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नाबालिग से छेड़छाड़ और POCSO के आरोपों में आरोपी बरी, कल्याण की FTSC अदालत ने कहा- अभियोजन आरोप साबित करने में नाकाम

कल्याण की FTSC अदालत ने नाबालिग छात्रा से छेड़छाड़, नशीला पदार्थ पिलाने, आपत्तिजनक तस्वीरें खींचने और धमकी देने के आरोपों में आरोपी स्केटिंग शिक्षक को बरी कर दिया। अदालत ने माना कि पीड़िता के नाबालिग होने का तथ्य साबित हुआ, लेकिन 10 महीने की FIR देरी, बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास और कथित तस्वीरों व नशीले पदार्थ से जुड़ा ठोस साक्ष्य न मिलने के कारण अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।

Sonali27 जुल. 2026, 01:23 PM IST
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नाबालिग से छेड़छाड़ और POCSO के आरोपों में आरोपी बरी, कल्याण की FTSC अदालत ने कहा- अभियोजन आरोप साबित करने में नाकाम
 महाराष्ट्र के कल्याण में नाबालिग छात्रा से कथित छेड़छाड़, नशीला पदार्थ पिलाने, आपत्तिजनक तस्वीरें खींचने और धमकी देने के मामले में अदालत ने आरोपी को बरी कर दिया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (FTSC), कल्याण की अदालत ने 24 जुलाई 2026 को दिए फैसले में आरोपी कुलदीप दयालु सागर को IPC की धारा 354, 328 और 506 तथा POCSO Act की धारा 8, 10 और 12 के तहत लगाए गए सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को उचित और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर संदेह से परे साबित नहीं कर सका।

क्या था पूरा मामला?
अभियोजन के अनुसार, आरोपी एक स्केटिंग अकादमी में शिक्षक था और पीड़िता उसकी छात्रा थी। आरोप था कि सितंबर 2017 में आरोपी ने स्केटिंग प्रतियोगिता में शामिल होने के बहाने नाबालिग छात्रा को अपने साथ ले गया। अभियोजन का दावा था कि रास्ते में एक होटल में उसे जूस दिया गया, जिसमें कथित तौर पर नशीला पदार्थ मिलाया गया था। इसके बाद छात्रा के अर्ध-बेहोशी की स्थिति में होने का फायदा उठाकर आरोपी ने उसकी आपत्तिजनक तस्वीरें खींचीं और उसके साथ कथित तौर पर अभद्र व्यवहार किया। अभियोजन के मुताबिक, बाद में आरोपी ने कथित तस्वीरों को लेकर छात्रा को धमकाया भी। इसके बाद छात्रा ने अपनी मां को घटना की जानकारी दी और 10 जुलाई 2018 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। इस शिकायत के आधार पर बाजरपेठ पुलिस स्टेशन में Crime No. 114/2018 दर्ज किया गया और जांच के बाद आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई।

अदालत ने माना कि पीड़िता नाबालिग थी
फैसले में अदालत ने पीड़िता की उम्र को लेकर अभियोजन का पक्ष स्वीकार किया। स्कूल रिकॉर्ड और जन्म प्रमाणपत्र से संबंधित दस्तावेजों के आधार पर अदालत ने माना कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी। फैसले में दर्ज जन्मतिथि 11 अक्टूबर 2001 बताई गई है और अदालत ने कहा कि अभियोजन ने उम्र का तथ्य पर्याप्त रूप से स्थापित किया। हालांकि, नाबालिग होने का तथ्य साबित होने के बावजूद अदालत ने बाकी आरोपों को साबित मानने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि आपराधिक मामले में आरोपों को संदेह से परे साबित करने का दायित्व अभियोजन पर रहता है।

