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पति पर क्रूरता, मारपीट और फिनाइल पिलाने के आरोप... लेकिन कोर्ट में पलटी शिकायतकर्ता, 5 साल बाद चारों आरोपी बरी

महाराष्ट्र के ठाणे जिले की कल्याण अदालत ने दहेज उत्पीड़न, मारपीट और जानलेवा हमले जैसे गंभीर आरोपों वाले एक आपराधिक मामले में पति समेत चार आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने पाया कि मुकदमे के दौरान स्वयं शिकायतकर्ता महिला अपने ही आरोपों से पीछे हट गई और उसने अदालत में स्वीकार किया कि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो चुका है। ऐसे में अभियोजन पक्ष भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A, 324, 504 और 34 के तहत लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।

Sonali27 जुल. 2026, 04:43 PM IST
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पति पर क्रूरता, मारपीट और फिनाइल पिलाने के आरोप... लेकिन कोर्ट में पलटी शिकायतकर्ता, 5 साल बाद चारों आरोपी बरी

महाराष्ट्र के ठाणे जिले की कल्याण अदालत ने दहेज उत्पीड़न, मारपीट और जानलेवा हमले जैसे गंभीर आरोपों वाले एक आपराधिक मामले में पति समेत चार आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने पाया कि मुकदमे के दौरान स्वयं शिकायतकर्ता महिला अपने ही आरोपों से पीछे हट गई और उसने अदालत में स्वीकार किया कि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो चुका है। ऐसे में अभियोजन पक्ष भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A, 324, 504 और 34 के तहत लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।

यह फैसला न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC), कल्याण की अदालत में पीठासीन अधिकारी श्रीमती एस. ए. पठाण ने 17 जुलाई 2026 को सुनाया। यह मामला नियमित फौजदारी खटला क्रमांक 775/2021 से संबंधित था, जिसमें कोळसेवाडी पुलिस स्टेशन, कल्याण में दर्ज अपराध क्रमांक 466/2021 के आधार पर आरोपपत्र दाखिल किया गया था।

क्या थे आरोप?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता का विवाह 5 फरवरी 2018 को आरोपी योगेश रोहिदास पवार से हुआ था। आरोप था कि मई 2018 से 8 सितंबर 2021 के बीच पति और उसके परिवार के अन्य सदस्यों ने महिला के साथ मानसिक और शारीरिक क्रूरता की। शिकायत में कहा गया था कि पति उसकी चरित्र पर संदेह करता था, डंडे से मारपीट करता था, गाली-गलौज करता था, घर छोड़ने के लिए दबाव बनाता था, फिनाइल पिलाने का प्रयास किया था और चाकू से हमला कर घायल भी किया था। इन आरोपों के आधार पर पुलिस ने IPC की धारा 498A, 324, 504 और 34 के तहत मामला दर्ज किया था।

मुकदमे के दौरान बदल गया पूरा मामला
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष केवल शिकायतकर्ता को ही गवाह के रूप में पेश कर सका। अदालत में गवाही देते हुए शिकायतकर्ता ने स्वीकार किया कि एफआईआर पर उसके हस्ताक्षर हैं, लेकिन उसने यह भी कहा कि शिकायत में लिखी गई बातों की उसे जानकारी नहीं है। उसने अभियोजन पक्ष के कई महत्वपूर्ण आरोपों से भी इनकार कर दिया। जिरह के दौरान शिकायतकर्ता ने यह भी स्वीकार किया कि उसके और आरोपियों के बीच समझौता हो चुका है तथा अब उसे इस मुकदमे को आगे बढ़ाने में कोई रुचि नहीं है। अदालत के रिकॉर्ड में समझौते संबंधी आवेदन और पुरसिस भी दर्ज किए गए।

अदालत ने क्या कहा?
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि जब मुख्य शिकायतकर्ता ने ही अपने आरोपों का समर्थन नहीं किया और अभियोजन पक्ष कोई अन्य ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, तब आरोपियों के विरुद्ध अपराध संदेह से परे सिद्ध नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने कहा कि केवल आरोप लगाए जाने से दोष सिद्ध नहीं हो जाता, बल्कि अभियोजन पक्ष पर उन्हें विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर साबित करने की जिम्मेदारी होती है। इस मामले में ऐसा नहीं हो सका।

चारों आरोपी हुए बरी
अदालत ने आरोपी योगेश रोहिदास पवार, रोहिदास बुद्धा पवार, अनिता रोहिदास पवार और कीर्ती रोहिदास पवार को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 248(1) के तहत IPC की धारा 498A, 324, 504 और 34 के आरोपों से बरी कर दिया। साथ ही उनके जमानत बंधपत्र रद्द कर दिए गए और उन्हें दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437A के तहत आवश्यक बांड प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया।