रिया अतिरिक्त परेशानी पैदा कर सकती है। विश्वविद्यालयों का यह भी मानना है कि इमिग्रेशन नियमों में अधिक कठोरता अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के आकर्षण और उच्च शिक्षा संस्थानों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकती है।
छात्रों को अभी क्या करना चाहिए
15 सितंबर 2026 से पहले अमेरिका जाने या लौटने की योजना बना रहे छात्रों को अपनी यूनिवर्सिटी की ओर से जारी आधिकारिक सलाह को ध्यान से पढ़ना चाहिए। उन्हें अपने पासपोर्ट, वीजा, I-20 या DS-2019, I-94 रिकॉर्ड और अन्य जरूरी दस्तावेजों की स्थिति जांचनी चाहिए। जिन छात्रों की पढ़ाई, OPT, STEM OPT, यूनिवर्सिटी ट्रांसफर या विदेश यात्रा से जुड़ी कोई विशेष परिस्थिति है, उन्हें अपने DSO या अंतरराष्ट्रीय छात्र कार्यालय से व्यक्तिगत सलाह लेनी चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 15 सितंबर की तारीख को लेकर छात्रों को केवल सोशल मीडिया या अनौपचारिक खबरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। अमेरिकी इमिग्रेशन नियम व्यक्तिगत परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग प्रभाव डाल सकते हैं। इसलिए यात्रा या स्टेटस से जुड़ा कोई बड़ा फैसला लेने से पहले आधिकारिक DHS/USCIS निर्देश और अपनी यूनिवर्सिटी की सलाह देखना जरूरी होगा।
कुल मिलाकर, 15 सितंबर 2026 से लागू होने वाला DHS का नया नियम अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के इमिग्रेशन सिस्टम में एक बड़ा बदलाव है। Duration of Status मॉडल की जगह निश्चित अवधि की व्यवस्था आने से छात्रों को अपने I-94 की अंतिम तारीख, स्टेटस और एक्सटेंशन प्रक्रिया पर पहले से ज्यादा ध्यान देना होगा। भारतीय छात्रों के लिए यह बदलाव खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका में पढ़ने वाले बड़ी संख्या में भारतीय विद्यार्थियों की पढ़ाई और करियर योजनाएं इन नियमों से प्रभावित हो सकती हैं। हालांकि नई व्यवस्था का उद्देश्य इमिग्रेशन निगरानी और नियमों के पालन को मजबूत करना है, लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि विश्वविद्यालय, छात्र और अमेरिकी प्रशासन संक्रमण के दौरान इन नए नियमों को कितनी स्पष्टता और प्रभावी तरीके से लागू करते हैं।
