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BNSS पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: शुरुआती 15 दिन के बाद भी मिल सकती है पुलिस कस्टडी, जांच एजेंसियों को बड़ी राहत

क्या पुलिस को आरोपी की कस्टडी सिर्फ शुरुआती 15 दिनों तक ही मिल सकती है? इस महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि BNSS के तहत निर्धारित वैधानिक अवधि के भीतर कुल 15 दिनों की पुलिस कस्टडी अलग-अलग चरणों में भी दी जा सकती है। अदालत ने कहा कि जांच के दौरान नए सबूत या खुलासे सामने आने पर पुलिस को आगे भी कस्टोडियल पूछताछ का अवसर मिलना चाहिए और इसी आधार पर आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की रोक लगाने वाली शर्त को रद्द कर दिया।

Sonali29 जुल. 2026, 02:08 PM IST
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BNSS पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: शुरुआती 15 दिन के बाद भी मिल सकती है पुलिस कस्टडी, जांच एजेंसियों को बड़ी राहत

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस रिमांड और जांच प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि BNSS की धारा 187(2) और 187(3) के तहत पुलिस कस्टडी केवल रिमांड के शुरुआती 15 दिनों तक सीमित नहीं है। यदि जांच के दौरान नए तथ्य, सबूत, बरामदगी या महत्वपूर्ण सुराग सामने आते हैं तो कानून में निर्धारित समय-सीमा के भीतर कुल 15 दिनों की पुलिस कस्टडी अलग-अलग चरणों (Staggered Police Custody) में भी मांगी और दी जा सकती है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने 27 जुलाई 2026 को यह फैसला सुनाते हुए आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा लगाई गई उस शर्त को रद्द कर दिया, जिसमें पुलिस कस्टडी को शुरुआती 15 दिनों के बाद बढ़ाने पर प्रभावी रोक लगा दी गई थी। यह फैसला "The State of Andhra Pradesh vs. Suda Suresh Veera Venkata Naga Raju" मामले में आया।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में गाडे साईं कृष्णा की कथित हिरासत में मौत (Custodial Death) से जुड़ा है। आरोप है कि 6 मई 2026 को उन्हें पुलिस ने हिरासत में लिया और कृष्णालंका पुलिस स्टेशन ले जाया गया, लेकिन उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश नहीं किया गया। बाद में वे लापता हो गए और उनका शव अब तक बरामद नहीं हुआ।

मृतक की मां की शिकायत के बाद विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया। जांच के दौरान संबंधित पुलिस अधिकारी को 23 जून 2026 को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा गया। इसके बाद SIT ने आगे की जांच, संभावित बरामदगी, घटनास्थल के पुनर्निर्माण और अन्य साक्ष्य जुटाने के लिए 12 दिन की पुलिस कस्टडी की मांग की।

मजिस्ट्रेट और हाईकोर्ट ने क्या शर्तें लगाई थीं?

मजिस्ट्रेट ने पुलिस कस्टडी मंजूर करते हुए कई कड़ी शर्तें लगाई थीं। इनमें पूछताछ केवल सेंट्रल जेल परिसर में करना, पूछताछ की वीडियोग्राफी, आरोपी के वकील की मौजूदगी तथा पुलिस कस्टडी की अधिकतम अवधि तय करना शामिल था। बाद में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने भी अधिकांश शर्तों को बरकरार रखा और पुलिस कस्टडी आठ दिन तक सीमित कर दी।

राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि इन शर्तों के कारण प्रभावी जांच और कस्टोडियल पूछताछ करना लगभग असंभव हो गया है।

BNSS और पुराने CrPC में क्या बदला?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुराने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 167 और नए BNSS की धारा 187 में महत्वपूर्ण अंतर है। पहले पुलिस कस्टडी को लेकर जो न्यायिक व्याख्या विकसित हुई थी, BNSS ने उसमें बदलाव किया है। अब यदि जांच के दौरान नए तथ्य, खुलासे, बरामदगी या अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आते हैं तो निर्धारित वैधानिक अवधि के भीतर कुल 15 दिनों की पुलिस कस्टडी अलग-अलग चरणों में दी जा सकती है।

