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‘एक्सपर्ट रिपोर्ट ही अंतिम आधार नहीं’, सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिगों के ट्रायल को लेकर JJB को दिए नए नियम

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि प्रारंभिक मूल्यांकन (Preliminary Assessment) कोई छोटा ट्रायल नहीं है। JJB को यह तय करते समय बच्चे की मानसिक परिपक्वता, सुधार की संभावना और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना होगा कि उसका मुकदमा बालिग की तरह चलेगा या नहीं।

Sonali27 जुल. 2026, 01:24 PM IST
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‘एक्सपर्ट रिपोर्ट ही अंतिम आधार नहीं’, सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिगों के ट्रायल को लेकर JJB को दिए नए नियम
सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने 21 जुलाई 2026 को बिहार के एक हत्या मामले में यह महत्वपूर्ण निर्णय दिया। अदालत ने पटना हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) के आदेश को सही नहीं माना, जिसमें आरोपी को बालिग की तरह ट्रायल से बचाने का निर्णय लिया गया था।

क्या था मामला?
मामला बिहार में मई 2022 में हुई एक कथित हत्या से जुड़ा है। घटना के समय आरोपी की उम्र 16 वर्ष 4 महीने थी। अभियोजन के अनुसार आरोपी ने चाकू से एक युवक का गला काटकर उसकी हत्या कर दी थी और घटना के बाद भागने की कोशिश करते समय उसे पकड़ लिया गया।
प्रारंभिक मूल्यांकन के दौरान जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने माना कि आरोपी में अपराध करने की पर्याप्त मानसिक और शारीरिक क्षमता नहीं थी, इसलिए उसका मुकदमा किशोर के रूप में चलाया जाना चाहिए। हालांकि, पीड़ित पक्ष की अपील पर सत्र न्यायालय ने JJB का आदेश रद्द करते हुए आरोपी को बालिग की तरह ट्रायल का सामना करने का निर्देश दिया। पटना हाईकोर्ट ने भी इस आदेश को बरकरार रखा, जिसके बाद आरोपी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

धारा 15 के तहत क्या होता है प्रारंभिक मूल्यांकन?
जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) एक्ट, 2015 की धारा 15 के अनुसार, यदि 16 से 18 वर्ष की आयु के किसी बच्चे पर ऐसा जघन्य अपराध (Heinous Offence) आरोपित हो, जिसमें न्यूनतम सात वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो, तो जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को प्रारंभिक मूल्यांकन करना होता है। इस दौरान बोर्ड यह जांचता है कि— क्या बच्चे में अपराध करने की मानसिक क्षमता थी? • क्या वह अपने कथित कृत्य के परिणामों को समझने की स्थिति में था? • क्या उसमें अपराध करने की शारीरिक क्षमता थी? • अपराध किन परिस्थितियों में कथित रूप से किया गया?

सुप्रीम कोर्ट ने तय किए चार प्रमुख मानदंड
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 15 में बताए गए चारों मानदंड स्वतंत्र भी हैं और परस्पर जुड़े हुए भी। इसलिए JJB को प्रत्येक पहलू का अलग-अलग और समग्र रूप से मूल्यांकन करना होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रारंभिक मूल्यांकन किसी "मिनी ट्रायल" में नहीं बदलना चाहिए। इस चरण में JJB को यह तय नहीं करना है कि आरोपी दोषी है या निर्दोष। बच्चे के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार और निर्दोषता की कानूनी धारणा (Presumption of Innocence) का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए।

मानसिक क्षमता केवल IQ नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मानसिक क्षमता का अर्थ केवल बुद्धिमत्ता (IQ) नहीं है। इसमें बच्चे की सामाजिक समझ, निर्णय लेने की क्षमता, तर्क करने की योग्यता, संघर्ष को समझने की क्षमता, भावनात्मक परिपक्वता और अपने कार्यों के परिणामों का आकलन करने की क्षमता भी शामिल है।
अदालत ने कहा कि किशोर उम्र में बच्चे जोखिम को समझ सकते हैं, लेकिन कई बार वे भावनात्मक दबाव, दोस्तों के प्रभाव और आवेग पर नियंत्रण नहीं रख पाते। इसलिए इन सभी पहलुओं का मूल्यांकन आवश्यक है।

शारीरिक क्षमता का भी होगा विस्तृत परीक्षण
पीठ ने कहा कि शारीरिक क्षमता का अर्थ केवल शरीर की ताकत या सामान्य शारीरिक विकास नहीं है। JJB को यह भी देखना होगा कि आरोपी अपनी उम्र, शारीरिक बनावट और कथित घटनाक्रम के अनुसार उस प्रकार का अपराध करने में सक्षम था या नहीं।

सिर्फ विशेषज्ञ की रिपोर्ट पर्याप्त नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल मनोवैज्ञानिक या अन्य विशेषज्ञ की रिपोर्ट के आधार पर फैसला देना कानून की मंशा के अनुरूप नहीं है।
अदालत ने कहा कि सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट (SIR) और सोशल बैकग्राउंड रिपोर्ट (SBR) भी प्रारंभिक मूल्यांकन का अनिवार्य हिस्सा हैं। इन रिपोर्टों में बच्चे का पारिवारिक माहौल, शिक्षा, स्कूल रिकॉर्ड, सामाजिक परिस्थितियां, पूर्व व्यवहार और सुधार की संभावना जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां होती हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

विशेषज्ञों की सहायता जरूरी, लेकिन अंतिम फैसला JJB का
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व निर्णय Barun Chandra Thakur बनाम Bholu का हवाला देते हुए कहा कि विशेषज्ञों की सहायता महत्वपूर्ण है, लेकिन उनकी राय अंतिम नहीं मानी जा सकती। JJB को सभी उपलब्ध सामग्री का समग्र मूल्यांकन करके स्वतंत्र निर्णय लेना होगा।
कारण सहित आदेश देना होगा अदालत ने कहा कि यदि JJB किसी किशोर को बालिग की तरह ट्रायल के लिए भेजने का निर्णय लेता है, तो उसे विस्तृत और तर्कसंगत कारण दर्ज करने होंगे। साथ ही यह भी स्पष्ट करना होगा कि सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट और सोशल बैकग्राउंड रिपोर्ट की सिफारिशों को स्वीकार या अस्वीकार करने का आधार क्या था।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का उद्देश्य केवल अपराध की गंभीरता को देखना नहीं है, बल्कि बच्चे की उम्र, मानसिक विकास, सामाजिक परिस्थितियों और उसके सुधार की संभावना को भी समान महत्व देना है। इसलिए प्रत्येक मामले में संतुलित, निष्पक्ष और समग्र दृष्टिकोण अपनाया जाना आवश्यक है।
केस विवरण:
केस टाइटल: X बनाम बिहार राज्य एवं अन्य
फैसले की तारीख: 21 जुलाई 2026
पीठ: न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां
साइटेशन: 2026  (SC) 702