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EPR मॉडल के बावजूद जापान में प्लास्टिक रीसाइक्लिंग चुनौती, भारत के लिए क्या हैं सबक?
जापान की प्लास्टिक कचरा प्रबंधन व्यवस्था दुनिया की सबसे व्यवस्थित प्रणालियों में गिनी जाती है, जहां कचरे की छंटाई, संग्रह और Extended Producer Responsibility (EPR) पर विशेष जोर दिया जाता है। इसके बावजूद देश में पैदा होने वाले प्लास्टिक का एक बड़ा हिस्सा वास्तविक material recycling के जरिए नए उत्पादों या कच्चे माल में वापस नहीं आता, बल्कि उसे जलाकर ऊर्जा हासिल की जाती है। यही वजह है कि जापान की ऊंची 'recovery rate' और वास्तविक recycling के बीच अंतर को समझना जरूरी है। जापान का अनुभव यह दिखाता है कि केवल कचरे को अलग करना और collect करना पर्याप्त नहीं है; प्रभावी circular economy के लिए recyclable और reusable packaging, बेहतर product design, पारदर्शी recycling आंकड़े और मजबूत collection infrastructure भी जरूरी हैं। भारत के लिए जापान से source segregation और नागरिक भागीदारी सीखने योग्य हैं, लेकिन EPR व्यवस्था को केवल collection और recycling targets तक सीमित रखने के बजाय उत्पाद के पूरे जीवनचक्र से जोड़ना अधिक प्रभावी होगा।

टोक्यो: जापान दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां कचरा प्रबंधन को लेकर बेहद सख्त और व्यवस्थित व्यवस्था लागू है। यहां घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से निकलने वाले कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में बांटने पर जोर दिया जाता है और नागरिकों को प्लास्टिक, बोतल, कैन, कागज और अन्य कचरे की अलग-अलग छंटाई करनी होती है। देश ने Extended Producer Responsibility यानी EPR के जरिए उत्पादकों को भी कचरा प्रबंधन की जिम्मेदारी से जोड़ा है। इसके बावजूद जापान के प्लास्टिक कचरा प्रबंधन मॉडल की एक बड़ी कमजोरी सामने आई है। देश में प्लास्टिक की छंटाई और संग्रह की व्यवस्था मजबूत होने के बावजूद, प्लास्टिक का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा ही वास्तव में नए प्लास्टिक उत्पादों या कच्चे माल में बदल पाता है। बड़ी मात्रा में प्लास्टिक को जलाकर उससे ऊर्जा हासिल की जाती है, जिसे जापान की व्यापक 'रीकवरी' या 'थर्मल रीसाइक्लिंग' व्यवस्था में शामिल किया जाता है।
जापान के प्लास्टिक कचरे की तस्वीर
Down To Earth की रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में जापान में करीब 7.69 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा पैदा हुआ। इसमें से लगभग 1.7 मिलियन टन प्लास्टिक को नए पदार्थ के रूप में रीसाइकिल किया गया, जबकि करीब 1.25 मिलियन टन को अन्य देशों में भेजा गया। रिपोर्ट के अनुसार, देश के भीतर लगभग 4.6 लाख टन प्लास्टिक यानी कुल प्लास्टिक कचरे का करीब 6 प्रतिशत ही नए उत्पादों या सामग्री में वापस बदला गया। यह आंकड़ा जापान की प्लास्टिक व्यवस्था को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। जापान में प्लास्टिक कचरे की 'effective utilisation' या व्यापक 'recovery' दर में केवल material recycling को ही नहीं, बल्कि chemical recycling और waste-to-energy यानी कचरे को जलाकर ऊर्जा प्राप्त करने को भी शामिल किया जाता है। इसलिए जब जापान में प्लास्टिक कचरे के उच्च recovery rate की बात होती है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उतने प्रतिशत प्लास्टिक को नए प्लास्टिक उत्पादों में बदल दिया गया।
'रीकवरी' और वास्तविक रीसाइक्लिंग में बड़ा अंतर
