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भारत के जंगलों सिर्फ पेड़ों की संख्या नहीं, इंसान और प्रकृति के बदलते रिश्ते की भी कहानी

भारत के जंगलों की कहानी केवल वन क्षेत्र बढ़ने या घटने के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, मानव समाज, आदिवासी समुदायों, आर्थिक विकास और बदलती पर्यावरणीय नीतियों के बीच लंबे रिश्ते को दर्शाती है। देश में वन और वृक्ष आवरण में वृद्धि के सकारात्मक संकेत जरूर हैं, लेकिन प्राकृतिक जंगलों की गुणवत्ता, जैव विविधता, वन्यजीवों के आवास, जल सुरक्षा और स्थानीय समुदायों के अधिकारों को भी समान महत्व देना जरूरी है। जलवायु परिवर्तन के दौर में भारत के लिए ऐसी वन नीति की जरूरत है जो संरक्षण, विकास और स्थानीय आजीविका के बीच संतुलन बनाए और केवल पेड़ लगाने के बजाय स्वस्थ प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को प्राथमिकता दे।

Anshuman Mishra27 जुल. 2026, 01:24 PM IST
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भारत के जंगलों सिर्फ पेड़ों की संख्या नहीं, इंसान और प्रकृति के बदलते रिश्ते की भी कहानी


नई दिल्ली: भारत के जंगलों को समझना केवल यह देखने तक सीमित नहीं हो सकता कि देश में वन क्षेत्र बढ़ रहा है या घट रहा है। जंगलों की असली कहानी इससे कहीं अधिक जटिल है। इसमें हजारों वर्षों से जंगलों पर निर्भर रहे आदिवासी और स्थानीय समुदाय, धार्मिक परंपराएं, औपनिवेशिक वन नीतियां, शिकार, लकड़ी और खनन जैसे आर्थिक हित, विकास परियोजनाएं और आज का जलवायु संकट—सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। डाउन टू अर्थ में प्रकाशित एक विश्लेषण के मुताबिक, पर्यावरण इतिहासकार अरूपज्योति सैकिया और महेश रंगराजन द्वारा संपादित नई पुस्तक India’s Forests इसी लंबे इतिहास को सामने रखती है और बताती है कि भारतीय जंगलों में एक ओर सामाजिक-पर्यावरणीय निरंतरता बनी रही, वहीं दूसरी ओर समय के साथ बड़े बदलाव भी हुए। 


यह दृष्टिकोण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज भारत में जंगलों को लेकर होने वाली बहस अक्सर केवल ‘फॉरेस्ट कवर’ के आंकड़ों तक सीमित रह जाती है। लेकिन किसी क्षेत्र में पेड़ों की संख्या बढ़ना हमेशा यह साबित नहीं करता कि वहां प्राकृतिक जंगल, जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र भी उसी अनुपात में मजबूत हुए हैं। वन क्षेत्र की गुणवत्ता, पेड़ों की प्रजातीय विविधता, जंगल की संरचना, स्थानीय समुदायों की भूमिका और वन्यजीवों के लिए उपलब्ध आवास भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।


भारत के जंगलों का इतिहास और मानव संबंध

भारत में जंगलों और मनुष्यों का रिश्ता हजारों वर्षों पुराना है। आदिवासी और वन-आश्रित समुदायों के लिए जंगल केवल लकड़ी या जमीन का स्रोत नहीं रहे, बल्कि भोजन, औषधि, ईंधन, आजीविका और सांस्कृतिक पहचान का आधार भी रहे हैं। कई समुदायों ने स्थानीय ज्ञान और परंपरागत प्रथाओं के जरिए जंगलों और जैव विविधता का संरक्षण किया है।

डाउन टू अर्थ के लेख में जिस पुस्तक का उल्लेख किया गया है, उसका मुख्य योगदान यही है कि वह जंगलों को केवल एक प्राकृतिक संसाधन के रूप में नहीं देखती, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच लंबे समय से चल रहे रिश्ते को समझने की कोशिश करती है। इसमें अभिलेखीय और क्षेत्रीय शोध के माध्यम से पर्यावरण इतिहास और मानविकी के नजरिए से जंगलों के बदलाव को समझने पर जोर दिया गया है।


औपनिवेशिक दौर में बदली जंगलों की परिभाषा

भारत में जंगलों के साथ संबंधों में बड़ा बदलाव औपनिवेशिक शासन के दौरान आया। ब्रिटिश शासन ने जंगलों को बड़े पैमाने पर राजस्व, लकड़ी और औद्योगिक जरूरतों के संसाधन के रूप में देखा। रेलवे के विस्तार के लिए लकड़ी की मांग, वाणिज्यिक वानिकी और नियंत्रित वन प्रबंधन ने जंगलों के पारंपरिक उपयोग और स्थानीय समुदायों के अधिकारों को प्रभावित किया।


