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Mining Water Crisis: दुनिया की 65.7% खनन इकाइयां जल जोखिम की चपेट में, भारत भी प्रभावित
दुनिया में स्वच्छ ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए जरूरी खनिजों की मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इन खनिजों के उत्पादन से जुड़ा खनन उद्योग खुद गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। इंटरनेशनल काउंसिल ऑन माइनिंग एंड मेटल्स (ICMM) की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया की करीब 65.7 प्रतिशत खनन और धातु उत्पादन सुविधाएं कम से कम एक महत्वपूर्ण जल जोखिम के संपर्क में हैं। 12,000 से अधिक खनन सुविधाओं के अध्ययन में जल तनाव, सूखा, बाढ़ और पानी की उपलब्धता में उतार-चढ़ाव को प्रमुख खतरे के रूप में सामने रखा गया है। रिपोर्ट में मध्य भारत को भी ऐसे क्षेत्रों में शामिल किया गया है जहां खनन गतिविधियां कई तरह के जल जोखिमों का सामना कर सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि पानी की कमी और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को नजरअंदाज किया गया तो इसका असर न केवल खनन उद्योग बल्कि वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।

नई दिल्ली: दुनिया के सामने एक ओर स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए महत्वपूर्ण खनिजों की मांग तेजी से बढ़ रही है, तो दूसरी ओर इन खनिजों के उत्पादन से जुड़ा खनन उद्योग खुद बढ़ते जल संकट की चपेट में आता जा रहा है। इंटरनेशनल काउंसिल ऑन माइनिंग एंड मेटल्स (ICMM) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, दुनियाभर में मौजूद करीब 65.7 प्रतिशत खनन और धातु उत्पादन सुविधाएं कम से कम एक महत्वपूर्ण भौतिक जल जोखिम का सामना कर रही हैं। रिपोर्ट में 148 देशों और क्षेत्रों की 12,000 से अधिक खनन और धातु सुविधाओं का विश्लेषण किया गया है। इसमें पानी की कमी, जल तनाव, सूखा, बाढ़ और वर्ष-दर-वर्ष पानी की उपलब्धता में होने वाले बदलाव जैसे प्रमुख जोखिमों को शामिल किया गया है।
यह रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आई है जब दुनिया तेजी से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रही है। इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरी, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और आधुनिक बिजली ग्रिड के विस्तार के लिए तांबा, लिथियम, निकेल, कोबाल्ट, ग्रेफाइट और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की जरूरत बढ़ रही है। लेकिन इन खनिजों का उत्पादन करने वाले कई खनन क्षेत्र पहले से ही पानी की कमी और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से जूझ रहे हैं। ऐसे में वैश्विक ऊर्जा संक्रमण के लिए जरूरी खनिजों की आपूर्ति और सीमित जल संसाधनों के बीच बढ़ता दबाव भविष्य में एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
रिपोर्ट ने किन खनन इकाइयों का किया अध्ययन
ICMM के Global Mining and Metals Water Dataset के तहत दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मौजूद 12,000 से अधिक खनन और धातु उत्पादन सुविधाओं के स्थानों का विश्लेषण किया गया। इसके बाद इन क्षेत्रों को विभिन्न जल जोखिम संकेतकों के साथ मिलाकर देखा गया। अध्ययन में यह पता लगाने की कोशिश की गई कि कौन से खनन क्षेत्र पानी की कमी, अत्यधिक जल उपयोग, सूखे, बाढ़ या पानी की उपलब्धता में अनिश्चितता के कारण भविष्य में प्रभावित हो सकते हैं। रिपोर्ट का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि करीब दो-तिहाई यानी 65.7 प्रतिशत खनन और धातु सुविधाएं कम से कम एक महत्वपूर्ण जल जोखिम के संपर्क में हैं। इसका मतलब है कि दुनिया के खनन उद्योग का एक बड़ा हिस्सा ऐसे क्षेत्रों में काम कर रहा है जहां पानी की उपलब्धता भविष्य में उसके उत्पादन और संचालन को प्रभावित कर सकती है।