अदालत ने कहा कि संसद ने यह संशोधन इसलिए किया ताकि जांच एजेंसियां जांच के दौरान सामने आने वाले नए तथ्यों के आधार पर प्रभावी पूछताछ कर सकें और गंभीर मामलों में जांच अधूरी न रह जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों हटाईं हाईकोर्ट की शर्तें?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट और हाईकोर्ट द्वारा लगाई गई कुछ शर्तें जांच एजेंसी की प्रभावी जांच में बाधा बन रही थीं। अदालत ने माना कि पुलिस कस्टडी की एक निश्चित और अंतिम सीमा तय करना BNSS की धारा 187(2) के विपरीत है, क्योंकि इससे जांच के दौरान सामने आने वाले नए तथ्यों पर आगे की कस्टोडियल पूछताछ का वैधानिक अधिकार समाप्त हो जाता है।

पीठ ने कहा कि यदि अदालतें शुरुआती चरण में ही पुलिस कस्टडी पर कठोर प्रतिबंध लगा दें तो BNSS की मंशा ही विफल हो जाएगी। नए कानून का उद्देश्य यही है कि जांच एजेंसी नए सबूत, नए आरोपी, बरामदगी या खुलासे होने पर प्रभावी पूछताछ कर सके। इसलिए न्यायालयों को ऐसे आदेश देने से बचना चाहिए जो कानून द्वारा दिए गए अधिकारों को समय से पहले निष्प्रभावी बना दें।

वकील की मौजूदगी पर भी सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने पूछताछ के दौरान आरोपी के वकील की लगातार मौजूदगी अनिवार्य करने वाली शर्त भी रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि BNSS की धारा 38 आरोपी को पूछताछ के दौरान अपने अधिवक्ता से मिलने का अधिकार देती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वकील पूरी पूछताछ के दौरान लगातार मौजूद रहेगा। अदालत ने माना कि ऐसी व्यवस्था जांच को प्रभावित कर सकती है।

हिरासत में मौत के आरोप ने बनाया मामला संवेदनशील

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में माना कि यह मामला कथित हिरासत में मौत का है, इसलिए निष्पक्ष और पारदर्शी जांच अत्यंत आवश्यक है। रिकॉर्ड के अनुसार मृतक की मां ने पहले हैबियस कॉर्पस याचिका भी दायर की थी। जांच के दौरान संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ हत्या, अवैध हिरासत और साक्ष्य मिटाने जैसे गंभीर आरोपों की जांच की जा रही है।

जांच के दौरान पुलिस स्टेशन के CCTV रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और संभावित बरामदगी की भी जांच की जा रही है। अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में कई बार जांच आगे बढ़ने के साथ नए तथ्य सामने आते हैं, जिनके लिए आगे की कस्टोडियल पूछताछ आवश्यक हो सकती है।

वीडियोग्राफी रहेगी, लेकिन ट्रांजिट रिकॉर्डिंग जरूरी नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने पूछताछ की वीडियोग्राफी की शर्त को बरकरार रखा ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी को जेल से पूछताछ स्थल तक लाने और वापस ले जाने (ट्रांजिट) के दौरान लगातार वीडियोग्राफी कराना आवश्यक नहीं होगा।

साथ ही अदालत ने SIT को निर्देश दिया कि हिरासत के दौरान आरोपी की सुरक्षा, स्वास्थ्य और संवैधानिक अधिकारों का पूरा ध्यान रखा जाए तथा पूछताछ कानून के दायरे में रहकर ही की जाए।

फैसले का महत्व

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला BNSS लागू होने के बाद पुलिस रिमांड से जुड़े कानून की सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक व्याख्याओं में से एक माना जा रहा है। इस निर्णय से स्पष्ट हो गया है कि कुल 15 दिनों की पुलिस कस्टडी अब केवल शुरुआती 15 दिनों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि कानून में निर्धारित अवधि के भीतर अलग-अलग चरणों में भी दी जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रभावी जांच और आरोपी के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। अदालतों को ऐसी शर्तें लगाने से बचना चाहिए जो जांच एजेंसी के वैधानिक अधिकारों को निष्प्रभावी बना दें, वहीं जांच एजेंसियों को भी आरोपी के मौलिक और कानूनी अधिकारों का पूरा सम्मान करना होगा।

मामले का विवरण

  • मामला: The State of Andhra Pradesh vs. Suda Suresh Veera Venkata Naga Raju

  • अदालत: सुप्रीम कोर्ट

  • पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ एवं जस्टिस संदीप मेहता

  • आदेश की तारीख: 27 जुलाई 2026

  • संबंधित प्रावधान: BNSS की धारा 187(2), 187(3) और धारा 38