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पद और प्रतिष्ठा से ऊपर न्याय: क्यों कोर्ट ने पूर्व जज गिरिबाला सिंह को नहीं दी जमानत? जानिए ट्विशा शर्मा मौत मामले की इनसाइड स्टोरी

क्या पूर्व न्यायिक पद और उम्र के आधार पर दहेज मृत्यु जैसे गंभीर अपराध में जमानत पाई जा सकती है? भोपाल जिला अदालत ने ट्विशा शर्मा मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अपराध की गंभीरता के आगे व्यक्तिगत परिस्थितियां गौण हैं। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा अग्रिम जमानत रद्द किए जाने के बाद नियमित जमानत के लिए पहुंचीं पूर्व जज गिरिबाला सिंह की अर्जी को कोर्ट ने सीबीआई जांच पूरी होने तक खारिज कर दिया है।

Sonali27 जुल. 2026, 01:24 PM IST
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पद और प्रतिष्ठा से ऊपर न्याय: क्यों कोर्ट ने पूर्व जज गिरिबाला सिंह को नहीं दी जमानत? जानिए ट्विशा शर्मा मौत मामले की इनसाइड स्टोरी
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में मॉडल एवं अभिनेत्री ट्विशा शर्मा की कथित दहेज मृत्यु मामले में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। भोपाल की जिला अदालत ने उनकी सास एवं सेवानिवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश गिरिबाला सिंह की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि जांच अभी जारी है और इस स्तर पर आरोपी को जमानत देने से साक्ष्यों के प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि केस डायरी में उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया आरोपी की कथित संलिप्तता की ओर संकेत करती है। 
प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश राम प्रताप मिश्रा ने अपने आदेश में कहा कि दहेज मृत्यु महिलाओं के विरुद्ध गंभीर अपराध है, जिसकी सजा आजीवन कारावास तक हो सकती है। इसलिए जांच पूरी होने से पहले जमानत देना न्यायहित में उचित नहीं होगा।

क्या है पूरा मामला?
ट्विशा शर्मा ने 9 दिसंबर 2025 को भोपाल के अधिवक्ता समर्थ सिंह से विवाह किया था। शादी के करीब पांच महीने बाद 12 मई 2026 की रात उनका शव भोपाल के कटारा हिल्स स्थित ससुराल में फंदे से लटका मिला। प्रारंभिक पोस्टमार्टम में मौत का कारण एंटी-मॉर्टम हैंगिंग बताया गया, लेकिन शरीर पर कई एंटी-मॉर्टम चोटें भी दर्ज की गईं। इसके बाद मृतका के परिवार ने दहेज प्रताड़ना, मानसिक उत्पीड़न, जबरन गर्भपात कराने के दबाव और जांच में गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगाए। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जांच बाद में सीबीआई को सौंप दी गई।

कोर्ट ने जमानत क्यों ठुकराई?
अभियोजन ने अदालत को बताया कि यदि गिरिबाला सिंह को रिहा किया गया तो वह साक्ष्यों और गवाहों को प्रभावित कर सकती हैं। अदालत ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि जांच एजेंसी की आशंका "निराधार नहीं कही जा सकती।" कोर्ट ने कहा कि जांच के दौरान एकत्र किए गए व्हाट्सएप चैट, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), मृतका के परिजनों के बयान तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य प्रथम दृष्टया आरोपी की कथित भूमिका दर्शाते हैं। इसलिए जमानत देना उचित नहीं होगा।

पूर्व न्यायाधीश होने का भी किया उल्लेख
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि गिरिबाला सिंह भोपाल की पूर्व प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश रह चुकी हैं और घटना के समय जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, भोपाल की अध्यक्ष थीं। ऐसे में अभियोजन द्वारा व्यक्त की गई साक्ष्य प्रभावित होने की आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।

बचाव पक्ष की दलीलें क्यों नहीं मानी गईं?
बचाव पक्ष ने उम्र, महिला होने, 100 वर्षीय मां की देखभाल, धार्मिक गतिविधियों और स्वास्थ्य संबंधी कारणों का हवाला देकर जमानत मांगी। हालांकि अदालत ने कहा कि आरोपों की गंभीरता इन व्यक्तिगत परिस्थितियों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। मेडिकल रिकॉर्ड में ऐसी कोई गंभीर बीमारी भी नहीं मिली, जिसके आधार पर तत्काल जमानत दी जा सके। अदालत ने कहा कि आवश्यकता पड़ने पर न्यायिक हिरासत में भी समुचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है।

हाईकोर्ट पहले ही रद्द कर चुका है अग्रिम जमानत
इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा गिरिबाला सिंह को दी गई अग्रिम जमानत रद्द कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन किए बिना राहत दे दी थी और जमानत आदेश में मामले के गुण-दोष पर अनावश्यक टिप्पणी की थी। अदालत ने प्रथम दृष्टया गंभीर आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए अग्रिम जमानत रद्द कर दी।

जांच के दौरान क्या-क्या सामने आया?
सुनवाई के दौरान यह दलील दी गई कि मृतका और उसके परिवार के बीच हुई व्हाट्सएप चैट, कॉल रिकॉर्ड तथा अन्य डिजिटल साक्ष्य दहेज प्रताड़ना और मानसिक उत्पीड़न के आरोपों की जांच में महत्वपूर्ण हैं। मृतका के पिता की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि शुरुआती जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण साक्ष्यों के संरक्षण में लापरवाही हुई और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका भी है। मामले में यह भी आरोप लगाया गया कि ट्विशा पर दहेज के लिए लगातार दबाव बनाया जाता था। परिवार का दावा है कि गर्भ में पल रहे बच्चे के पितृत्व पर सवाल उठाए गए और उन पर कथित रूप से गर्भपात कराने का दबाव भी बनाया गया। इन आरोपों की जांच फिलहाल सीबीआई कर रही है और इन पर अभी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष आना बाकी है।

पोस्टमार्टम और जांच में उठे सवाल
जांच के दौरान पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण एंटी-मॉर्टम हैंगिंग बताया गया, लेकिन शरीर पर कई एंटी-मॉर्टम चोटों का भी उल्लेख किया गया। बाद में यह भी सामने आया कि कथित तौर पर फांसी में इस्तेमाल बेल्ट पोस्टमार्टम के समय डॉक्टरों को उपलब्ध नहीं कराई गई थी। इस पहलू को लेकर भी मृतका के परिवार ने जांच पर सवाल उठाए और साक्ष्यों के संरक्षण में लापरवाही का आरोप लगाया।

CBI जांच में क्या हो रहा है?
सीबीआई इस मामले में डिजिटल साक्ष्यों, मोबाइल डेटा, व्हाट्सएप चैट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मेडिकल रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों की विस्तृत जांच कर रही है। जांच एजेंसी दोनों आरोपियों से पूछताछ कर चुकी है और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की फॉरेंसिक जांच भी कराई जा रही है। मामले की जांच अभी जारी है और अंतिम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है।

मामले का महत्व 
यह आदेश स्पष्ट करता है कि दहेज मृत्यु जैसे गंभीर मामलों में अदालतें केवल उम्र, सामाजिक प्रतिष्ठा या पूर्व न्यायिक पद के आधार पर राहत नहीं देंगी। यदि जांच के दौरान प्रथम दृष्टया पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हों और जांच प्रभावित होने की आशंका हो, तो अदालत साक्ष्यों की सुरक्षा और निष्पक्ष जांच को सर्वोच्च प्राथमिकता देगी। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्णय मुकदमे की सुनवाई और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।