education

घाटे में चल रही मोनोरेल को संजीवनी देगा महालक्ष्मी का 'ट्रैवलेटर' स्काईवॉक, मुंबई में खत्म होगा 'लास्ट-माइल Connectivity' का संकट

मुंबई के महालक्ष्मी में बन रहा देश का पहला 283 मीटर लंबा ट्रैवलेटर (मूविंग वॉकवे) स्काईवॉक न केवल उपनगरीय रेलवे, मेट्रो-3 और मोनोरेल को जोड़ेगा, बल्कि दक्षिण मुंबई में रोजाना होने वाली 20 मिनट की पैदल मशक्कत और ट्रैफिक जाम से यात्रियों को स्थायी मुक्ति दिलाएगा।

Kalpana Gautam27 जुल. 2026, 04:26 PM IST
खबर शेयर करें:
घाटे में चल रही मोनोरेल को संजीवनी देगा महालक्ष्मी का 'ट्रैवलेटर' स्काईवॉक, मुंबई में खत्म होगा 'लास्ट-माइल Connectivity' का संकट
मुंबई महानगर प्रदेश विकास प्राधिकरण (MMRDA) ने दक्षिण मुंबई के महालक्ष्मी क्षेत्र में देश के पहले ट्रैवलेटर (सरकते पट्टे) युक्त मल्टीमॉडल स्काईवॉक का 90 प्रतिशत निर्माण कार्य पूरा कर लिया है। 60 करोड़ रुपये की लागत से बन रहा यह 283 मीटर लंबा और 11 मीटर चौड़ा एलिवेटेड कॉरिडोर संत गाडगे महाराज चौक मोनोरेल टर्मिनल, एक्वा लाइन (मेट्रो 3) के महालक्ष्मी स्टेशन और वेस्टर्न रेलवे के महालक्ष्मी लोकल स्टेशन को सीधे एक छत के नीचे लाएगा। मुंबई में एक ओर जहां मेट्रो और मोनोरेल नेटवर्क का विस्तार तेजी से हो रहा है, वहीं यात्रियों के लिए एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक पहुंचना (Last-Mile Connectivity) सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। वर्तमान में चेम्बूर से आने वाली मोनोरेल से उतरकर महालक्ष्मी मेट्रो या रेलवे स्टेशन तक जाने के लिए यात्रियों को व्यस्त सजीले साने गुरुजी मार्ग पर लगभग 700 मीटर पैदल चलना पड़ता था या ऑटो-टैक्सी पर निर्भर रहना पड़ता था। इसके अलावा, चेम्बूर-सात गाडगे महाराज चौक मोनोरेल मार्ग लंबे समय से कम यात्री संख्या और वित्तीय घाटे से जूझ रहा है। यह ट्रैवलेटर स्काईवॉक मुंबई के तीनों प्रमुख सार्वजनिक परिवहन साधनों को एकीकृत कर मोनोरेल की उपयोगिता को कई गुना बढ़ा देगा।  

एमएमआरडीए द्वारा विकसित किए जा रहे इस एकीकृत पादचारी कॉरिडोर में कुल 176 मीटर लंबाई के छह द्वि-दिशात्मक (Bidirectional) ट्रैवलेटर लगाए गए हैं। हवाई अड्डों की तर्ज पर बने इस सिस्टम से यात्री या तो खड़े होकर सरकते पट्टों के जरिए आगे बढ़ सकते हैं या फिर पैदल चलकर अपनी यात्रा का समय और कम कर सकते हैं। यह आधुनिक व्यवस्था वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगजनों और भारी सामान वाले यात्रियों के लिए बेहद वरदान साबित होगी।  

इंजीनियरिंग के नजरिए से यह परियोजना बेहद जटिल मानी जा रही थी, क्योंकि महालक्ष्मी का यह इलाका भूमिगत पाइपलाइनों और भारी ट्रैफिक से घिरा हुआ है। एमएमआरडीए के इंजीनियरों ने निर्माण शुरू करने से पहले साने गुरुजी मार्ग के नीचे स्थित 1,800 मिमी व्यास की बड़ी स्टॉर्म वाटर ड्रेन (बारिश के पानी की जल निकासी लाइन) को सुरक्षित रूप से दूसरी जगह स्थानांतरित किया। इस दौरान पेयजल और सीवर पाइपलाइनों को नुकसान पहुंचाए बिना और पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए एक भी पेड़ काटे बिना यह काम पूरा किया गया। यह स्काईवॉक हर घंटे लगभग 4,500 यात्रियों की आवाजाही को आसानी से संचालित करने की क्षमता रखता है। प्रोजेक्ट शुरू होने से वर्ली, लोअर परेल और दक्षिण मुंबई के व्यावसायिक क्षेत्रों में आने-जाने वाले दैनिक यात्रियों की निजी वाहनों पर निर्भरता कम होगी।  

शहरी परिवहन विशेषज्ञों और एमएमआरडीए अधिकारियों के अनुसार:
"यह परियोजना केवल यात्रियों के चलने के लिए एक पुल नहीं है, बल्कि यह मुंबई के पूरे पब्लिक ट्रांसपोर्ट ढाँचे में कनेक्टिविटी का अंतर (Missing Link) खत्म करने वाला क्रांतिकारी कदम है। मोनोरेल, मेट्रो 3 और वेस्टर्न लोकल के आपस में जुड़ने से यात्रियों का इंटरचेंज टाइम 20 मिनट तक कम हो जाएगा और मोनोरेल की सवारी संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि होगी।"— एमएमआरडीए (MMRDA) आधिकारिक प्रवक्ता  
"घनी आबादी और व्यस्त सड़कों वाले इस क्षेत्र में बिना ट्रैफिक रोके और बिना एक भी पेड़ काटे इस 90 प्रतिशत निर्माण को पूरा करना अर्बन इंजीनियरिंग का एक बेहतरीन उदाहरण है।"