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दहेज हत्या या आत्महत्या? गर्भवती नवविवाहिता की मौत मामले में मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, गठित होगा मेडिकल बोर्ड और SIT

"अप्राकृतिक या संदिग्ध मौत के मामलों में मानव शरीर पहला और कई बार सबसे सच्चा गवाह होता है।" तमिलनाडु के शिवगंगई जिले में 24 वर्षीय गर्भवती नवविवाहिता की संदिग्ध मौत के मामले में सुनवाई करते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने यह ऐतिहासिक टिप्पणी की है। पहली पोस्टमार्टम रिपोर्ट और वीडियो रिकॉर्डिंग में कई गंभीर विसंगतियां सामने आने के बाद न्यायमूर्ति एल. विक्टोरिया गौरी ने मृतका का दोबारा पोस्टमार्टम (Fresh Autopsy) कराने और मामले की जांच विशेष जांच दल (SIT) को सौंपने का कड़ा निर्देश दिया है।

Sonali27 जुल. 2026, 01:24 PM IST
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दहेज हत्या या आत्महत्या? गर्भवती नवविवाहिता की मौत मामले में मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, गठित होगा मेडिकल बोर्ड और SIT

मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि संदिग्ध या अप्राकृतिक मृत्यु के मामलों में "मानव शरीर पहला और कई बार सबसे सच्चा गवाह होता है।" अदालत ने तमिलनाडु के शिवगंगई जिले में 24 वर्षीय नवविवाहिता की संदिग्ध मौत के मामले में दोबारा पोस्टमार्टम (Fresh Autopsy) कराने और विशेष जांच दल (SIT) से जांच कराने का आदेश दिया है। कोर्ट ने माना कि पहले पोस्टमार्टम की रिपोर्ट और उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग में गंभीर विसंगतियां सामने आई हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

यह आदेश न्यायमूर्ति एल. विक्टोरिया गौरी (Justice L. Victoria Gowri) ने 24 जुलाई 2026 को पारित किया।

क्या है पूरा मामला?

मृतक महिला की शादी 25 जनवरी 2026 को हुई थी। शादी के पांच महीने से भी कम समय बाद, 17 जून 2026 को शिवगंगई जिले स्थित उसके ससुराल में उसका शव फंदे से लटका मिला। महिला की मां ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि उनकी बेटी को अतिरिक्त 5.5 सोवरेन (लगभग 44 ग्राम) सोने की मांग को लेकर लगातार दहेज के लिए प्रताड़ित किया जा रहा था। उन्होंने यह भी दावा किया कि मृत्यु के समय उनकी बेटी करीब चार महीने की गर्भवती थी। परिवार ने प्रथम पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए दोबारा पोस्टमार्टम और निष्पक्ष जांच की मांग की थी।

हाईकोर्ट ने क्यों जताई चिंता?

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि पोस्टमार्टम केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की वैज्ञानिक नींव है।

कोर्ट ने कहा,

"अप्राकृतिक या संदिग्ध मौत के मामलों में शव पहला और कई बार सबसे सच्चा गवाह होता है। पोस्टमार्टम एक साधारण प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि ऐसा वैज्ञानिक-वैधानिक परीक्षण है जिसका उद्देश्य न्याय की सेवा करना है।"

अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य किसी को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि सत्य तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक, कानूनी और विश्वसनीय हो।

फोरेंसिक समीक्षा में क्या मिलीं गड़बड़ियां?

