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'गंगा में चिकन खाना अपराध नहीं': जस्टिस भुइयां ने उठाए बिना जांच गिरफ्तारी पर सवाल, कहा—'शांतिपूर्ण विरोध को न माना जाए अपराध'
"असहमति लोकतंत्र की आत्मा है, शत्रुता नहीं।" भोपाल में आयोजित एक स्मृति व्याख्यान के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने देश के वर्तमान सामाजिक और कानूनी परिदृश्य पर खुलकर अपनी राय रखी। बुलडोजर कार्रवाई, मनमानी गिरफ्तारियों, जमानत याचिका और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के राजनीति में प्रवेश जैसे ज्वलंत मुद्दों को छूते हुए उन्होंने याद दिलाया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकार किसी भी कीमत पर दबाए नहीं जा सकते।
Sonali27 जुल. 2026, 01:24 PM IST

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक असहमति को लेकर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। भोपाल स्थित राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (NLIU) में आयोजित जस्टिस जी.पी. सिंह स्मृति व्याख्यान के दौरान उन्होंने कहा कि भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है जो गंगा नदी पर चिकन खाने से रोकता हो। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति चिकन बिरयानी खाता है तो वह अपराध नहीं है और केवल ऐसे आरोप के आधार पर लोगों को महीनों तक जेल में रखना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।
न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत असहमति (Dissent) है और यदि नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध या अलग राय रखने को अपराध की तरह देखा जाएगा तो यह संविधान की मूल भावना के विपरीत होगा।
वाराणसी के इफ्तार बोट मामले का किया जिक्र
अपने संबोधन में न्यायमूर्ति भुइयां ने वाराणसी के चर्चित इफ्तार बोट मामले का उल्लेख किया। इस मामले में इफ्तार के दौरान नाव पर चिकन बिरयानी खाने के आरोप में 14 मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया गया था और वे लंबे समय तक जेल में रहे। उन्होंने कहा, "गंगा नदी पर चिकन खाने के खिलाफ कोई कानून नहीं है। चिकन बिरयानी खाना अपराध नहीं है। फिर किसी ऐसे काम के लिए, जो कानूनन अपराध ही नहीं है, लोगों को महीनों तक जेल में क्यों रखा गया?" उन्होंने कहा कि किसी नागरिक को केवल सामाजिक या राजनीतिक विवाद के कारण स्वतंत्रता से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के विपरीत है।
"असहमति लोकतंत्र का सार है"
न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि विचारों की विविधता, असहमति और शांतिपूर्ण विरोध उसके मूल तत्व हैं।
उन्होंने कहा कि आज सामान्य असहमति को भी कई बार आपराधिक मामलों में बदल दिया जाता है। जबकि संविधान प्रत्येक नागरिक को सरकार से असहमत होने और शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का अधिकार देता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना राष्ट्र विरोध नहीं माना जा सकता और संवैधानिक लोकतंत्र में असहमति के लिए पर्याप्त स्थान होना चाहिए।
छात्रों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का भी किया जिक्र
न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि समस्या केवल वाराणसी के मामले तक सीमित नहीं है। उन्होंने चिंता जताई कि पर्यावरण संरक्षण के लिए आवाज उठाने वाले नागरिकों और विश्वविद्यालयों में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों के खिलाफ भी कई बार आपराधिक कार्रवाई की जाती है। उन्होंने कहा कि कई मामलों में छात्रों को केवल विरोध प्रदर्शन करने के कारण गिरफ्तार किया जाता है। उन्हें 30 से 40 दिनों तक जमानत नहीं मिलती और कई बार विश्वविद्यालयों द्वारा निलंबित भी कर दिया जाता है। बाद में उन्हें अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए अदालतों का सहारा लेना पड़ता है। उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियां युवाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने से हतोत्साहित करती हैं।
जमानत में देरी और कठोर शर्तों पर चिंता
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ने कहा कि भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में सबसे बड़ी चिंता जमानत मिलने में देरी है। उन्होंने कहा कि कई मामलों में आरोपी अंततः जमानत तो प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन तब तक वे महीनों जेल में रह चुके होते हैं। उन्होंने जमानत देते समय लगाई जाने वाली कठोर शर्तों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कई मामलों में अदालतें आरोपियों को सार्वजनिक सभाओं में भाग लेने, सोशल मीडिया पर टिप्पणी करने या विदेश यात्रा करने से रोकने जैसी शर्तें लगा देती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रतिबंध कई बार नागरिकों को अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करने से रोकते हैं और न्यायपालिका को इस पहलू पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