प्लास्टिक कचरे को जलाकर बिजली या गर्मी पैदा करना और उसे दोबारा नए उत्पादों में बदलना दो अलग प्रक्रियाएं हैं। Material recycling में पुराने प्लास्टिक को संसाधित करके दोबारा उपयोगी कच्चे माल या उत्पाद में बदला जाता है। इसके विपरीत, incineration या waste-to-energy में प्लास्टिक को जलाया जाता है और उससे ऊर्जा प्राप्त की जाती है। इस प्रक्रिया में मूल प्लास्टिक सामग्री दोबारा उसी रूप में उपयोग के लिए उपलब्ध नहीं रहती। OECD के क्षेत्रीय आकलनों के अनुसार, जापान में प्लास्टिक कचरे की बड़ी मात्रा waste-to-energy के जरिए recover की जाती है। इसी वजह से जापान की कुल 'recovery' दर काफी अधिक दिखाई देती है, लेकिन वास्तविक mechanical या material recycling की हिस्सेदारी उससे काफी कम है।
यही वह बिंदु है जहां जापान के मॉडल को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं के बीच बहस होती है। यदि प्लास्टिक को जलाकर ऊर्जा हासिल करने को recycling के बराबर माना जाए, तो recycling की वास्तविक स्थिति का आकलन मुश्किल हो सकता है। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में material recycling, chemical recycling और energy recovery को अलग-अलग आंकड़ों में दिखाना अधिक पारदर्शी होगा।
जापान का EPR मॉडल क्या है
Extended Producer Responsibility यानी EPR ऐसी नीति व्यवस्था है जिसमें किसी उत्पाद या पैकेजिंग को बाजार में लाने वाली कंपनी की जिम्मेदारी उसके उपयोग के बाद पैदा होने वाले कचरे तक बढ़ाई जाती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्लास्टिक पैकेजिंग बनाने और बेचने वाली कंपनियां उसके संग्रह, प्रबंधन और recycling की लागत में योगदान दें। जापान ने पैकेजिंग कचरे के प्रबंधन के लिए EPR व्यवस्था को काफी पहले अपनाया था। इसके तहत उत्पादकों, उपभोक्ताओं और स्थानीय निकायों की भूमिकाएं अलग-अलग तय की गई हैं। नागरिकों से कचरे को स्रोत पर अलग करने की अपेक्षा की जाती है, स्थानीय निकाय संग्रह और प्रबंधन व्यवस्था संभालते हैं और उत्पादक recycling व्यवस्था में योगदान करते हैं।
इस प्रणाली ने जापान में source segregation यानी कचरे को शुरुआत में ही अलग करने की आदत को मजबूत किया है। हालांकि, किसी देश में कचरे की छंटाई बेहतर होने का मतलब यह नहीं है कि हर प्रकार के प्लास्टिक को आर्थिक और तकनीकी रूप से आसानी से recycle किया जा सकता है।
प्लास्टिक की छंटाई के बावजूद रीसाइक्लिंग मुश्किल क्यों
प्लास्टिक एक समान सामग्री नहीं है। अलग-अलग प्रकार के प्लास्टिक, multilayer packaging, additives और food contamination जैसी समस्याएं recycling प्रक्रिया को कठिन बनाती हैं। कई बार किसी पैकेजिंग को तकनीकी रूप से recycle किया जा सकता है, लेकिन उसे इकट्ठा करने, साफ करने और अलग करने की लागत इतनी अधिक होती है कि उसका recycling आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं रहता। यही वजह है कि जापान की अच्छी sorting व्यवस्था के बावजूद प्लास्टिक के बड़े हिस्से को जलाकर ऊर्जा हासिल करने का रास्ता अपनाया जाता है।
2021 का Plastic Resource Circulation Act
जापान ने प्लास्टिक प्रदूषण और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिए 2021 में Act on Promotion of Resource Circulation for Plastics पारित किया, जिसे अप्रैल 2022 से लागू किया गया। इस कानून का उद्देश्य प्लास्टिक के पूरे जीवनचक्र में resource circulation को बढ़ावा देना है। इस व्यवस्था में प्लास्टिक उत्पादों के डिजाइन और निर्माण से लेकर बिक्री, उपयोग, संग्रह और recycling तक की पूरी श्रृंखला को शामिल किया गया है। कानून के तहत कंपनियों को बेहतर और अधिक टिकाऊ प्लास्टिक डिजाइन की दिशा में प्रोत्साहित करने, single-use plastic products के उपयोग को कम करने और प्लास्टिक कचरे के संग्रह एवं recycling को बढ़ावा देने की कोशिश की गई है।