हाईकोर्ट ने डॉ. एस. अंगयरकन्नी, एसोसिएट प्रोफेसर, फोरेंसिक मेडिसिन, केएपी विश्वनाथम गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, तिरुचिरापल्ली से पोस्टमार्टम रिकॉर्ड और उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग की स्वतंत्र समीक्षा कराई।

विशेषज्ञ ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट और 101 वीडियो क्लिप की जांच के बाद कई गंभीर विसंगतियां बताईं। इनमें शामिल हैं—

  • पोस्टमार्टम के समय संबंधी विरोधाभास
  • कपड़ों की जांच में कमियां
  • फंदे (Ligature Mark) के निशान का अधूरा विवरण
  • गर्दन की डिसेक्शन प्रक्रिया में कमी
  • खोपड़ी (Skull) की जांच में त्रुटियां
  • जैविक नमूनों (Biological Samples) के संग्रह और संरक्षण में खामियां
  • गर्भावस्था से जुड़े निष्कर्षों का उचित रिकॉर्ड न होना

अदालत ने कहा कि इन विसंगतियों की वजह से दोबारा वैज्ञानिक परीक्षण कराना आवश्यक हो गया है।

मेडिकल बोर्ड करेगा नया पोस्टमार्टम

हाईकोर्ट ने चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान निदेशक (Director of Medical Education and Research) को 24 घंटे के भीतर एक बहु-विषयक मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया।

इस बोर्ड में शामिल होंगे—

  • वरिष्ठ फोरेंसिक मेडिसिन प्रोफेसर
  • फोरेंसिक पैथोलॉजिस्ट
  • रेडियोलॉजिस्ट
  • स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ (Obstetrician-Gynaecologist)
  • फोरेंसिक साइंस विशेषज्ञ

यही टीम महिला का दोबारा पोस्टमार्टम करेगी।

शव की गरिमा पर भी कोर्ट की अहम टिप्पणी

अदालत ने कहा कि महिला का शव अब तक पुडुकोट्टई सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल की मोर्चरी में सुरक्षित रखा गया है क्योंकि परिवार पहले पोस्टमार्टम से संतुष्ट नहीं था।

हालांकि कोर्ट ने कहा कि—

"शव को अनिश्चितकाल तक सुरक्षित रखना भी मृत्यु के बाद मिलने वाली गरिमा (Dignity in Death) के सिद्धांत के अनुरूप नहीं है।"

इसलिए अदालत ने निर्देश दिया कि नए पोस्टमार्टम और सभी आवश्यक फोरेंसिक नमूने लेने के बाद अंतिम रिपोर्ट का इंतजार किए बिना शव परिवार को अंतिम संस्कार के लिए सौंप दिया जाए।

SIT करेगी पूरी जांच

हाईकोर्ट ने मामले की जांच शिवगंगई जिले से हटाकर विशेष जांच दल (SIT) को सौंप दी।

SIT का नेतृत्व कम से कम पुलिस अधीक्षक (SP) रैंक का अधिकारी करेगा, जो CB-CID या किसी अन्य विशेष जांच इकाई से होगा और जिसका शिवगंगई जिले से कोई संबंध नहीं होगा।

SIT किन पहलुओं की करेगी जांच?

अदालत ने SIT को निर्देश दिए कि वह—

  • अब तक के सभी जांच रिकॉर्ड अपने कब्जे में ले।
  • सभी फोरेंसिक साक्ष्य और डिजिटल रिकॉर्ड की जांच करे।
  • मृतका का मोबाइल फोन, लैपटॉप, डायरी, आभूषण और विवाह से जुड़े सामान बरामद करे।
  • सीसीटीवी फुटेज की जांच करे।
  • अंतिम फोन कॉल और बातचीत का विश्लेषण करे।
  • कथित गर्भावस्था से जुड़े मेडिकल रिकॉर्ड जुटाए।
  • यह भी जांच करे कि जिस कमरे में महिला मिली, क्या उसे बाहर से बंद किया गया था।

कोर्ट की अंतिम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि—

"संवैधानिक अदालत न तो जीवित लोगों को पहले से दोषी मानती है और न ही सार्वजनिक संस्थाओं की निष्पक्ष जांच से बचती है। यदि वस्तुनिष्ठ आधार पर संदेह मौजूद है, तो उसकी वैज्ञानिक जांच होना ही न्याय का मूल सिद्धांत है।"

अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके आदेश का उद्देश्य केवल निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच सुनिश्चित करना है। इस आदेश की कोई भी टिप्पणी भविष्य की आपराधिक कार्यवाही या जांच को प्रभावित नहीं करेगी।