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'दुश्मनी में झूठा आरोप या असली हमला?' ठाणे कोर्ट ने 10 साल पुराने मामले में आरोपी को किया बरी
"दुश्मनी दोधारी तलवार होती है"—सुप्रीम कोर्ट के इस सिद्धांत का हवाला देते हुए ठाणे कोर्ट ने लकड़ी से हमले के मामले में बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने हथियार की संदिग्ध बरामदगी और पारिवारिक गवाहों की गवाही में कमियों को देखते हुए आरोपी को बरी कर दिया।

महाराष्ट्र के ठाणे स्थित प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (फर्स्ट कोर्ट) ने 29 जनवरी 2016 को हुए कथित लकड़ी से हमले के मामले में आरोपी देविदास आत्माराम मुंडे को बरी कर दिया है। न्यायालय ने 22 जुलाई 2026 को फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष भारतीय दंड संहिता की धारा 325 (गंभीर चोट पहुंचाना) के तहत लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।
मामला क्या था?
अभियोजन के अनुसार, 29 जनवरी 2016 की शाम करीब 5:30 बजे दिवा (ठाणे) में शिकायतकर्ता जनार्दन मुंडे अपने घर के दरवाजे पर खड़े थे। आरोप था कि आरोपी देविदास मुंडे लकड़ी का डंडा लेकर आया और शिकायतकर्ता के सिर पर वार करने की कोशिश की। शिकायतकर्ता ने बचाव में हाथ आगे किया, जिससे डंडा उसके हाथ पर लगा और फ्रैक्चर हो गया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
मेडिकल रिपोर्ट में क्या मिला?
अस्पताल के मेडिकल अधिकारी ने अदालत में बताया कि घायल के बाएं हाथ में ब्लंट ट्रॉमा और रेडियस-अल्ना जॉइंट में फ्रैक्चर पाया गया। डॉक्टर ने चोट को गंभीर (Grievous) बताया, लेकिन जिरह के दौरान यह भी स्वीकार किया कि ऐसी चोट किसी व्यक्ति के खुरदरी सतह पर गिरने से भी संभव है। यह तथ्य अदालत के लिए महत्वपूर्ण रहा।
कोर्ट ने किन विरोधाभासों पर सवाल उठाए?
अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता ने कहा कि घटना के समय घर में केवल उसकी पत्नी और पोते मौजूद थे, जबकि बहू सविता मुंडे ने दावा किया कि वह भी घटनास्थल पर मौजूद थी। न्यायालय ने कहा कि ये दोनों बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते और इससे बहू की मौजूदगी पर उचित संदेह पैदा होता है।
जमीन विवाद बना केस की बड़ी कड़ी
सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता, उसकी पत्नी और बहू तीनों ने स्वीकार किया कि आरोपी के साथ उनका पुराना जमीन विवाद चल रहा था और शिकायतकर्ता के बेटे ने भी आरोपी के खिलाफ पहले शिकायत की थी। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि दुश्मनी दोधारी हथियार होती है—यह अपराध का कारण भी हो सकती है और झूठे फंसाए जाने की संभावना भी पैदा कर सकती है।
लकड़ी की बरामदगी पर भी उठे सवाल
अदालत ने जांच में एक महत्वपूर्ण विरोधाभास दर्ज किया। जांच अधिकारी ने कहा कि लकड़ी का डंडा घटनास्थल से जब्त किया गया था, जबकि शिकायतकर्ता की पत्नी ने बयान दिया कि वही लकड़ी वे लोग पुलिस स्टेशन लेकर गए थे। न्यायालय ने कहा कि जब हथियार की बरामदगी को लेकर ही दो अलग-अलग संस्करण हों, तो जब्ती पंचनामा और जांच की विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा होता है।
रिश्तेदार गवाहों पर कोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता, उसकी पत्नी और बहू एक ही परिवार के सदस्य हैं और जमीन विवाद के कारण वे "इंटरेस्टेड विटनेस" (Interested Witnesses) माने जा सकते हैं। हालांकि केवल रिश्तेदार होना गवाही को खारिज करने का आधार नहीं है, लेकिन जब रिश्तेदारी के साथ पुरानी दुश्मनी और बयानों में विरोधाभास भी मौजूद हों, तो अदालत को अतिरिक्त सावधानी बरतनी होती है।
अंतिम फैसला
इन सभी परिस्थितियों—विरोधाभासी गवाही, जमीन विवाद, हथियार की बरामदगी पर संदेह और मेडिकल संभावना—को देखते हुए अदालत ने कहा कि अभियोजन आरोपी के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर सका। इसलिए देविदास आत्माराम मुंडे को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 248(1) के तहत धारा 325 IPC के आरोप से बरी कर दिया गया। अदालत ने जब्त लकड़ी को अपील अवधि समाप्त होने के बाद नष्ट करने और आरोपी को धारा 437-A के तहत ₹10,000 के निजी मुचलके पर उपस्थित रहने का निर्देश भी दिया।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि अदालत ने यह नहीं कहा कि शिकायतकर्ता को चोट नहीं लगी, बल्कि यह कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी के विरुद्ध अपराध संदेह से परे सिद्ध नहीं किया जा सका।