इसका मूल उद्देश्य केवल पैदा हुए प्लास्टिक कचरे का निपटारा करना नहीं, बल्कि ऐसी circular economy विकसित करना है जिसमें शुरुआत से ही कम प्लास्टिक का इस्तेमाल हो और इस्तेमाल के बाद अधिक से अधिक सामग्री दोबारा अर्थव्यवस्था में वापस लाई जा सके।
कानून के बावजूद चुनौती बरकरार
जापान की चुनौती यह है कि मजबूत नीति और बेहतर collection system के बावजूद material recycling अभी भी सीमित है। एक ओर देश में नागरिक कचरे की छंटाई को गंभीरता से लेते हैं, दूसरी ओर प्लास्टिक के बड़े हिस्से का अंतिम निपटारा incineration और energy recovery के रूप में होता है। इससे यह सवाल उठता है कि किसी देश की recycling व्यवस्था की सफलता को कैसे मापा जाए। यदि केवल यह देखा जाए कि कितना कचरा collected या recovered हुआ, तो तस्वीर काफी सकारात्मक नजर आ सकती है। लेकिन यदि यह पूछा जाए कि वास्तव में कितना प्लास्टिक नए उत्पादों या कच्चे माल में वापस आया, तो स्थिति अलग दिखाई देती है।
EPR में केवल कंपनियों से शुल्क लेना पर्याप्त नहीं
जापान के अनुभव से एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठता है कि EPR प्रणाली कंपनियों को अपने उत्पादों और पैकेजिंग के डिजाइन में बदलाव करने के लिए कितना प्रोत्साहित करती है। यदि किसी कंपनी के लिए ऐसी पैकेजिंग बनाना और बाजार में उतारना सस्ता है जिसे बाद में recycle करना मुश्किल है, तो केवल recycling की लागत में योगदान करने से उसके डिजाइन को बदलने की प्रेरणा सीमित रह सकती है।
इसलिए एक प्रभावी EPR प्रणाली में केवल यह नहीं देखा जाना चाहिए कि कंपनी ने कचरा प्रबंधन के लिए कितनी राशि दी। यह भी देखा जाना चाहिए कि कंपनी ने recyclable packaging, reusable products, recycled content और कम पैकेजिंग की दिशा में क्या कदम उठाए।
भारत के लिए जापान से क्या सीख
भारत में भी Plastic Waste Management Rules के तहत EPR व्यवस्था लागू है। इसके तहत Producers, Importers और Brand Owners यानी PIBOs को प्लास्टिक पैकेजिंग कचरे के संग्रह और recycling से जुड़ी जिम्मेदारियां दी गई हैं।
जापान का अनुभव भारत के लिए कई महत्वपूर्ण सबक दे सकता है।
- सबसे पहला सबक है कि source segregation को मजबूत करना बेहद जरूरी है। यदि गीला और सूखा कचरा शुरुआत में ही अलग नहीं किया जाता, तो recycling की पूरी प्रक्रिया अधिक महंगी और जटिल हो जाती है।
- दूसरा सबक यह है कि EPR को केवल recycling certificates और collection targets तक सीमित नहीं रखना चाहिए। उत्पादकों को ऐसी पैकेजिंग बनाने के लिए आर्थिक रूप से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए जिसे आसानी से recycle या reuse किया जा सके।
- तीसरा, recycling के आंकड़ों में पारदर्शिता जरूरी है। Material recycling, chemical recycling और waste-to-energy को अलग-अलग श्रेणियों में रिपोर्ट करने से यह स्पष्ट होगा कि वास्तव में कितना प्लास्टिक circular economy में वापस आ रहा है।
भारत के informal waste sector की भूमिका
भारत के लिए एक और महत्वपूर्ण पहलू informal waste workers हैं। देश में बड़ी संख्या में कचरा बीनने वाले और अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिक प्लास्टिक और अन्य recyclable materials को संग्रहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत की EPR व्यवस्था को इस क्षेत्र को नजरअंदाज करने के बजाय इसे औपचारिक और सुरक्षित recycling chain से जोड़ने की जरूरत है। इससे एक तरफ waste workers की आजीविका और सामाजिक सुरक्षा बेहतर हो सकती है, वहीं दूसरी तरफ प्लास्टिक संग्रह और recycling की क्षमता भी बढ़ाई जा सकती है।
Collection और sorting सबसे बड़ी चुनौती
प्लास्टिक recycling की समस्या केवल recycling plants की कमी तक सीमित नहीं है। कचरे को घरों और दुकानों से इकट्ठा करना, उसे अलग करना, साफ करना और recycling योग्य सामग्री तक पहुंचाना भी बेहद महंगा काम है।
