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India Rare Earth Mission: चीन की निर्भरता घटाने के लिए भारत की नई रणनीति
भारत रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रेयर अर्थ मिनरल्स (Rare Earth Elements) के क्षेत्र में अपनी क्षमता बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरण, स्मार्टफोन और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाले इन खनिजों की मांग लगातार बढ़ रही है। इसी बीच कनाडा की एक कंपनी भारत में रेयर अर्थ प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित करने की संभावनाएं तलाश रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कनाडाई फर्म एनरवॉक्सा (Enervoxa) भारत में रेयर अर्थ मिनरल्स निकालने और उनकी प्रोसेसिंग के लिए परियोजना शुरू करने की योजना बना रही है। इसके लिए कंपनी भारत की प्रमुख मेटल और माइनिंग कंपनियों के साथ साझेदारी की संभावनाएं देख रही है। इसमें अनिल अग्रवाल की अगुवाई वाली वेदांता, हिंदाल्को इंडस्ट्रीज और सरकारी कंपनी नाल्को (NALCO) जैसी कंपनियों के नाम शामिल हैं। हालांकि अभी यह बातचीत शुरुआती चरण में है और किसी अंतिम समझौते की घोषणा नहीं हुई है।
रेड मड से निकाले जाएंगे रेयर अर्थ तत्व
इस परियोजना की सबसे खास बात यह है कि कंपनी एल्युमिनियम उद्योग से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थ "रेड मड" (Red Mud) से रेयर अर्थ तत्व निकालने की तकनीक पर काम कर रही है। रेड मड एल्युमिनियम उत्पादन के दौरान बॉक्साइट अयस्क से निकलने वाला लाल रंग का औद्योगिक अपशिष्ट होता है। इसमें कई महत्वपूर्ण खनिज मौजूद होते हैं, जिनमें रेयर अर्थ एलिमेंट्स भी शामिल हो सकते हैं। यदि इस तकनीक को बड़े पैमाने पर सफलतापूर्वक लागू किया जाता है, तो भारत को दोहरा फायदा मिल सकता है। पहला, औद्योगिक कचरे का बेहतर उपयोग होगा और दूसरा, रेयर अर्थ सप्लाई चेन में देश की निर्भरता कम हो सकती है।
वेदांता, हिंदाल्को और नाल्को क्यों हैं महत्वपूर्ण?
रेयर अर्थ प्रोसेसिंग के लिए केवल खनिज संसाधन ही नहीं, बल्कि बड़े स्तर पर औद्योगिक ढांचे, तकनीक और निवेश की जरूरत होती है। इसी वजह से बड़ी मेटल कंपनियां इस क्षेत्र में अहम भूमिका निभा सकती हैं। वेदांता देश की प्रमुख प्राकृतिक संसाधन कंपनियों में शामिल है और एल्युमिनियम समेत कई मेटल क्षेत्रों में सक्रिय है। कंपनी के पास बड़े औद्योगिक प्लांट और खनन क्षेत्र में अनुभव है। हिंदाल्को इंडस्ट्रीज भी एल्युमिनियम उत्पादन की बड़ी कंपनियों में शामिल है। वहीं नाल्को एक सरकारी कंपनी है, जो एल्युमिनियम उत्पादन और खनिज क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इन कंपनियों के साथ साझेदारी से विदेशी तकनीक और भारतीय औद्योगिक क्षमता को जोड़ने में मदद मिल सकती है।
रेयर अर्थ मिनरल्स क्यों हैं इतने महत्वपूर्ण?
रेयर अर्थ एलिमेंट्स आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इनका इस्तेमाल कई हाई-टेक उत्पादों में होता है। इनका उपयोग मुख्य रूप से:
इलेक्ट्रिक वाहन की मोटर और बैटरी तकनीक
विंड टर्बाइन
स्मार्टफोन और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण
सेमीकंडक्टर उद्योग
मिसाइल और रक्षा उपकरण
हाई-पावर मैग्नेट निर्माण
में किया जाता है। इन खनिजों की वैश्विक सप्लाई चेन में चीन का लंबे समय से बड़ा प्रभाव रहा है। ऐसे में भारत सहित कई देश अपनी सप्लाई चेन को मजबूत करने और किसी एक देश पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रोसेसिंग क्षमता
भारत के पास रेयर अर्थ मिनरल्स के पर्याप्त भंडार मौजूद हैं, लेकिन खनन के बाद उन्हें अलग करने, शुद्ध करने और औद्योगिक उपयोग योग्य बनाने की प्रोसेसिंग क्षमता अभी सीमित है। रेयर अर्थ सेक्टर में सबसे महत्वपूर्ण चरण केवल खनन नहीं बल्कि प्रोसेसिंग और मैग्नेट निर्माण है। इसी क्षेत्र में भारत को अपनी क्षमता बढ़ाने की जरूरत है। सरकार ने क्रिटिकल मिनरल्स को रणनीतिक प्राथमिकता देते हुए घरेलू उत्पादन और प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया है।
चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिश
दुनिया भर में रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। इलेक्ट्रिक वाहन और ग्रीन एनर्जी सेक्टर के विस्तार के साथ इन खनिजों की मांग और बढ़ने की संभावना है। भारत अपनी घरेलू क्षमता विकसित कर वैश्विक सप्लाई चेन में मजबूत भूमिका हासिल करना चाहता है। विदेशी कंपनियों के साथ तकनीकी साझेदारी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
परियोजना से भारत को क्या फायदा हो सकता है?
अगर यह परियोजना सफल होती है तो इसके कई संभावित फायदे हो सकते हैं:
रेयर अर्थ मिनरल्स की घरेलू प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ेगी।
इलेक्ट्रिक वाहन और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को मजबूती मिलेगी।
रक्षा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता बेहतर होगी।
औद्योगिक कचरे का उपयोगी इस्तेमाल हो सकेगा।
भारत वैश्विक क्रिटिकल मिनरल सप्लाई चेन में अपनी भूमिका बढ़ा सकेगा।
अभी आगे क्या होगा?
फिलहाल विदेशी कंपनी और भारतीय कंपनियों के बीच बातचीत शुरुआती स्तर पर है। निवेश, प्लांट की जगह, तकनीकी साझेदारी और उत्पादन क्षमता जैसे मुद्दों पर आगे फैसला लिया जाएगा। यदि यह साझेदारी सफल होती है, तो भारत के लिए यह रेयर अर्थ सेक्टर में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है और देश को भविष्य की तकनीकी अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी खनिजों में आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिल सकती है।
