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भारत के 166 प्रमुख जलाशयों में पानी का भंडार चिंताजनक, 54 में सामान्य से 80% या उससे कम स्टोरेज; दक्षिण भारत सबसे ज्यादा प्रभावित

भारत के 166 प्रमुख जलाशयों में पानी का भंडारण इस मानसून सीजन में चिंता का विषय बना हुआ है। 1 जून से 25 जुलाई 2026 के बीच देश में सामान्य से 15 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई, जबकि 54 प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर सामान्य भंडारण के 80 प्रतिशत या उससे कम रहा। इनमें 22 जलाशयों में सामान्य के मुकाबले आधा या उससे भी कम पानी है। दक्षिण भारत के कई जलाशयों की स्थिति विशेष रूप से कमजोर है। कम जल भंडारण का असर सिंचाई, खरीफ और रबी फसलों, पेयजल आपूर्ति तथा जलविद्युत उत्पादन पर पड़ सकता है। हालांकि मानसून अभी जारी है और अच्छी बारिश से स्थिति सुधर सकती है, लेकिन यह आंकड़े जल संरक्षण, बेहतर जलाशय प्रबंधन, वर्षा जल संचयन और कुशल सिंचाई की तत्काल जरूरत को रेखांकित करते हैं।

Anshuman Mishra29 जुल. 2026, 02:07 PM IST
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भारत के 166 प्रमुख जलाशयों में पानी का भंडार चिंताजनक, 54 में सामान्य से 80% या उससे कम स्टोरेज; दक्षिण भारत सबसे ज्यादा प्रभावित

नई दिल्ली: देश में मानसून के तीसरे सप्ताह में बारिश लगभग सामान्य रहने के बावजूद भारत के प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर अभी भी चिंता का विषय बना हुआ है। 16 से 22 जुलाई के बीच देश में सामान्य से सिर्फ 1 प्रतिशत कम बारिश हुई, लेकिन 1 जून से 25 जुलाई तक पूरे मानसून सीजन में बारिश सामान्य से 15 प्रतिशत कम रही। इस कमजोर शुरुआत और बारिश के असमान वितरण का असर देश के बड़े जलाशयों पर साफ दिखाई दे रहा है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 23 जुलाई तक देश के 166 प्रमुख जलाशयों में कुल 70.432 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) पानी उपलब्ध था। यह इन जलाशयों की कुल लाइव स्टोरेज क्षमता का केवल 38.37 प्रतिशत है। पिछले साल इसी अवधि में इन जलाशयों में 110.519 BCM पानी था, जबकि सामान्य भंडारण 75.661 BCM माना जाता है। यानी मौजूदा भंडारण पिछले साल के स्तर का केवल 63.73 प्रतिशत और सामान्य भंडारण का 93.09 प्रतिशत है। 


54 जलाशयों में सामान्य से 80 प्रतिशत या उससे कम पानी

केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 166 प्रमुख जलाशयों में से 54 में पानी का भंडारण सामान्य स्तर के 80 प्रतिशत या उससे कम है। इनमें से 22 जलाशयों में सामान्य भंडारण की तुलना में आधा या उससे भी कम पानी मौजूद है। इनमें श्रीशैलम, नागार्जुन सागर, तुंगभद्रा, कृष्णराज सागर, पेरियार, तवा, वैगई, अलीयार, सिंगूर और मौदहा जैसे महत्वपूर्ण जलाशय शामिल हैं। यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इन जलाशयों का पानी केवल पीने के लिए ही नहीं, बल्कि सिंचाई, उद्योग और जलविद्युत उत्पादन जैसी जरूरतों के लिए भी इस्तेमाल होता है। मानसून के दौरान पर्याप्त पानी जमा नहीं होने पर आने वाले महीनों में इन सभी क्षेत्रों पर दबाव बढ़ सकता है।


दक्षिण भारत में सबसे गंभीर स्थिति

क्षेत्रीय आंकड़ों में दक्षिण भारत की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक दिखाई देती है। क्षेत्र के 47 प्रमुख जलाशयों में 23 जुलाई तक उनकी कुल क्षमता का केवल 30.26 प्रतिशत पानी था। पिछले साल इसी समय यह आंकड़ा 69.43 प्रतिशत और सामान्य स्तर 44.18 प्रतिशत था।

कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना में जलाशयों के भंडारण में मध्यम स्तर की कमी दर्ज की गई है। तेलंगाना में जलाशयों का भंडारण सामान्य से 57 प्रतिशत कम बताया गया है। यह स्थिति कृषि सिंचाई और शहरी जल आपूर्ति के लिए आने वाले समय में चुनौती पैदा कर सकती है। 