जल तनाव बना सबसे बड़ा खतरा
रिपोर्ट के मुताबिक, खनन और धातु क्षेत्र के लिए बेसलाइन जल तनाव सबसे व्यापक जोखिमों में से एक है। करीब 38 प्रतिशत खनन और धातु सुविधाएं ऐसे नदी बेसिनों में स्थित हैं जहां उपलब्ध जल संसाधनों पर पहले से भारी दबाव है।
इन क्षेत्रों में खनन कंपनियों को स्थानीय आबादी, कृषि, उद्योग और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के साथ सीमित जल संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा करनी पड़ सकती है। खनन प्रक्रिया में अयस्क की प्रोसेसिंग, धुलाई, धूल नियंत्रण और अन्य औद्योगिक गतिविधियों के लिए पानी की आवश्यकता होती है। ऐसे में यदि किसी क्षेत्र में पहले से पानी की कमी है, तो खनन गतिविधियों के विस्तार से स्थानीय जल सुरक्षा पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
सूखा बढ़ा सकता है खनन उद्योग की मुश्किलें
सूखा भी दुनिया के खनन क्षेत्रों के लिए तेजी से गंभीर होता जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, करीब 27 प्रतिशत खनन और धातु सुविधाएं सूखे के जोखिम के संपर्क में हैं। अफ्रीका और पश्चिम एशिया में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। रिपोर्ट के अनुसार इन क्षेत्रों में करीब 81 प्रतिशत खनन सुविधाएं उच्च या बहुत उच्च सूखा जोखिम वाले इलाकों में स्थित हैं। जाम्बिया, घाना और उज्बेकिस्तान में रिपोर्ट के अनुसार सभी खनन सुविधाएं उच्च सूखा जोखिम के संपर्क में हैं, जबकि दक्षिण अफ्रीका में यह आंकड़ा 96 प्रतिशत तक पहुंचता है। लंबे समय तक चलने वाला सूखा खनन कंपनियों के लिए पानी की उपलब्धता कम कर सकता है। इसका असर उत्पादन पर पड़ने के साथ-साथ परिचालन लागत बढ़ने और स्थानीय समुदायों के साथ जल संसाधनों को लेकर विवाद की स्थिति पैदा होने के रूप में भी सामने आ सकता है।
सिर्फ पानी की कमी नहीं, बाढ़ भी बड़ा खतरा
खनन उद्योग के लिए पानी का संकट सिर्फ सूखे और कमी तक सीमित नहीं है। अत्यधिक बारिश और बाढ़ भी खनन गतिविधियों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है। ICMM के आंकड़ों के अनुसार, करीब 14 प्रतिशत खनन और धातु सुविधाएं उच्च बाढ़ जोखिम वाले क्षेत्रों में स्थित हैं। एल्यूमिना, एल्यूमीनियम, स्टील और मोलिब्डेनम से जुड़ी सुविधाओं में 24 प्रतिशत से अधिक इकाइयां महत्वपूर्ण बाढ़ जोखिम का सामना कर रही हैं। बाढ़ की स्थिति में खदानों, प्रसंस्करण संयंत्रों, सड़कों, रेलवे, बिजली व्यवस्था और अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है। इसके अलावा, खनन अपशिष्ट और टेलिंग्स के प्रबंधन से जुड़ी संरचनाओं पर भी अत्यधिक बारिश और बाढ़ का दबाव बढ़ सकता है, जिससे पर्यावरणीय जोखिम और गंभीर हो सकते हैं।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह रिपोर्ट
ICMM ने पश्चिमी अमेरिका, चिली, पेरू, दक्षिणी अफ्रीका, उत्तरी चीन, मध्य भारत और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया को ऐसे क्षेत्रों में शामिल किया है जहां खनन गतिविधियां एक से अधिक प्रकार के जल जोखिम का सामना कर सकती हैं।
