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श्रावण 2026: महाराष्ट्र में कब शुरू होगा पवित्र महीना? जानिए 4 सावन सोमवार, पूजा विधि और धार्मिक महत्व
भगवान शिव को समर्पित पवित्र श्रावण मास वर्ष 2026 में महाराष्ट्र सहित अमांत पंचांग का पालन करने वाले राज्यों में 13 अगस्त से शुरू होकर 11 सितंबर तक रहेगा। इस वर्ष श्रावण मास में कुल चार सावन सोमवार पड़ेंगे। पूरे महीने शिव मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और व्रत-उपवास का विशेष महत्व रहेगा। श्रद्धालु भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना कर सुख, समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना करेंगे।
Priyanka Gaikwad27 जुल. 2026, 01:24 PM IST

हिंदू धर्म में श्रावण मास को सबसे पवित्र और पुण्यदायी महीनों में से एक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा और दक्षिण भारत में अमांत पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में श्रावण मास 13 अगस्त से प्रारंभ होकर 11 सितंबर तक रहेगा। इस दौरान 17 अगस्त, 24 अगस्त, 31 अगस्त और 7 सितंबर को चार सावन सोमवार आएंगे। प्रत्येक सोमवार को शिव मंदिरों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करेंगे और व्रत रखेंगे।
पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। वहीं समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष का पान कर भगवान शिव ने समस्त सृष्टि की रक्षा की थी।
मान्यता है कि विष की तीव्रता को कम करने के लिए देवताओं ने शिवलिंग पर जल अर्पित किया था। तभी से श्रावण मास में जलाभिषेक और रुद्राभिषेक की परंपरा चली आ रही है। इस महीने में श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान शिव की आराधना करने से मनोकामनाएं पूर्ण होने तथा जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आने की मान्यता है। श्रावण मास में श्रद्धालु प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करते हैं और शिवलिंग पर गंगाजल या शुद्ध जल अर्पित करते हैं। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से पंचामृत अभिषेक किया जाता है। भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, भांग, सफेद पुष्प, चंदन और अक्षत अर्पित किए जाते हैं। पूजा के दौरान 'ॐ नमः शिवाय' और महामृत्युंजय मंत्र का जाप विशेष फलदायी माना जाता है। पूजा के अंत में दीप प्रज्वलित कर आरती की जाती है और शिवलिंग की आधी परिक्रमा करने की परंपरा निभाई जाती है।
मान्यता है कि विष की तीव्रता को कम करने के लिए देवताओं ने शिवलिंग पर जल अर्पित किया था। तभी से श्रावण मास में जलाभिषेक और रुद्राभिषेक की परंपरा चली आ रही है। इस महीने में श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान शिव की आराधना करने से मनोकामनाएं पूर्ण होने तथा जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आने की मान्यता है। श्रावण मास में श्रद्धालु प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करते हैं और शिवलिंग पर गंगाजल या शुद्ध जल अर्पित करते हैं। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से पंचामृत अभिषेक किया जाता है। भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, भांग, सफेद पुष्प, चंदन और अक्षत अर्पित किए जाते हैं। पूजा के दौरान 'ॐ नमः शिवाय' और महामृत्युंजय मंत्र का जाप विशेष फलदायी माना जाता है। पूजा के अंत में दीप प्रज्वलित कर आरती की जाती है और शिवलिंग की आधी परिक्रमा करने की परंपरा निभाई जाती है।
धार्मिक महत्व के साथ-साथ श्रावण मास का वैज्ञानिक पक्ष भी महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्षा ऋतु के दौरान वातावरण में नमी बढ़ने से पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है और संक्रमण का खतरा भी अधिक रहता है। ऐसे में सात्विक भोजन, उपवास, संयमित दिनचर्या और स्वच्छता का पालन शरीर को स्वस्थ रखने में सहायक माना जाता है। यही कारण है कि श्रावण मास केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, आत्मसंयम, सकारात्मक जीवनशैली और प्रकृति के प्रति सम्मान का भी संदेश देता है। इस पूरे महीने देशभर के प्रमुख शिव मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और धार्मिक आयोजनों की धूम रहती है, जिसमें लाखों श्रद्धालु शामिल होकर भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