उत्तर और मध्य भारत में भी दबाव

जल संकट का दबाव केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं है। उत्तर भारत के प्रमुख जलाशय अपनी कुल क्षमता के केवल 35.58 प्रतिशत तक भरे हैं, जबकि मध्य भारत में यह स्तर 39.11 प्रतिशत है। दोनों क्षेत्रों में भंडारण पिछले वर्ष और सामान्य स्तर की तुलना में कम है। पूर्वी भारत में स्थिति सामान्य से बेहतर बताई गई है, लेकिन यहां भी पिछले वर्ष की तुलना में पानी कम है। वहीं पश्चिमी क्षेत्र, जिसमें गुजरात, महाराष्ट्र और गोवा शामिल हैं, एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहां जलाशयों का भंडारण सामान्य से बेहतर है। हालांकि, यहां भी पानी का स्तर पिछले साल की तुलना में कम है।


बारिश हुई, फिर भी जलाशय क्यों नहीं भर पाए?

जलाशयों की मौजूदा स्थिति का सबसे बड़ा कारण मानसून का असमान वितरण है। जून में देशभर में बारिश सामान्य से करीब 40 प्रतिशत कम रही। जुलाई के तीसरे सप्ताह में बारिश में सुधार जरूर हुआ, लेकिन इससे जून की कमी पूरी तरह दूर नहीं हो सकी। इसके अलावा, हर जगह हुई बारिश का पानी जलाशयों तक समान मात्रा में नहीं पहुंचा। कई जलाशयों के जलग्रहण क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश हुई। दूसरी ओर, कुछ क्षेत्रों में कम समय में अत्यधिक बारिश होने के कारण पानी तेजी से बह गया और उसका पर्याप्त हिस्सा जलाशयों में जमा नहीं हो सका। इससे यह स्पष्ट होता है कि किसी क्षेत्र में भारी बारिश होना अपने आप में जलाशयों के भरने की गारंटी नहीं है। बारिश का समय, स्थान, तीव्रता और जलग्रहण क्षेत्रों की स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।


दक्षिणी प्रायद्वीप में बारिश की कमी बड़ी चिंता

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, 16 से 22 जुलाई के बीच देश में 66.8 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश 67.3 मिलीमीटर होती है। यानी इस सप्ताह बारिश में केवल 1 प्रतिशत की कमी रही। लेकिन क्षेत्रीय तस्वीर अलग थी। मध्य भारत में इस अवधि में सामान्य से 10 प्रतिशत अधिक बारिश हुई और उत्तर-पश्चिम भारत में 5 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई। इसके विपरीत दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में बारिश सामान्य से 26 प्रतिशत कम रही। यही असमानता दक्षिण भारत के जलाशयों की कमजोर स्थिति का एक प्रमुख कारण बन रही है।


पानी की लगातार खपत भी बढ़ा रही दबाव

कम बारिश के अलावा जलाशयों से लगातार पानी निकाले जाने का भी भंडारण पर असर पड़ रहा है। सिंचाई, घरेलू जल आपूर्ति, उद्योग और जलविद्युत उत्पादन के लिए पानी का उपयोग जारी है। केंद्रीय जल आयोग ने भी अपने बुलेटिन में स्पष्ट किया है कि पानी के उपयोग के कारण जलाशयों में उपलब्ध भंडारण लगातार घट रहा है। मानसून के दौरान जलाशयों में पानी की आवक और पानी की खपत के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। यदि पानी की निकासी तेज रहती है और बारिश अपेक्षा के अनुरूप नहीं होती, तो जलाशयों में पर्याप्त भंडारण तैयार करना मुश्किल हो सकता है।


कृषि और खरीफ फसलों के लिए चिंता

जलाशयों में कम पानी का असर सबसे पहले कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है। भारत में खरीफ सीजन की खेती मानसून और सिंचाई दोनों पर निर्भर करती है। जिन क्षेत्रों में बारिश कम हुई है, वहां किसान सिंचाई के लिए जलाशयों और भूजल पर अधिक निर्भर हो सकते हैं।

यदि जलाशयों में पानी कम रहता है, तो सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर फसल उत्पादन और किसानों की आय पर पड़ने की आशंका है। अगर मानसून के बाकी हिस्से में पर्याप्त बारिश नहीं हुई, तो कम भंडारण का असर आगामी रबी सीजन पर भी पड़ सकता है। हालांकि, मौजूदा आंकड़ों के आधार पर तत्काल देशव्यापी कृषि संकट की घोषणा करना उचित नहीं होगा, क्योंकि मानसून अभी जारी है और आने वाले हफ्तों में अच्छी बारिश से जलाशयों की स्थिति बदल सकती है। लेकिन जिन राज्यों में भंडारण सामान्य से काफी कम है, वहां पहले से जल प्रबंधन की तैयारी करना जरूरी है।


