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कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर: 2 हजार वर्षों की परंपरा को संजोए शक्तिपीठ, जानिए मंदिर का इतिहास, पौराणिक कथा और विशेषताएं
महाराष्ट्र के कोल्हापुर शहर में स्थित श्री महालक्ष्मी मंदिर, जिसे अंबाबाई मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है। प्राचीन इतिहास, अद्भुत पत्थर की वास्तुकला, धार्मिक महत्व और अनूठी परंपराओं के कारण हर वर्ष देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। ऐसी मान्यता है कि मां महालक्ष्मी की कृपा से भक्तों के जीवन में सुख, समृद्धि और वैभव का आगमन होता है।
Priyanka Gaikwad27 जुल. 2026, 01:24 PM IST

महाराष्ट्र के दक्षिणी भाग में स्थित कोल्हापुर शहर के पंचगंगा नदी क्षेत्र में बना श्री महालक्ष्मी मंदिर राज्य के सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिरों में गिना जाता है। यह मंदिर "अंबाबाई मंदिर" के नाम से भी प्रसिद्ध है। हिंदू धर्म में इसे साढ़े तीन शक्तिपीठों में से एक पूर्ण शक्तिपीठ माना जाता है। इसी कारण वर्षभर लाखों श्रद्धालु यहां माता के दर्शन के लिए आते हैं। इतिहासकारों के अनुसार, इस मंदिर का मूल निर्माण 7वीं से 8वीं शताब्दी के बीच चालुक्य शासकों के शासनकाल में हुआ था। इसके बाद शिलाहार, राष्ट्रकूट, यादव और मराठा शासकों ने समय-समय पर मंदिर का विस्तार और जीर्णोद्धार कराया। छत्रपति शिवाजी महाराज तथा करवीर रियासत के शासकों ने भी मंदिर के संरक्षण और विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
मंदिर का निर्माण काले पत्थरों से किया गया है और इसकी वास्तुकला में चालुक्य तथा हेमाड़पंथी शैली का सुंदर संगम देखने को मिलता है। मंदिर की दीवारों पर की गई बारीक नक्काशी, विशाल पत्थर के स्तंभ और भव्य सभा मंडप प्राचीन भारतीय शिल्पकला के उत्कृष्ट उदाहरण माने जाते हैं। गर्भगृह में स्थापित मां महालक्ष्मी की लगभग तीन फीट ऊंची काले पत्थर की प्रतिमा अत्यंत आकर्षक है। देवी चार भुजाओं में विभिन्न आयुध धारण किए सिंहासन पर विराजमान हैं। प्रतिमा के पीछे बना पत्थर का प्रभामंडल और अलंकरण मंदिर की भव्यता को और बढ़ाते हैं। मंदिर से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा भी प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, कोल्हासुर नामक एक असुर ने इस क्षेत्र में अत्याचार मचा रखा था। तब देवी महालक्ष्मी ने उसका वध कर लोगों को उसके आतंक से मुक्त कराया। मृत्यु से पहले कोल्हासुर ने देवी से प्रार्थना की कि इस नगर का नाम उसके नाम पर रखा जाए। देवी ने उसकी इच्छा स्वीकार कर ली और तभी से इस स्थान का नाम "कोल्हापुर" पड़ा, ऐसी धार्मिक मान्यता है।
इस मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता "किरणोत्सव" है। वर्ष में दो बार, सामान्यतः जनवरी के अंत और नवंबर की शुरुआत में, अस्त होते सूर्य की किरणें मंदिर के मुख्य द्वार से होकर सीधे मां महालक्ष्मी की प्रतिमा पर पड़ती हैं। मंदिर की अद्भुत स्थापत्य कला का यह दृश्य देखने के लिए हजारों श्रद्धालु विशेष रूप से कोल्हापुर पहुंचते हैं। नवरात्रि, किरणोत्सव, दीपोत्सव और अन्य प्रमुख धार्मिक पर्वों के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। प्रातःकाल की काकड़ आरती, महापूजा, पालखी उत्सव और रात्रि की शेज आरती यहां के प्रमुख धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल हैं।
महालक्ष्मी मंदिर के आसपास श्री महाकाली मंदिर, श्री महासरस्वती मंदिर, भव्य दीपमाला, ऐतिहासिक पुराना राजवाड़ा, रंकाला झील, ज्योतिबा मंदिर और पन्हाला किला जैसे कई दर्शनीय स्थल भी मौजूद हैं। इसलिए कोल्हापुर आने वाले पर्यटक धार्मिक यात्रा के साथ-साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का भी आनंद ले सकते हैं। कोल्हापुर सड़क, रेल और हवाई मार्ग से देश के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। कोल्हापुर रेलवे स्टेशन मंदिर से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जबकि कोल्हापुर हवाई अड्डे से भी यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। यदि आप धार्मिक आस्था, प्राचीन इतिहास, अद्भुत वास्तुकला और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक साथ अनुभव करना चाहते हैं, तो श्री महालक्ष्मी अर्थात अंबाबाई मंदिर महाराष्ट्र के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में से एक है, जहां प्रत्येक श्रद्धालु और पर्यटक को जीवन में कम से कम एक बार अवश्य जाना चाहिए