इस दौर में जंगलों को वैज्ञानिक प्रबंधन और प्रशासनिक नियंत्रण के तहत लाने की प्रक्रिया तेज हुई। इससे वन संरक्षण की कुछ संस्थागत व्यवस्थाएं भी विकसित हुईं, लेकिन इसके साथ स्थानीय लोगों के पारंपरिक अधिकारों और संसाधनों तक पहुंच पर प्रतिबंध भी बढ़े। यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आज के वन अधिकार, सामुदायिक वन प्रबंधन और संरक्षण से जुड़े विवादों को समझने में मदद करती है।


आज की तस्वीर: वन क्षेत्र बढ़ा, लेकिन कहानी पूरी नहीं

भारत के मौजूदा वन आंकड़ों को देखें तो तस्वीर मिश्रित है। Forest Survey of India की India State of Forest Report 2023 के अनुसार, देश का कुल forest and tree cover 8,27,357 वर्ग किलोमीटर है, जो भारत के भौगोलिक क्षेत्र का 25.17 प्रतिशत है। इसमें forest cover 7,15,342.61 वर्ग किलोमीटर और tree cover 1,12,014 वर्ग किलोमीटर है। 2021 की तुलना में कुल forest and tree cover में वृद्धि दर्ज की गई। लेकिन इस आंकड़े को जंगलों के स्वास्थ्य का अकेला पैमाना नहीं माना जा सकता। उदाहरण के लिए, ISFR 2023 में मैंग्रोव कवर 4,991.68 वर्ग किलोमीटर दर्ज किया गया, जो 2021 की तुलना में 7.43 वर्ग किलोमीटर की कमी है। रिपोर्ट के अनुसार कुछ राज्यों में मैंग्रोव क्षेत्र बढ़ा, जबकि गुजरात में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई।


यही अंतर बताता है कि ‘कुल हरित क्षेत्र’ और ‘प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र की गुणवत्ता’ को अलग-अलग समझना जरूरी है। किसी इलाके में वृक्षारोपण से पेड़ों का क्षेत्र बढ़ सकता है, लेकिन प्राकृतिक जंगलों की जैव विविधता, स्थानीय प्रजातियों और पारिस्थितिक सेवाओं की पूरी तरह भरपाई केवल पौधे लगाने से नहीं हो सकती।


वनों की गुणवत्ता क्यों है ज्यादा महत्वपूर्ण

एक जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होता। इसमें मिट्टी, जल, सूक्ष्मजीव, पक्षी, कीड़े, स्तनधारी, वनस्पतियां और उनके बीच जटिल संबंध शामिल होते हैं। प्राकृतिक और पुराने जंगल कई ऐसी पारिस्थितिक सेवाएं प्रदान करते हैं जिन्हें कृत्रिम या एकल-प्रजाति वाले वृक्षारोपण से पूरी तरह दोहराना मुश्किल हो सकता है। प्राकृतिक जंगल वर्षा के पानी को रोकने, भूजल पुनर्भरण, मिट्टी संरक्षण और स्थानीय तापमान को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। वे कार्बन को संग्रहित करते हैं और वन्यजीवों को आवास देते हैं। इसलिए वन नीति में केवल क्षेत्रफल बढ़ाने के बजाय जंगलों की गुणवत्ता, निरंतरता और पारिस्थितिक अखंडता को भी प्राथमिकता देना जरूरी है।


जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन से सीधा संबंध

भारत दुनिया के सबसे अधिक जैव विविधता वाले देशों में शामिल है। हिमालय से लेकर पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर के वर्षावनों से लेकर मध्य भारत के साल वनों और पश्चिमी तट के मैंग्रोव तक, देश में अलग-अलग प्रकार के वन पारिस्थितिकी तंत्र मौजूद हैं। जलवायु परिवर्तन के दौर में इन जंगलों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई है। वन कार्बन को अवशोषित और संग्रहित करने में मदद करते हैं, तापमान को नियंत्रित करते हैं और जल चक्र को प्रभावित करते हैं। लेकिन दूसरी तरफ बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, जंगलों में आग, कीटों का प्रकोप और भूमि उपयोग में बदलाव वन पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रहे हैं।


इसलिए भारत की जलवायु नीति और वन संरक्षण नीति को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। स्वस्थ प्राकृतिक वन जलवायु परिवर्तन से निपटने के साथ-साथ स्थानीय समुदायों को भी जल, भोजन और आजीविका की सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं।


आदिवासी और स्थानीय समुदायों की भूमिका

भारत के कई जंगलों में रहने वाले समुदाय पीढ़ियों से प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। इनके पारंपरिक ज्ञान में स्थानीय पौधों, औषधीय वनस्पतियों, जल स्रोतों और वन्यजीवों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी मौजूद है। इसलिए वन संरक्षण को केवल सरकारी नियंत्रण या बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण तक सीमित करना पर्याप्त नहीं है। स्थानीय समुदायों को संरक्षण की प्रक्रिया में भागीदार बनाना और उनके वैध अधिकारों तथा आजीविका की जरूरतों को ध्यान में रखना अधिक टिकाऊ मॉडल तैयार कर सकता है।