बुलडोजर कार्रवाई पर भी की टिप्पणी
न्यायमूर्ति भुइयां ने बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए की जाने वाली बुलडोजर कार्रवाई का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी कार्रवाइयों पर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए हैं, लेकिन यदि संवैधानिक सुरक्षा समय रहते लागू हो तो कई नागरिकों के अधिकारों का बेहतर संरक्षण किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई में विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया (Due Process of Law) का पालन अनिवार्य है।
गाजा प्रदर्शन के अधिकार पर भी बोले
व्याख्यान के दौरान न्यायमूर्ति भुइयां ने मुंबई में गाजा के समर्थन में प्रस्तावित एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन से जुड़े मामले का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उन्हें आश्चर्य हुआ जब यह प्रश्न उठाया गया कि भारत के नागरिक किसी दूसरे देश में हो रही घटनाओं पर विरोध प्रदर्शन क्यों करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि भारत का लंबे समय से फिलिस्तीन के साथ राजनयिक संबंध रहा है और लोकतंत्र में नागरिकों को वैश्विक मानवीय मुद्दों पर भी शांतिपूर्ण तरीके से अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार है।
न्यायपालिका भी आलोचना से ऊपर नहीं
न्यायमूर्ति भुइयां ने कानून के छात्रों से कहा कि न्यायालयों के फैसलों का अध्ययन करें और आवश्यकता पड़ने पर उनकी आलोचनात्मक समीक्षा भी करें।
उन्होंने कहा कि किसी फैसले की आलोचना करना न्यायाधीश की आलोचना नहीं होता। उन्होंने कहा कि यदि हर कोई केवल न्यायपालिका की प्रशंसा करेगा तो न्यायिक व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश कम हो जाएगी। स्वस्थ लोकतंत्र में न्यायिक निर्णयों पर शैक्षणिक और कानूनी विमर्श होना आवश्यक है।
सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति पर जताई चिंता
न्यायमूर्ति भुइयां ने शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के संवैधानिक सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि यदि न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद सक्रिय राजनीति या सरकारी पद स्वीकार करते हैं तो इससे न्यायपालिका की निष्पक्षता को लेकर सार्वजनिक धारणा प्रभावित हो सकती है। इस विषय पर गंभीर संवैधानिक चर्चा की आवश्यकता है।
संविधान की मूल संरचना का भी किया उल्लेख
उन्होंने ऐतिहासिक केशवानंद भारती फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान की मूल संरचना (Basic Structure Doctrine) भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक उपलब्धियों में से एक है। उन्होंने कहा कि यह सिद्धांत समय की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरा है और संविधान की रक्षा में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
कानून के छात्रों को दिया संदेश
न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं हैं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों और स्वतंत्र चिंतन के केंद्र होने चाहिए। उन्होंने छात्रों से आग्रह किया कि वे संविधान, मौलिक अधिकारों और विधि के शासन (Rule of Law) के सिद्धांतों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाएं।
क्यों महत्वपूर्ण है यह व्याख्यान?
न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की टिप्पणियां ऐसे समय आई हैं जब देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विरोध प्रदर्शन, गिरफ्तारी, जमानत, निजी स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों को लेकर लगातार बहस चल रही है। उनके वक्तव्य ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा किया है कि क्या किसी ऐसे कार्य के लिए, जिसे कानून अपराध नहीं मानता, नागरिकों को गिरफ्तार कर लंबे समय तक जेल में रखना उचित है। साथ ही उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना, शांतिपूर्ण विरोध और वैचारिक असहमति को संविधान द्वारा संरक्षण प्राप्त है और इन्हें अपराध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