भारत के संदर्भ में यह रिपोर्ट विशेष महत्व रखती है। देश में कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, मैंगनीज और अन्य खनिजों का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। इनमें से कई खनन क्षेत्र ऐसे इलाकों में हैं जहां कृषि, घरेलू जरूरतों और औद्योगिक गतिविधियों के बीच पानी के उपयोग को लेकर पहले से दबाव मौजूद है। मध्य भारत का कई महत्वपूर्ण खनिजों के उत्पादन में बड़ा योगदान है। ऐसे में यदि जलवायु परिवर्तन के कारण सूखे की अवधि बढ़ती है या बारिश का स्वरूप अधिक अनिश्चित होता है, तो खनन गतिविधियों और स्थानीय जल सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
पानी की उपलब्धता में उतार-चढ़ाव भी चिंता
रिपोर्ट में पानी की उपलब्धता में साल-दर-साल होने वाले बदलाव को भी महत्वपूर्ण जोखिम के रूप में चिन्हित किया गया है। करीब 16 प्रतिशत खनन और धातु सुविधाएं ऐसे क्षेत्रों में स्थित हैं जहां पानी की उपलब्धता में वर्ष-दर-वर्ष काफी उतार-चढ़ाव देखा जाता है। इसका मतलब यह है कि किसी क्षेत्र में औसतन पर्याप्त पानी होना हमेशा जल सुरक्षा की गारंटी नहीं देता। किसी वर्ष कम बारिश होने पर खनन उद्योग को पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है, जबकि अत्यधिक बारिश वाले वर्षों में बाढ़ और बुनियादी ढांचे को नुकसान जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
ऊर्जा संक्रमण के लिए क्यों बड़ा खतरा
इस रिपोर्ट का महत्व केवल खनन उद्योग तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध वैश्विक ऊर्जा संक्रमण से भी है।
दुनिया जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करके सौर और पवन ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरी आधारित तकनीकों को तेजी से अपना रही है। इन सभी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण खनिजों और धातुओं की जरूरत होती है। जैसे-जैसे स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों का विस्तार होगा, वैसे-वैसे इन खनिजों की मांग भी बढ़ेगी। लेकिन यदि इन खनिजों का उत्पादन करने वाली खदानें पानी की कमी, सूखे या बाढ़ से प्रभावित होती हैं, तो इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर असर पड़ सकता है। इससे खनिजों की कीमत बढ़ने, परियोजनाओं में देरी होने और स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों के विस्तार की लागत बढ़ने का जोखिम पैदा हो सकता है। यही वजह है कि जल जोखिम को अब केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं माना जा सकता। यह खनन कंपनियों के लिए परिचालन और वित्तीय जोखिम के साथ-साथ वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा का भी मुद्दा बन गया है।
स्थानीय समुदायों पर भी पड़ सकता है असर
खनन क्षेत्रों में जल संकट का प्रभाव केवल कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। जब कोई खदान ऐसे क्षेत्र में संचालित होती है जहां पानी पहले से सीमित है, तो स्थानीय लोगों, किसानों और उद्योगों के बीच जल संसाधनों को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
भारत समेत कई देशों में खनन परियोजनाओं को लेकर स्थानीय समुदायों की प्रमुख चिंताओं में जल स्रोतों पर प्रभाव भी शामिल रहा है। यदि खनन गतिविधियों के कारण भूजल स्तर प्रभावित होता है या स्थानीय जल स्रोतों की गुणवत्ता खराब होती है, तो इसका असर लोगों की आजीविका और स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। इसलिए जल प्रबंधन का मतलब केवल खनन में कम पानी इस्तेमाल करना नहीं है। यह भी जरूरी है कि खनन गतिविधियों के कारण स्थानीय नदियों, भूजल और जल स्रोतों की गुणवत्ता प्रभावित न हो।
खनन कंपनियों को बदलनी होगी रणनीति
