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विदेशी शोधकर्ताओं को भी भा रही संत ज्ञानेश्वर-तुकाराम की वाणी, अपनी भाषा में कर रहे अभंगों का अनुवाद
संत ज्ञानेश्वर की 'ज्ञानेश्वरी' और संत तुकाराम की 'अभंगगाथा' का प्रभाव अब दुनिया के कई देशों तक पहुंच चुका है। फ्रांस, इंग्लैंड, जर्मनी और स्पेन सहित अनेक देशों के शोधकर्ताओं ने मराठी सीखकर वारकरी परंपरा का अध्ययन किया और अभंगों व ओवियों का अपनी-अपनी भाषाओं में अनुवाद किया। संत साहित्य में निहित मानवता, समानता और विश्वबंधुत्व का संदेश आज भी विदेशी विद्वानों को आकर्षित कर रहा है।
Priyanka Gaikwad27 जुल. 2026, 01:23 PM IST

पुणे से सामने आई जानकारी के अनुसार, वर्ष 1950 में फ्रांस से आए फादर जी. ए. डेल्यूरि ने संत साहित्य के प्रसिद्ध विद्वान और ज्ञानेश्वरी के भाष्यकार मामासाहेब दांडेकर से मार्गदर्शन लेकर मराठी भाषा सीखी और ज्ञानेश्वरी का गहन अध्ययन किया। बाद में उन्होंने वारकरी संप्रदाय और संत साहित्य पर महत्वपूर्ण शोध कार्य किया।
इतिहास में इससे पहले भी इंग्लैंड से भारत आए जेसुइट मिशनरी फादर थॉमस स्टीफंस ने मराठी भाषा को अपनाते हुए 'ख्रिस्तपुराण' की रचना की थी। विद्वानों का मानना है कि इस ग्रंथ पर मराठी संत साहित्य और ओवी परंपरा का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
पूर्व विधायक उल्हास पवार का कहना है कि आज भी आषाढ़ी वारी में कई विदेशी शोधकर्ता शामिल होते हैं। शुरुआत में वे वारी की परंपरा और अनुशासन से प्रभावित होते हैं, लेकिन अभंगों और ओवियों का अर्थ समझने के बाद उन्हें संत साहित्य का गहरा आध्यात्मिक और मानवीय संदेश आकर्षित करता है।
संत साहित्य के अध्येता डॉ. दिलीप शेठ के अनुसार, संत ज्ञानेश्वर ने 'पसायदान' के माध्यम से संपूर्ण मानवता के कल्याण की कामना की थी। यही सार्वभौमिक विचार आज भी दुनिया भर के शोधकर्ताओं को प्रेरित करता है। उनके अनुसार, संत ज्ञानेश्वर की ज्ञानेश्वरी और संत तुकाराम की अभंगगाथा केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानवता, समानता और विश्वबंधुत्व का संदेश देने वाला वैश्विक दर्शन हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि वारकरी परंपरा और संत साहित्य पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार शोध हो रहा है। कई विदेशी विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों ने ज्ञानेश्वरी, अभंग साहित्य और वारकरी परंपरा को भारतीय आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना है।