पेयजल और बिजली पर भी असर का खतरा

प्रमुख जलाशय कई शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए पेयजल का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। यदि मानसून के अंत तक पर्याप्त पानी जमा नहीं होता है, तो गर्मी के महीनों में पेयजल आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। जलविद्युत उत्पादन भी जलाशयों के पानी पर निर्भर करता है। कम जलस्तर की स्थिति में बिजली उत्पादन के लिए उपलब्ध पानी सीमित हो सकता है। इससे कुछ क्षेत्रों को बिजली की मांग पूरी करने के लिए अन्य ऊर्जा स्रोतों पर अधिक निर्भर होना पड़ सकता है। हालांकि, इसका असर हर राज्य में समान नहीं होगा। यह स्थानीय जलाशय क्षमता, पानी की मांग, वर्षा और बिजली व्यवस्था पर निर्भर करेगा।


बाढ़ और जल संकट का विरोधाभास

इस साल की स्थिति एक महत्वपूर्ण विरोधाभास भी दिखाती है। एक ओर देश के कुछ हिस्सों में भारी बारिश और बाढ़ की स्थिति बन सकती है, वहीं दूसरी ओर कई प्रमुख जलाशय सामान्य से कम पानी के साथ रह सकते हैं। इसका कारण बारिश का असमान वितरण है। यदि बहुत कम समय में अत्यधिक बारिश होती है, तो पानी का बड़ा हिस्सा तेजी से बह जाता है। इसके विपरीत, लंबे समय तक मध्यम और लगातार बारिश जलग्रहण क्षेत्रों को बेहतर तरीके से recharge करने और जलाशयों में पानी पहुंचाने में अधिक मदद कर सकती है। इसलिए भविष्य की जल नीति में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि किसी राज्य में कितनी बारिश हुई। यह भी देखना होगा कि बारिश कहां हुई, कब हुई और उसका कितना हिस्सा जलाशयों तथा भूजल स्रोतों तक पहुंचा।


आगे क्या करना जरूरी है

मौजूदा स्थिति को देखते हुए सबसे जरूरी कदम क्षेत्र-विशिष्ट जल प्रबंधन है। जिन राज्यों और जिलों में जलाशयों का भंडारण सामान्य से कम है, वहां पानी के इस्तेमाल की प्राथमिकता तय करनी होगी। पीने के पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ-साथ सिंचाई और औद्योगिक उपयोग के लिए पानी का वैज्ञानिक प्रबंधन जरूरी होगा। माइक्रो-इरिगेशन, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और पानी की बर्बादी रोकने जैसे उपायों को तेजी से लागू करना होगा। कृषि क्षेत्र में भी कम पानी वाली फसलों और फसल विविधीकरण को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण हो सकता है। शहरों में पानी के रिसाव को रोकना और उपचारित अपशिष्ट जल का दोबारा उपयोग बढ़ाना भी जल सुरक्षा को मजबूत कर सकता है।


लंबी अवधि में केवल बड़े बांधों पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय तालाबों, झीलों, जलग्रहण क्षेत्रों और पारंपरिक जल संरचनाओं को पुनर्जीवित करना भी जरूरी है। इससे बारिश के पानी को स्थानीय स्तर पर रोकने और भूजल recharge करने में मदद मिल सकती है। कुल मिलाकर, 2026 का मानसून भारत के लिए बारिश और जल उपलब्धता की एक असमान तस्वीर सामने ला रहा है। 16 से 22 जुलाई के बीच बारिश लगभग सामान्य रही, लेकिन 1 जून से 25 जुलाई तक संचयी बारिश अभी भी सामान्य से 15 प्रतिशत कम है। इसी बीच 166 प्रमुख जलाशयों में उपलब्ध पानी पिछले साल की तुलना में करीब 36 प्रतिशत कम है और 54 जलाशयों में भंडारण सामान्य के 80 प्रतिशत या उससे नीचे है। इनमें 22 जलाशयों की स्थिति और गंभीर है, जहां सामान्य की तुलना में आधा या उससे कम पानी है।


फिलहाल मानसून का काफी समय बाकी है, इसलिए आने वाले हफ्तों की बारिश जलाशयों की स्थिति को बेहतर कर सकती है। लेकिन मौजूदा आंकड़े यह साफ संकेत देते हैं कि भारत को जल सुरक्षा के लिए केवल मानसून की बारिश पर निर्भर रहने के बजाय बेहतर जल प्रबंधन की जरूरत है। बारिश का वैज्ञानिक आकलन, जलाशयों की नियमित निगरानी, पानी की मांग का प्रबंधन, कुशल सिंचाई और स्थानीय जल स्रोतों का संरक्षण ही भविष्य में कृषि, पेयजल और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने का रास्ता हो सकता है।