government

वकील बनकर नहीं, 'सामाजिक कार्यकर्ता' बनकर पहुंचा कोर्ट! इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- क्लाइंट के हित में दायर PIL न्यायिक प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग

जनहित याचिकाओं (PIL) के दुरुपयोग पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा और नज़ीर बनने वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने एक ऐसी PIL खारिज कर दी, जिसमें याचिकाकर्ता ने खुद को सामाजिक कार्यकर्ता बताया, लेकिन यह नहीं बताया कि वह पेशे से अधिवक्ता है। अदालत ने पाया कि याचिका का उद्देश्य जनहित नहीं, बल्कि एक निजी फर्म के हितों को आगे बढ़ाना था। मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने इसे "PIL अधिकार क्षेत्र का गंभीर दुरुपयोग" करार देते हुए भविष्य में ऐसी कोशिशों पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी।

Sonali29 जुल. 2026, 02:08 PM IST
खबर शेयर करें:
वकील बनकर नहीं, 'सामाजिक कार्यकर्ता' बनकर पहुंचा कोर्ट! इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- क्लाइंट के हित में दायर PIL न्यायिक प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग

जनहित याचिकाओं (Public Interest Litigation-PIL) के दुरुपयोग पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा संदेश देते हुए स्पष्ट किया है कि कोई भी अधिवक्ता अपनी पहचान छिपाकर अपने मुवक्किल के निजी हितों को "जनहित" का रूप देकर अदालत के समक्ष नहीं ला सकता। हाईकोर्ट ने ऐसी एक जनहित याचिका को खारिज करते हुए कहा कि यह "अदालत के PIL अधिकार क्षेत्र का गंभीर दुरुपयोग" है और भविष्य में इस प्रकार का आचरण दोहराने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने 25 जुलाई 2026 को यह आदेश पारित किया। यह मामला "Rakesh Mishra vs State of U.P. and 4 Others" से संबंधित है।

क्या था पूरा मामला?

याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल कर आरोप लगाया था कि सरकारी टेंडर प्रक्रिया में मनमानी हुई है। उसने अदालत से विभागीय जांच जल्द पूरी कराने, संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने और एक अधिकारी के सेवानिवृत्ति लाभों पर रोक लगाने का निर्देश देने की मांग की थी।

याचिका में उसने स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता बताया, लेकिन यह उल्लेख नहीं किया कि वह पेशे से अधिवक्ता है। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने उपलब्ध अभिलेखों से स्पष्ट हुआ कि उसने मुख्यमंत्री को दिए गए अपने प्रार्थना-पत्र में स्वयं को झांसी का अधिवक्ता बताया था। कोर्ट ने माना कि यह महत्वपूर्ण तथ्य जानबूझकर छिपाया गया।

दस्तावेजों की जांच में खुली याचिका की असल मंशा

याचिका और उससे संलग्न दस्तावेजों की जांच के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता का वास्तविक उद्देश्य किसी सार्वजनिक हित की रक्षा करना नहीं, बल्कि "मेसर्स बाजपेयी ट्रेडर्स" नामक निजी फर्म को लाभ पहुंचाना था।

अदालत ने पाया कि याचिका में बाद की टेंडर प्रक्रिया को निरस्त कर अनुबंध दोबारा उसी फर्म को देने की मांग की गई थी। इसके साथ ही संबंधित अधिकारी को निलंबित करने और पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की भी मांग की गई थी। अदालत के अनुसार, इन तथ्यों से स्पष्ट था कि याचिका जनहित के लिए नहीं बल्कि एक निजी व्यावसायिक हित को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से दाखिल की गई थी।

पहले से लंबित था टेंडर विवाद

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि "मेसर्स बाजपेयी ट्रेडर्स" पहले भी उसी अधिवक्ता के माध्यम से टेंडर रद्द किए जाने के खिलाफ रिट याचिकाएं दाखिल कर चुकी थी। पहली याचिका वापस ले ली गई थी, जबकि दूसरी रिट याचिका अभी भी हाईकोर्ट में लंबित है।

डिवीजन बेंच पहले ही स्पष्ट कर चुकी थी कि संबंधित टेंडर का अंतिम परिणाम उस लंबित रिट याचिका के निर्णय पर निर्भर करेगा। इसके बावजूद उसी विवाद को जनहित याचिका के माध्यम से दोबारा उठाने की कोशिश पर अदालत ने गंभीर आपत्ति जताई। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि मौजूदा PIL संभवतः अदालत की छुट्टियों के दौरान इसलिए दायर की गई ताकि लंबित मामले के बावजूद कोई अलग आदेश प्राप्त किया जा सके।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि किसी अधिवक्ता द्वारा अपनी पेशेवर पहचान छिपाकर, स्वयं को सामाजिक कार्यकर्ता बताकर और अपने मुवक्किल के हितों को जनहित का रूप देकर PIL दाखिल करना जनहित याचिका की पूरी व्यवस्था का गंभीर दुरुपयोग है।

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी विशेष निजी पक्ष को अनुबंध दिलाने या उसके व्यावसायिक हितों की रक्षा करने के लिए दायर की गई याचिका को जनहित नहीं माना जा सकता। यदि ऐसी प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया गया तो जनहित याचिका की मूल भावना और न्यायपालिका की विश्वसनीयता दोनों प्रभावित होंगी।

निजी विवाद के लिए PIL नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि टेंडर, अनुबंध और व्यावसायिक विवादों के समाधान के लिए कानून में अलग वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं। ऐसे मामलों में PIL का सहारा लेना उचित नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जनहित याचिका का उद्देश्य केवल उन मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप सुनिश्चित करना है, जहां वास्तव में व्यापक सार्वजनिक हित जुड़ा हो, न कि किसी निजी व्यक्ति, संस्था या कंपनी के व्यावसायिक हित।

याचिका खारिज, भविष्य के लिए चेतावनी

इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने जनहित याचिका खारिज कर दी। साथ ही याचिकाकर्ता को चेतावनी दी कि भविष्य में यदि इस प्रकार की याचिकाएं दाखिल की गईं तो अदालत कठोर कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगी। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता बनाए रखने और PIL व्यवस्था की विश्वसनीयता बचाए रखने के लिए ऐसे मामलों में सख्त रुख अपनाना आवश्यक है।

फैसले का व्यापक महत्व

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला जनहित याचिकाओं के दायरे और उद्देश्य को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि PIL का उपयोग केवल वास्तविक जनहित के मामलों में ही किया जाना चाहिए। यदि कोई अधिवक्ता अपने मुवक्किल के निजी हितों को जनहित का रूप देकर अदालत का दरवाजा खटखटाता है, तो इसे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।

यह फैसला भविष्य में उन मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनमें निजी व्यावसायिक विवादों या टेंडर से जुड़े मामलों को जनहित याचिका के माध्यम से उठाने का प्रयास किया जाता है। अदालत के इस रुख से स्पष्ट संदेश गया है कि PIL को निजी हित साधने का माध्यम नहीं बनने दिया जाएगा और ऐसे मामलों में न्यायालय सख्ती से हस्तक्षेप करेगा।

मामले का विवरण

  • मामला: Rakesh Mishra vs State of U.P. and 4 Others
  • आदेश की तारीख: 25 जुलाई 2026
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली एवं न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र