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Rupee Falls: डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ रुपया, RBI के कदम से मिली राहत

भारतीय रुपया शुक्रवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ₹96.80 तक कमजोर होकर रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच गया। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक तनाव के बीच RBI के संभावित हस्तक्षेप से रुपये को कुछ राहत मिली और यह करीब ₹96.56 प्रति डॉलर पर स्थिर हुआ।

Neha Sharma27 जुल. 2026, 01:24 PM IST
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Rupee Falls: डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ रुपया, RBI के कदम से मिली राहत

नई दिल्ली: भारतीय रुपये पर इस समय वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक परिस्थितियों का दबाव बना हुआ है। शुक्रवार के कारोबार में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ₹96.80 प्रति डॉलर तक कमजोर हुआ, जिससे यह अपने रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच गया। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के संभावित हस्तक्षेप के बाद रुपये को कुछ राहत मिली और कारोबार के दौरान यह करीब ₹96.50 के स्तर तक वापस आया। बाद में रुपया लगभग ₹96.56 प्रति डॉलर पर स्थिर हुआ। RBI की ओर से बाजार में डॉलर की बिक्री को रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। बाजार के जानकारों के मुताबिक, केंद्रीय बैंक की सक्रियता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि रुपया मई में दर्ज ₹96.96 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर के बेहद करीब पहुंच गया था।


RBI के हस्तक्षेप से रुपये को मिला सहारा

शुक्रवार को भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ने के बाद सरकारी बैंकों के जरिए डॉलर की बिक्री देखी गई। बाजार के कारोबारियों ने इसे RBI की ओर से किया गया संभावित हस्तक्षेप बताया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, केंद्रीय बैंक की गतिविधि इस बार सप्ताह के शुरुआती दिनों की तुलना में ज्यादा मजबूत दिखाई दी। RBI आम तौर पर विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप का उद्देश्य रुपये के किसी निश्चित स्तर को बनाए रखना नहीं बताता, बल्कि अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करना उसका प्रमुख लक्ष्य होता है। मौजूदा हालात में भी केंद्रीय बैंक की कार्रवाई को इसी नजरिए से देखा जा रहा है।


कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें बनी बड़ी चुनौती

रुपये पर दबाव बढ़ने के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारणों में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी शामिल है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर तेल की आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं, जिससे कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ सकती है और रुपये पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।


महंगा तेल रुपये के लिए क्यों परेशानी है?

सरल शब्दों में समझें तो भारत को विदेशों से कच्चा तेल खरीदने के लिए डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। यदि तेल की कीमत बढ़ती है तो आयातकों को अधिक डॉलर की जरूरत होती है। अधिक डॉलर की मांग → डॉलर मजबूत → रुपये पर दबाव यही कारण है कि कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी को रुपये के लिए नकारात्मक संकेत माना जाता है।


शेयर बाजार में कमजोरी ने भी बढ़ाई चिंता

रुपये पर दबाव ऐसे समय में आया है जब भारतीय शेयर बाजार भी कमजोर रहा। शुक्रवार को भारतीय इक्विटी बाजारों में गिरावट देखने को मिली और कच्चे तेल की तेजी तथा रुपये की कमजोरी ने निवेशकों की चिंता बढ़ाई। Nifty 50 भी महत्वपूर्ण 23,800 के स्तर से नीचे बंद हुआ। कमजोर शेयर बाजार का असर विदेशी निवेशकों की धारणा पर भी पड़ सकता है। यदि विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालते हैं तो डॉलर की मांग बढ़ सकती है, जिससे रुपये पर और दबाव बन सकता है।


रिकॉर्ड लो के करीब पहुंचा रुपया

रुपये की मौजूदा कमजोरी को इसलिए गंभीरता से देखा जा रहा है क्योंकि भारतीय मुद्रा पहले ही मई 2026 में ₹96.96 प्रति डॉलर का रिकॉर्ड निचला स्तर छू चुकी है। शुक्रवार को ₹96.80 तक की कमजोरी ने रुपये को एक बार फिर उस स्तर के बेहद करीब पहुंचा दिया। हालांकि RBI के हस्तक्षेप के बाद रुपये में सुधार आया और यह रिकॉर्ड निचले स्तर को पार करने से बच गया। बाजार में केंद्रीय बैंक की इस सक्रियता को रुपये में अचानक और तेज गिरावट को रोकने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

 

RBI के पास क्या विकल्प हैं?