इसका मतलब यह नहीं है कि हर मानवीय गतिविधि जंगलों के लिए लाभकारी है। बल्कि चुनौती यह है कि संरक्षण, स्थानीय आजीविका और विकास के बीच ऐसा संतुलन बनाया जाए जिसमें जंगलों की पारिस्थितिक क्षमता कमजोर न हो और समुदायों के अधिकार भी सुरक्षित रहें।


विकास बनाम संरक्षण की पुरानी बहस से आगे बढ़ने की जरूरत

भारत में सड़क, रेलवे, बिजली, खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के विस्तार के साथ वन भूमि के उपयोग को लेकर लगातार विवाद सामने आते रहे हैं। एक ओर देश को आर्थिक विकास और बुनियादी ढांचे की जरूरत है, दूसरी ओर वन क्षेत्र जैव विविधता और जल सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में वन नीति को केवल ‘कितने पेड़ लगाए गए’ या ‘कितना क्षेत्र ग्रीन हुआ’ जैसे आंकड़ों से आगे ले जाना जरूरी है। किसी विकास परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करते समय यह देखना भी जरूरी है कि क्या उससे प्राकृतिक जंगलों का विखंडन होगा, वन्यजीवों के गलियारे प्रभावित होंगे या स्थानीय जल स्रोतों पर असर पड़ेगा।


भारत के जंगलों का इतिहास समझना आज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे वर्तमान पर्यावरण नीतियों को बेहतर तरीके से तैयार करने में मदद मिल सकती है। अगर हम जंगलों को केवल कार्बन स्टॉक या हरित क्षेत्र के आंकड़े के रूप में देखेंगे, तो हम उनके सामाजिक और पारिस्थितिक महत्व के कई पहलुओं को नजरअंदाज कर सकते हैं। यह बात सामने आती है कि भारत के जंगलों में लंबे समय से मानव और प्रकृति के बीच विविध प्रकार के संबंध रहे हैं—पूजा और संरक्षण से लेकर दोहन और विनाश तक। इसी कारण लेख का तर्क है कि पर्यावरण इतिहास के ऐसे अध्ययन केवल जंगलों तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि भारत के wetlands, rivers और coastal ecosystems के लंबे मानव-प्रकृति संबंधों पर भी इसी तरह का शोध होना चाहिए।


आगे की राह क्या हो सकती है

भारत के लिए भविष्य की वन नीति में तीन बातों को विशेष महत्व देना जरूरी है। पहला, वन क्षेत्र के आंकड़ों के साथ जंगलों की गुणवत्ता और जैव विविधता को भी मापा जाए। दूसरा, प्राकृतिक वनों के संरक्षण और पुनर्स्थापन को केवल नए पौधे लगाने से अलग समझा जाए। तीसरा, स्थानीय और आदिवासी समुदायों को वन संरक्षण की योजना और निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी दी जाए। इसके साथ ही, सैटेलाइट निगरानी और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल के साथ जमीनी स्तर के वैज्ञानिक सर्वेक्षण को भी मजबूत करना होगा। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि किसी क्षेत्र में हरित आवरण बढ़ने के पीछे वास्तविक प्राकृतिक पुनर्जनन है, वृक्षारोपण है या भूमि उपयोग में कोई अन्य बदलाव।


कुल मिलाकर, भारत के जंगलों की कहानी एक साथ निरंतरता और बदलाव की कहानी है। सदियों से जंगल मनुष्य की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और जीवन का हिस्सा रहे हैं, लेकिन औपनिवेशिक शासन, औद्योगिकीकरण, विकास और जलवायु परिवर्तन ने इस रिश्ते को लगातार बदला है। आज भारत के वन क्षेत्र के आंकड़ों में कुछ सकारात्मक संकेत जरूर दिखाई देते हैं, लेकिन केवल वन और वृक्ष आवरण बढ़ना पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती प्राकृतिक जंगलों की गुणवत्ता, जैव विविधता, जल सुरक्षा और स्थानीय समुदायों की आजीविका को एक साथ सुरक्षित रखने की है।


इसलिए भारत में वन संरक्षण की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पेड़ हैं, बल्कि यह भी होना चाहिए कि जंगल कितने स्वस्थ हैं, कितनी जैव विविधता बची है, क्या वन्यजीवों के आवास सुरक्षित हैं और क्या जंगलों पर निर्भर समुदायों को उनके अधिकार और आजीविका मिल रही है। यही व्यापक दृष्टिकोण भारत के जंगलों को भविष्य की जलवायु और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच सुरक्षित रखने की सबसे मजबूत नींव बन सकता है।