FIR में 10 महीने की देरी बनी अहम वजह
अदालत ने फैसले में इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना कि कथित घटना सितंबर 2017 की थी, जबकि FIR 10 जुलाई 2018 को दर्ज हुई। यानी शिकायत दर्ज कराने में 10 महीने से अधिक की देरी हुई। अदालत ने कहा कि इस देरी के कारण कथित नशीले पदार्थ और अन्य संबंधित भौतिक साक्ष्य जुटाना मुश्किल हो गया था। जांच अधिकारी ने भी माना कि देरी के कारण संबंधित सामग्री जांच में सामने नहीं लाई जा सकी। आरोपी और पीड़िता के मोबाइल फोन जब्त किए गए थे तथा तकनीकी जांच भी की गई, लेकिन अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार आरोपी के खिलाफ आरोपों को पुष्ट करने वाला कोई आपत्तिजनक तकनीकी साक्ष्य नहीं मिला।

कथित आपत्तिजनक तस्वीरें भी बरामद नहीं हुईं
मामले में कथित तौर पर सबसे महत्वपूर्ण आरोप यह था कि आरोपी ने नाबालिग की आपत्तिजनक तस्वीरें खींचीं और बाद में उन्हीं तस्वीरों को वायरल करने की धमकी दी। लेकिन अदालत ने पाया कि ऐसी कोई तस्वीर जांच के दौरान बरामद नहीं हुई और न ही उन्हें चार्जशीट में साक्ष्य के रूप में पेश किया गया। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि आरोपी और पीड़िता दोनों के मोबाइल फोन जब्त किए गए थे, लेकिन कथित तस्वीरों से संबंधित कोई ठोस साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं आया। इसलिए इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी।

बयानों में भी मिलीं महत्वपूर्ण असंगतियां
अदालत ने पीड़िता के अलग-अलग बयानों की तुलना करते हुए कई महत्वपूर्ण असंगतियों का उल्लेख किया। फैसले के अनुसार, पुलिस के समक्ष दिए गए बयान, मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज बयान और अदालत में दिए गए बयान के बीच कुछ महत्वपूर्ण अंतर पाए गए।
विशेष रूप से, पीड़िता द्वारा घटना की जानकारी अपनी दोस्त को दिए जाने के संबंध में भी अदालत ने विरोधाभास पाया। अदालत ने कहा कि धारा 164 CrPC के बयान में इस तरह के खुलासे का उल्लेख नहीं था, जबकि अदालत में दिए गए बयान में अलग स्थिति सामने आई।

घटना स्थल की पहचान को लेकर भी सवाल
अदालत ने यह भी नोट किया कि कथित घटना जिस जूस सेंटर में हुई बताई गई थी, पीड़िता घटनास्थल का पंचनामा तैयार किए जाने के दौरान उस स्थान की पहचान नहीं कर सकी। अदालत ने इस तथ्य को भी अभियोजन के मामले में महत्वपूर्ण कमी के रूप में देखा।  अभियोजन के पास पीड़िता की गवाही के अलावा पर्याप्त corroboration नहीं अदालत ने कहा कि मामले में पीड़िता की मां और उसकी दोस्त ने मुख्य रूप से पीड़िता से मिली जानकारी के आधार पर गवाही दी थी। वहीं कथित आपत्तिजनक तस्वीरों की बरामदगी, नशीला पदार्थ दिए जाने और धमकी से जुड़े आरोपों को पुष्ट करने वाला स्वतंत्र साक्ष्य रिकॉर्ड पर पर्याप्त रूप से नहीं आया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यौन अपराध के मामलों में पीड़िता की विश्वसनीय गवाही के आधार पर दोषसिद्धि संभव है, लेकिन जब गवाही में महत्वपूर्ण कमियां या विरोधाभास हों और स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध न हो, तो केवल उसी आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं की जा सकती।

आरोपी को सभी आरोपों से बरी किया गया
अदालत ने अंततः कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। इसके बाद आरोपी कुलदीप दयालु सागर को IPC की धारा 354, 328 और 506 तथा POCSO Act की धारा 8, 10 और 12 के तहत आरोपों से बरी कर दिया गया। अदालत ने उसका जमानत बांड रद्द करते हुए जमानतदार को मुक्त करने का आदेश भी दिया।