रुपये में अत्यधिक कमजोरी को नियंत्रित करने के लिए RBI के पास विदेशी मुद्रा बाजार में कई तरह के विकल्प होते हैं। हाल की रिपोर्टों के अनुसार केंद्रीय बैंक ने स्पॉट मार्केट, फॉरवर्ड मार्केट और नॉन-डिलीवेरेबल फॉरवर्ड (NDF) जैसे विभिन्न बाजारों में सक्रियता दिखाई है। इसके अलावा RBI ने विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने के लिए भी कई कदम उठाए हैं। हाल ही में शुरू की गई FCNR(B) जमा योजना के जरिए विदेशी मुद्रा जुटाने की कोशिशों को शुरुआती स्तर पर अच्छी प्रतिक्रिया मिली है। 17 जुलाई तक इस माध्यम से करीब $20.72 अरब की राशि जुटाई जा चुकी थी। इस तरह RBI एक तरफ रुपये में अत्यधिक गिरावट को रोकने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ देश में डॉलर की उपलब्धता बढ़ाने पर भी ध्यान दे रहा है।


भारत का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत

रुपये पर दबाव के बावजूद भारत का विदेशी मुद्रा भंडार एक सकारात्मक पहलू बना हुआ है। उपलब्ध ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 16 जुलाई को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब $1 अरब बढ़कर $676 अरब हो गया। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार RBI को जरूरत पड़ने पर मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करने के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच प्रदान करता है।


रुपये की कमजोरी का आम लोगों पर क्या असर?

रुपये में गिरावट का असर केवल शेयर बाजार या विदेशी मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहता। यदि रुपया लंबे समय तक कमजोर रहता है तो आयातित वस्तुओं की कीमतों पर असर पड़ सकता है। सबसे पहले कच्चा तेल, फिर पेट्रोलियम से जुड़े उत्पादों और अन्य आयातित सामानों की लागत प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों, विदेश यात्रा करने वाले लोगों और डॉलर में भुगतान करने वाले कारोबारियों पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है। हालांकि रुपये की एक सीमित कमजोरी से निर्यातकों को कुछ फायदा मिल सकता है, क्योंकि विदेशी मुद्रा में मिलने वाली उनकी कमाई को रुपये में बदलने पर अधिक राशि मिलती है।


आगे रुपये के लिए क्या महत्वपूर्ण होगा?

आने वाले दिनों में रुपये की दिशा कई महत्वपूर्ण कारकों पर निर्भर करेगी। इनमें कच्चे तेल की कीमतें, पश्चिम एशिया की स्थिति, विदेशी निवेश, अमेरिकी डॉलर की मजबूती और RBI की बाजार गतिविधियां प्रमुख हैं। अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं और विदेशी निवेश में कमजोरी आती है तो रुपये पर दबाव बना रह सकता है। वहीं, यदि वैश्विक तनाव कम होता है और भारत में विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ता है तो रुपये को राहत मिल सकती है। HDFC Mutual Fund की जुलाई रिपोर्ट के अनुसार, RBI और सरकार के हालिया कदम भारत के Balance of Payments को छोटे घाटे से संभावित रूप से छोटे अधिशेष की ओर ले जा सकते हैं। इससे भविष्य में रुपये पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।


भारतीय रुपया इस समय कच्चे तेल की तेजी, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, कमजोर शेयर बाजार और डॉलर की मांग जैसी कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। शुक्रवार को रुपये का ₹96.80 तक कमजोर होना इस दबाव को दिखाता है। हालांकि, RBI के संभावित हस्तक्षेप ने रुपये को रिकॉर्ड निचले स्तर से बचाने में मदद की और मुद्रा करीब ₹96.56 प्रति डॉलर पर स्थिर हुई। आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक बाजार की दिशा रुपये के लिए सबसे महत्वपूर्ण संकेतक होंगे। साथ ही, RBI की रणनीति और विदेशी पूंजी का प्रवाह यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगा कि भारतीय मुद्रा आगे और कमजोर होती है या मौजूदा स्तरों से सुधार की ओर बढ़ती है।