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41 साल बाद आया इंसाफ: हत्या की कोशिश में दोषी पूर्व पुलिसकर्मी को हाईकोर्ट से राहत, सजा घटी लेकिन अपराध बरकरार
करीब चार दशक तक अदालतों में लंबित रहे 1984 के हत्या की कोशिश के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने पूर्व पुलिस कॉन्स्टेबल बक्स उल्लाह उर्फ बुरे अली की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए उसकी 6 साल की जेल की सजा घटाकर 4 साल कर दी। न्यायालय ने आरोपी की उम्र और 41 साल तक लंबित रही अपील को राहत का आधार माना, लेकिन साफ कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत हत्या की कोशिश के अपराध को पूरी तरह साबित करते हैं। साथ ही कोर्ट ने ₹35,000 मुआवजा देने और दोषी को दो सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का निर्देश भी दिया।

करीब 41 साल तक लंबित रही आपराधिक अपील पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए वर्ष 1984 के हत्या की कोशिश (Attempt to Murder) के मामले में दोषी पूर्व पुलिस कॉन्स्टेबल बक्स उल्लाह उर्फ बुरे अली की दोषसिद्धि तो बरकरार रखी, लेकिन उसकी सजा 6 वर्ष की कठोर कैद से घटाकर 4 वर्ष कर दी। अदालत ने साथ ही दोषी पर लगाए गए जुर्माने को बढ़ाकर ₹40,000 कर दिया और निर्देश दिया कि इसमें से ₹35,000 पीड़ित या उसकी मृत्यु होने की स्थिति में उसके कानूनी उत्तराधिकारियों को मुआवजे के रूप में दिए जाएं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संतोष राय की एकलपीठ ने 25 जुलाई 2026 को यह आदेश पारित किया। अदालत ने माना कि आरोपी अब 60 वर्ष से अधिक आयु का हो चुका है और उसकी अपील 41 वर्षों तक लंबित रही, जिसमें उसकी कोई गलती नहीं थी। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य हत्या की कोशिश के अपराध को पूरी तरह सिद्ध करते हैं, इसलिए दोषसिद्धि में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
क्या है पूरा मामला?
मामला 21 अगस्त 1984 का है। अभियोजन के अनुसार, बक्स उल्लाह उस समय बरेली में पुलिस कॉन्स्टेबल के पद पर तैनात था। वह बिना अनुमति अपने मुख्यालय से अपने गृह नगर बीसलपुर पहुंचा। वहां उसने अपने आध्यात्मिक गुरु पीर सैयद अयूब अली पर चाकू से हमला कर दिया।
अभियोजन के अनुसार आरोपी को यह शिकायत थी कि उसके गुरु ने टेप रिकॉर्डर चोरी के मामले में उसे बदनाम किया था। जब घायल अस्पताल की ओर भागने लगा तो आरोपी ने उसका पीछा किया और दो अलग-अलग स्थानों पर उस पर कई बार चाकू से हमला किया।
ट्रायल कोर्ट ने किन आधारों पर सुनाई थी सजा?
पीलीभीत के स्पेशल जज एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने सितंबर 1985 में घायल गवाह की गवाही, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट तथा बरामदगी के आधार पर आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307 (हत्या की कोशिश) के तहत दोषी ठहराते हुए 6 वर्ष की कठोर कैद और ₹600 जुर्माने की सजा सुनाई थी।
ट्रायल कोर्ट ने यह भी माना था कि घटना की FIR तुरंत दर्ज हुई थी तथा आरोपी के कब्जे से खून से सना चाकू और पुलिस की वर्दी बरामद हुई थी, जिससे अभियोजन का मामला मजबूत हुआ।
हाईकोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?
अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि घायल और प्रत्यक्षदर्शी गवाह पीड़ित के शिष्य और करीबी होने के कारण पक्षपाती थे। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि घटना स्थल को लेकर संदेह है क्योंकि कथित पहली जगह पर खून के निशान नहीं मिले।
इसके अलावा आरोपी की बढ़ती उम्र और अपील के चार दशक से अधिक समय तक लंबित रहने को देखते हुए सजा कम करने की भी मांग की गई।
हाईकोर्ट ने क्यों नहीं बदली दोषसिद्धि?
हाईकोर्ट ने कहा कि घायल व्यक्ति की गवाही अत्यंत विश्वसनीय है क्योंकि वह स्वयं घटना का शिकार था। उसकी गवाही की पुष्टि दो स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शियों ने भी की। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई महत्वपूर्ण विरोधाभास नहीं है जिससे उसकी गवाही अविश्वसनीय मानी जाए।
कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट का भी विस्तार से विश्लेषण किया। अदालत ने पाया कि पीड़ित के शरीर पर 10 कटे हुए घाव और एक खरोंच थी। इनमें पेट पर लगा गंभीर घाव इतना गहरा था कि आंतें बाहर निकल आई थीं। अदालत ने कहा कि चोटों की संख्या और प्रकृति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि हमला जान से मारने की नीयत से लगातार किया गया था।
अदालत ने यह भी माना कि आरोपी के पास से बरामद खून से सना चाकू और पुलिस की वर्दी अभियोजन के मामले को और मजबूत बनाते हैं। इसलिए IPC की धारा 307 के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी गई।
फिर सजा क्यों कम की गई?
न्यायमूर्ति संतोष राय ने कहा कि सजा तय करते समय अपराध की गंभीरता के साथ-साथ आरोपी की वर्तमान आयु और न्यायिक प्रक्रिया में हुई असाधारण देरी को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
कोर्ट ने माना कि अपील लगभग 41 वर्षों तक लंबित रही और इस देरी के लिए आरोपी जिम्मेदार नहीं था। वर्तमान में उसकी आयु भी 60 वर्ष से अधिक हो चुकी है। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने 6 वर्ष की कठोर कैद को घटाकर 4 वर्ष कर दिया।
मुआवजा और सरेंडर का आदेश
हाईकोर्ट ने दोषी पर लगाया गया जुर्माना ₹600 से बढ़ाकर ₹40,000 कर दिया। अदालत ने आदेश दिया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 357 के तहत इस राशि में से ₹35,000 घायल व्यक्ति अथवा उसकी मृत्यु होने पर उसके कानूनी उत्तराधिकारियों को मुआवजे के रूप में दिए जाएं।
साथ ही अदालत ने आरोपी, जो फिलहाल जमानत पर है, को दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण कर शेष सजा काटने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसे CrPC की धारा 428 के तहत पहले जेल में बिताई गई अवधि का 'सेट-ऑफ' (समायोजन) मिलेगा।
फैसले का महत्व
हाईकोर्ट के इस फैसले में एक ओर हत्या की कोशिश जैसे गंभीर अपराध में दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया, वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट किया गया कि सजा तय करते समय न्यायालय आरोपी की उम्र, अपील के निस्तारण में हुई असाधारण देरी और अन्य मानवीय परिस्थितियों पर भी विचार कर सकता है। यह निर्णय सजा निर्धारण के सिद्धांतों को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।
मामले का विवरण
मामला: Bux Ullah Alias Burey Ali vs State of Uttar Pradesh
पीठ: न्यायमूर्ति संतोष राय
आदेश की तारीख: 25 जुलाई 2026