Down To Earth की रिपोर्ट में Centre for Science and Environment के कुछ भारतीय शहरों से जुड़े आकलन का हवाला दिया गया है, जिसके अनुसार नगर निकायों द्वारा प्लास्टिक कचरा प्रबंधन पर खर्च की जाने वाली राशि का बड़ा हिस्सा collection और sorting जैसे शुरुआती चरणों में खर्च हो जाता है।
इससे साफ है कि यदि भारत को प्रभावी EPR प्रणाली बनानी है तो केवल recycling plants की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। मजबूत collection network, source segregation, material recovery facilities और recycling infrastructure को एक साथ विकसित करना होगा।
क्या जापान का मॉडल पूरी तरह असफल है
जापान के मॉडल को पूरी तरह असफल कहना सही नहीं होगा। देश ने source segregation, collection infrastructure और नागरिक भागीदारी के मामले में महत्वपूर्ण प्रगति की है। OECD के विभिन्न आकलनों में भी जापान को ऐसे देशों में शामिल किया गया है जहां प्लास्टिक waste management और recycling व्यवस्था कई अन्य देशों की तुलना में अधिक विकसित है। लेकिन जापान का अनुभव यह भी बताता है कि अच्छी waste management व्यवस्था और वास्तविक circular economy दो अलग बातें हो सकती हैं। यदि recovery के आंकड़ों में waste-to-energy का बड़ा हिस्सा शामिल है, तो केवल ऊंची recovery rate के आधार पर material recycling की सफलता का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
प्लास्टिक संकट का स्थायी समाधान क्या
प्लास्टिक प्रदूषण का समाधान केवल अधिक recycling plants लगाने से नहीं होगा। सबसे पहले अनावश्यक single-use plastic का उपयोग कम करना होगा। इसके बाद reusable products और सरल packaging designs को बढ़ावा देना होगा। ऐसी पैकेजिंग को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जिसे आसानी से अलग, संग्रहित और recycle किया जा सके। इसके बाद उत्पन्न होने वाले प्लास्टिक कचरे की source segregation और collection व्यवस्था मजबूत करनी होगी। अंत में material recycling को प्राथमिकता देते हुए waste-to-energy को अलग waste management option के रूप में देखा जाना चाहिए।
जापान का प्लास्टिक कचरा प्रबंधन मॉडल दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है। देश ने कचरे की छंटाई, संग्रह और नागरिक भागीदारी के मामले में मजबूत व्यवस्था विकसित की है, लेकिन इसके बावजूद प्लास्टिक का बड़ा हिस्सा वास्तविक material recycling के बजाय incineration और energy recovery की ओर जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि किसी देश ने कितने प्रतिशत प्लास्टिक कचरे को 'recover' किया। यह भी जानना जरूरी है कि वास्तव में कितना प्लास्टिक नए उत्पादों या कच्चे माल में वापस आया, कितना दोबारा इस्तेमाल हुआ और कितना जलाकर ऊर्जा में बदल दिया गया।
भारत और अन्य एशियाई देशों के लिए जापान की सबसे बड़ी सीख उसकी मजबूत source segregation व्यवस्था हो सकती है। वहीं उसकी thermal recovery पर निर्भरता यह चेतावनी देती है कि ऊंची recovery दर को वास्तविक circular economy का पर्याय नहीं माना जाना चाहिए। भविष्य की प्रभावी EPR व्यवस्था वही होगी जो उत्पादकों को कम और बेहतर पैकेजिंग बनाने के लिए प्रेरित करे, उपभोक्ताओं को कचरे की सही छंटाई के लिए प्रोत्साहित करे और material recycling को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाए। प्लास्टिक संकट का स्थायी समाधान केवल कचरा पैदा होने के बाद उसका प्रबंधन करने में नहीं, बल्कि उत्पादन से लेकर उपयोग और अंतिम निपटान तक पूरी व्यवस्था को बदलने में है। समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा।