रिपोर्ट के निष्कर्षों से संकेत मिलता है कि खनन कंपनियों को पानी को केवल उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाले संसाधन के रूप में देखने के बजाय इसे दीर्घकालिक रणनीतिक जोखिम के तौर पर लेना होगा। इसके लिए कंपनियों को पानी की खपत कम करने, जल पुनर्चक्रण बढ़ाने, वर्षा जल संग्रहण, वैकल्पिक जल स्रोतों के इस्तेमाल और कम पानी वाली तकनीकों को अपनाने पर जोर देना होगा। इसके साथ ही किसी नई खनन परियोजना को शुरू करने से पहले उस क्षेत्र की वर्तमान जल स्थिति के साथ-साथ भविष्य के जलवायु जोखिम का भी आकलन करना जरूरी होगा।
सरकार और निवेशकों की भूमिका भी अहम
जल जोखिम को कम करने की जिम्मेदारी केवल खनन कंपनियों की नहीं हो सकती। सरकारों को भी नई खनन परियोजनाओं की अनुमति देते समय स्थानीय जल उपलब्धता और भविष्य में जलवायु परिवर्तन के संभावित प्रभावों को ध्यान में रखना होगा। वहीं निवेशकों के लिए भी पानी एक महत्वपूर्ण वित्तीय जोखिम बन सकता है। यदि किसी खदान को सूखे या बाढ़ के कारण उत्पादन रोकना पड़ता है, तो इससे कंपनी के राजस्व और निवेश पर सीधा असर पड़ सकता है।
इसलिए भविष्य में निवेश के फैसलों में भी जल जोखिम को उसी तरह महत्व देना होगा जैसे वित्तीय, बाजार और जलवायु जोखिम को दिया जाता है।
क्या खनिजों की बढ़ती मांग और जल संकट के बीच संतुलन संभव है
दुनिया को स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ने के लिए महत्वपूर्ण खनिजों की जरूरत है, लेकिन इन खनिजों के उत्पादन में पानी की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यही इस रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है। यदि ऊर्जा संक्रमण की रणनीति केवल खनिजों की मांग और आपूर्ति पर केंद्रित रहती है और जल संकट को नजरअंदाज करती है, तो भविष्य में खनिजों की आपूर्ति खुद पानी की कमी से प्रभावित हो सकती है। इसलिए आगे की रणनीति केवल अधिक खनन तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यह भी तय करना होगा कि खनन कहां किया जाए, वहां पानी कितना उपलब्ध है, स्थानीय समुदायों और कृषि की जरूरतें क्या हैं और जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाले दशकों में उस क्षेत्र की जल स्थिति किस तरह बदल सकती है।
ICMM की रिपोर्ट ने दुनिया के खनन उद्योग के सामने खड़े एक ऐसे संकट को उजागर किया है जिसका असर आने वाले समय में पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और वैश्विक ऊर्जा संक्रमण तीनों पर पड़ सकता है। दुनिया की करीब दो-तिहाई खनन और धातु उत्पादन सुविधाओं का किसी न किसी महत्वपूर्ण जल जोखिम के संपर्क में होना इस बात का संकेत है कि पानी अब खनन उद्योग के लिए सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक मुद्दों में शामिल हो चुका है। भारत जैसे देशों के लिए यह चेतावनी और भी महत्वपूर्ण है, जहां एक ओर महत्वपूर्ण खनिजों की मांग और खनन गतिविधियां बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर कई क्षेत्र जल संकट और बदलते मानसून का सामना कर रहे हैं।
भविष्य की खनन नीति में केवल उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देने के बजाय जल सुरक्षा, स्थानीय समुदायों के अधिकार और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को भी केंद्र में रखना होगा। पानी का बेहतर प्रबंधन, खनन में जल पुनर्चक्रण, कम पानी वाली तकनीकों का इस्तेमाल और सरकार, उद्योग तथा स्थानीय समुदायों के बीच बेहतर समन्वय ही यह सुनिश्चित कर सकता है कि दुनिया का स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण एक नए जल संकट को जन्म न दे।
