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टोइंग वैन विवाद में 7 साल बाद आया फैसला, शिकायतकर्ता ने बदला बयान तो तीनों आरोपियों को मिली राहत

वर्ष 2019 में नो-पार्किंग कार्रवाई के दौरान हुए कथित हंगामे और मारपीट के मामले में सात साल बाद अदालत का बड़ा फैसला आया है। उल्हासनगर कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका, इसलिए तीनों आरोपियों को बरी किया जाता है।

Sonali27 जुल. 2026, 04:27 PM IST
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टोइंग वैन विवाद में 7 साल बाद आया फैसला, शिकायतकर्ता ने बदला बयान तो तीनों आरोपियों को मिली राहत

महाराष्ट्र के उल्हासनगर स्थित प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (पांचवां न्यायालय) ने वर्ष 2019 में ट्रैफिक टोइंग अभियान के दौरान हुए विवाद और कथित मारपीट के मामले में आरोपी विकी शंकरलाल कुकरेजा, गुलशन नंदलाल कटारिया और नरेश मोहनदास कासेला को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट पी. ए. माने ने 20 जुलाई 2026 को सुनाए फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष भारतीय दंड संहिता की धाराओं 143 (गैरकानूनी जमाव), 145, 147 (दंगा), 323 (मारपीट), 341 (गलत तरीके से रोकना) सहपठित धारा 149 तथा महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धारा 37(1) और 135 के तहत लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।


अभियोजन के अनुसार, 5 जून 2019 को विठ्ठलवाड़ी ट्रैफिक विभाग की टोइंग वैन उल्हासनगर के दूध नाका से गांव मार्केट रोड स्थित नो-पार्किंग क्षेत्र में खड़े वाहनों को हटाने की कार्रवाई कर रही थी। आरोप था कि भाटिया हॉल के पास कुछ लोगों ने जब्त किए गए वाहन छुड़ाने को लेकर टोइंग स्टाफ से बहस शुरू कर दी। इसी दौरान तीनों आरोपियों ने कथित रूप से शिकायतकर्ता और टोइंग वैन के कर्मचारी मनोज थिटे के साथ मारपीट की तथा सरकारी कार्य में बाधा डाली। इसके बाद हिललाइन पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया।


सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने दो प्रमुख गवाहों—शिकायतकर्ता हरेश कतरे और प्रत्यक्षदर्शी मनोज थिटे—को अदालत में पेश किया। हालांकि, दोनों गवाहों ने अदालत में अपने पुलिस बयानों का समर्थन नहीं किया। शिकायतकर्ता ने मारपीट, टोइंग वैन से नीचे खींचे जाने और आरोपियों की पहचान से जुड़े आरोपों से इनकार कर दिया। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि मामले में अदालत के बाहर समझौता हो चुका है।


दूसरे गवाह मनोज थिटे ने भी अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया। उन्होंने अदालत में कहा कि उन्हें घटना और एफआईआर के संबंध में जानकारी नहीं है तथा उन्होंने भी आरोपियों के साथ समझौता होने की पुष्टि की। दोनों प्रमुख गवाहों के मुकर जाने से अभियोजन पक्ष का मामला काफी कमजोर हो गया।


अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यद्यपि आरोपियों और शिकायतकर्ता के बीच समझौता हुआ था, लेकिन भारतीय दंड संहिता की धाराएं 143, 145 और 147 जैसे अपराध दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 320 के तहत समझौतायोग्य नहीं हैं। इसलिए केवल समझौते के आधार पर मुकदमा समाप्त नहीं किया जा सकता था। इसके बावजूद, गवाहों के अदालत में अभियोजन का समर्थन न करने के कारण आरोपों के समर्थन में कोई विश्वसनीय साक्ष्य शेष नहीं बचा।

न्यायालय ने यह भी कहा कि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि आरोपियों ने गैरकानूनी जमाव बनाया, दंगा किया, शिकायतकर्ता को गलत तरीके से रोका या जानबूझकर मारपीट की। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई स्वतंत्र साक्ष्य भी नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि तीनों आरोपियों ने सामूहिक उद्देश्य के तहत अपराध किया था। इसी प्रकार महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों के समर्थन में भी पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे।


अदालत ने कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली का मूल सिद्धांत है कि अभियोजन पक्ष को प्रत्येक आरोप संदेह से परे सिद्ध करना होता है। यदि मुख्य गवाह ही अभियोजन का साथ नहीं दें और स्वतंत्र साक्ष्य उपलब्ध न हों, तो आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इन्हीं कारणों से अदालत ने तीनों आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि अदालत ने आरोपियों को "निर्दोष घोषित" नहीं किया, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह माना कि अभियोजन आवश्यक कानूनी मानक के अनुसार अपराध सिद्ध करने में विफल रहा। इसलिए उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी किया गया।