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'पुलिस नागरिकों की जिंदगी से नहीं खेल सकती': कर्नाटक हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी, पत्नी की झूठी शिकायत पर बिना जांच पति को जेल भेजने पर दिए विभागीय जांच के आदेश

क्या केवल पत्नी की शिकायत दर्ज होते ही पुलिस बिना किसी प्राथमिक जांच के पति को सलाखों के पीछे भेज सकती है? कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस सवाल का कड़ा जवाब देते हुए स्पष्ट किया है कि पुलिस शिकायतकर्ताओं के हाथ की कठपुतली नहीं बन सकती। हाईकोर्ट ने बागलूर पुलिस द्वारा दर्ज धोखाधड़ी और जालसाजी के मामले में आगे की जांच पर अंतरिम रोक लगाते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि गिरफ्तारी हमेशा कानूनी सिद्धांतों के तहत ही होनी चाहिए, मनमर्जी से नहीं।

Sonali27 जुल. 2026, 01:24 PM IST
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'पुलिस नागरिकों की जिंदगी से नहीं खेल सकती': कर्नाटक हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी, पत्नी की झूठी शिकायत पर बिना जांच पति को जेल भेजने पर दिए विभागीय जांच के आदेश
कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि कानून लागू करने वाली एजेंसियां नागरिकों के जीवन से खिलवाड़ नहीं कर सकतीं। अदालत ने अप्रैल 2026 से न्यायिक हिरासत में बंद एक व्यक्ति की तत्काल रिहाई का आदेश दिया और मामले की जांच करने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच (Departmental Inquiry) शुरू करने के निर्देश दिए। यह आदेश न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना (Justice M. Nagaprasanna) की एकलपीठ ने 25 जून 2026 को पारित किया। अदालत ने मामले की आगे की जांच पर भी रोक लगा दी।

क्या है पूरा मामला?
मामला बेंगलुरु के बागलूर पुलिस स्टेशन में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है। रामकृष्णम राजू (Ramakrishnam Raju) को 21 अप्रैल 2026 को उनकी अलग रह रही पत्नी शिवा लक्ष्मी (Shiva Lakshmi) की शिकायत के आधार पर गिरफ्तार किया गया था। पत्नी ने 19 दिसंबर 2025 को शिकायत दर्ज कर आरोप लगाया था कि पति ने साझेदारी (Partnership Deed) से जुड़े दस्तावेजों में जालसाजी (Forgery) की है और धोखाधड़ी (Cheating) की है। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) के धोखाधड़ी और जालसाजी से संबंधित प्रावधानों के तहत मामला दर्ज कर पति को गिरफ्तार कर लिया।

हाईकोर्ट ने पुलिस को क्यों लगाई फटकार?
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने कहा कि पुलिस बिना पर्याप्त कानूनी आधार के पति को हिरासत में लेने की जल्दबाजी कर रही है। अदालत ने टिप्पणी की कि केवल पत्नी द्वारा लगाए गए आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनी नहीं जा सकती।

अदालत ने मौखिक टिप्पणी में कहा:
"आजकल पत्नियां आए दिन आपराधिक मामले दर्ज करा रही हैं और पुलिस बिना उचित जांच किए सीधे पति को गिरफ्तार कर लेती है। आखिर केवल पार्टनरशिप डीड में कथित जालसाजी के आरोप पर इतनी जल्दबाजी क्यों?" कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी ने कानून के स्थापित सिद्धांतों की अनदेखी की और ऐसा व्यवहार किया जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों के विपरीत है। "लोगों की जिंदगी से खेल रही है पुलिस" हाईकोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी का आचरण गंभीर चिंता का विषय है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे अधिकारियों को बिना जवाबदेही के नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि उनकी कार्रवाई किसी व्यक्ति के जीवन, प्रतिष्ठा और स्वतंत्रता पर सीधा प्रभाव डालती है। कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी ने कानून के विपरीत कार्रवाई की है और उसके खिलाफ विभागीय जांच आवश्यक है। तत्काल रिहाई का आदेश

मामले के तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने:
रामकृष्णम राजू की तत्काल रिहाई का आदेश दिया।
बागलूर पुलिस द्वारा की जा रही आगे की जांच पर अंतरिम रोक लगा दी।
संबंधित जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने के निर्देश दिए।

फैसले का महत्व
यह आदेश व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) और गिरफ्तारी के अधिकार संबंधी स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों को दोहराता है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया कि पुलिस केवल शिकायत दर्ज होने के आधार पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं छीन सकती। गिरफ्तारी हमेशा कानूनी आवश्यकता, पर्याप्त साक्ष्य और स्थापित प्रक्रिया के अनुरूप ही होनी चाहिए। यह निर्णय उन मामलों में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां वैवाहिक विवादों के बीच दर्ज आपराधिक मामलों में बिना पर्याप्त जांच गिरफ्तारी की जाती है।