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RC ही सब कुछ नहीं! ज़ब्त गाड़ियों की रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- सिर्फ रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट के आधार पर नहीं मिलेगा वाहन

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि ज़ब्त वाहनों की अंतरिम कस्टडी तय करते समय अदालत केवल RC नहीं, बल्कि कब्ज़ा, उपयोग, भुगतान, परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों का भी करेगी मूल्यांकन

Sonali29 जुल. 2026, 02:08 PM IST
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RC ही सब कुछ नहीं! ज़ब्त गाड़ियों की रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- सिर्फ रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट के आधार पर नहीं मिलेगा वाहन

ज़ब्त वाहनों की अंतरिम रिहाई (Interim Custody) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी वाहन का रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (Registration Certificate-RC) अंतरिम कब्ज़ा (Interim Custody) देने का अंतिम और निर्णायक आधार नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि CrPC की धारा 451 और 457 के तहत अदालतों का दायित्व केवल यह देखना नहीं है कि वाहन किसके नाम पर पंजीकृत है, बल्कि यह भी देखना है कि उपलब्ध परिस्थितियों, कब्ज़े, उपयोग, भुगतान और रिकॉर्ड के आधार पर फिलहाल वाहन किसे सौंपना न्यायोचित होगा।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने 27 जुलाई 2026 को यह फैसला सुनाते हुए एक कंपनी निदेशक की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि अंतरिम कस्टडी का उद्देश्य स्वामित्व (Ownership) का अंतिम फैसला करना नहीं, बल्कि ज़ब्त संपत्ति को सुरक्षित रखना और उसकी उपयोगिता तथा कीमत को बनाए रखना है।

क्या है पूरा मामला?

मामला आंध्र प्रदेश की दो कंपनियों—M/s Pure Minerals और M/s Earth Stein Private Limited—के बीच व्यावसायिक विवाद से जुड़ा है। अपीलकर्ता M/s Pure Minerals का निदेशक था और प्रतिवादी कंपनी में भी उसकी 80 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। विवादित संपत्ति में एक बोलेरो सिटी पिक-अप, तीन एक्सकेवेटर और एक अशोक लीलैंड टिपर शामिल थे, जिन्हें वर्ष 2014 से 2022 के बीच M/s Pure Minerals के नाम पर खरीदा गया था। 31 अगस्त 2023 को अपीलकर्ता ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी कंपनी के लोगों ने उसकी फैक्ट्री में घुसकर जबरन वाहन अपने कब्ज़े में ले लिए। वहीं प्रतिवादी कंपनी ने काउंटर FIR दर्ज कर आरोप लगाया कि अपीलकर्ता ने कंपनी के लगभग ₹1.73 करोड़ का गबन किया और उसी धन से अपने नाम की कंपनी के जरिए वाहन खरीदे।

ट्रायल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला?

दोनों पक्षों ने ज़ब्त वाहनों की अंतरिम कस्टडी के लिए ट्रायल कोर्ट में आवेदन किया। मामला बाद में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट पहुंचा, जिसने उपलब्ध रिकॉर्ड और परिस्थितियों के आधार पर वाहनों की अंतरिम कस्टडी प्रतिवादी कंपनी को सौंप दी।

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि वाहन लगातार प्रतिवादी कंपनी के खनन कार्य में उपयोग किए जा रहे थे और उनसे जुड़े कई तथ्य उसके पक्ष में थे। इसी आदेश को चुनौती देते हुए अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट ने RC को क्यों नहीं माना अंतिम आधार?

अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में "सुंदरभाई अंबालाल देसाई बनाम गुजरात राज्य (2002)" फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब तक मुकदमे का अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक वाहन का पंजीकृत मालिक ही अंतरिम कस्टडी का हकदार होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को अस्वीकार करते हुए कहा कि उस फैसले में ऐसा कोई कठोर सिद्धांत स्थापित नहीं किया गया था कि हर मामले में केवल रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट के आधार पर ही वाहन की अंतरिम रिहाई होगी।

अदालत ने कहा कि RC एक महत्वपूर्ण साक्ष्य है, लेकिन वह अंतरिम कब्ज़े का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं है। अदालत को मामले की सभी परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन करना होगा।

किन तथ्यों ने बदला मामला?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कई परिस्थितियां प्रतिवादी कंपनी के पक्ष में थीं।

रिकॉर्ड से पता चला कि विवादित वाहन प्रतिवादी कंपनी की ऑपरेशनल साइट से ज़ब्त किए गए थे और उनका लगातार व्यावसायिक उपयोग वहीं हो रहा था। वाहनों की बैंक EMI प्रतिवादी कंपनी के खाते से चुकाई जा रही थी। इसके अलावा अपीलकर्ता द्वारा दिया गया एक अंडरटेकिंग भी रिकॉर्ड पर था, जिसमें उसने खातों के अंतिम निपटारे तक प्रतिवादी कंपनी को वाहन अपने पास रखने और उपयोग करने की अनुमति दी थी।

हालांकि अपीलकर्ता ने इस अंडरटेकिंग को फर्जी बताया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के विवादों का फैसला अलग कार्यवाही में होगा और अंतरिम कस्टडी तय करते समय उनका अंतिम निर्णय नहीं किया जा सकता।

CrPC की धारा 451 और 457 पर सुप्रीम कोर्ट की अहम व्याख्या

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 451 और 457 अदालतों को यह विवेकाधिकार देती हैं कि वे ज़ब्त संपत्ति की अंतरिम कस्टडी उस व्यक्ति को दें जो प्रथम दृष्टया उसके संरक्षण और उपयोग का अधिक उपयुक्त अधिकारी प्रतीत होता हो।

अदालत ने स्पष्ट किया कि इन धाराओं के तहत स्वामित्व का अंतिम निर्धारण नहीं किया जाता। यह अधिकार संबंधित सिविल न्यायालय या सक्षम मंच के पास रहता है। आपराधिक अदालत केवल अंतरिम व्यवस्था सुनिश्चित करती है ताकि संपत्ति खराब न हो और उसका मूल्य कम न हो।

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

पीठ ने कहा कि अदालत को केवल यह तय करना होता है कि उपलब्ध परिस्थितियों में संपत्ति का संरक्षण किसके पास अधिक सुरक्षित रहेगा। यदि RC के अतिरिक्त अन्य परिस्थितियां किसी दूसरे पक्ष के पक्ष में अधिक मजबूत हैं, तो अंतरिम कस्टडी उसी को दी जा सकती है।

अदालत ने यह भी दोहराया कि लंबे समय तक वाहन पुलिस थानों या खुले स्थानों पर पड़े रहने से उनकी उपयोगिता और कीमत दोनों कम होती हैं। इसलिए अंतरिम रिहाई से जुड़े मामलों का शीघ्र और व्यावहारिक समाधान आवश्यक है। यह सिद्धांत पहले भी विभिन्न न्यायिक निर्णयों में रेखांकित किया जा चुका है।

फैसले का व्यापक महत्व

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में ज़ब्त वाहनों से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध होगा। अब केवल RC दिखाकर वाहन की अंतरिम रिहाई का दावा पर्याप्त नहीं होगा। अदालतें कब्ज़े, वास्तविक उपयोग, वित्तीय भुगतान, व्यावसायिक नियंत्रण, उपलब्ध दस्तावेजों और समग्र परिस्थितियों का मूल्यांकन कर निर्णय लेंगी।

इस फैसले से यह भी स्पष्ट हो गया है कि अंतरिम कस्टडी का उद्देश्य किसी पक्ष के स्वामित्व को मान्यता देना नहीं, बल्कि मुकदमे के अंतिम निर्णय तक संपत्ति का उचित संरक्षण सुनिश्चित करना है।

मामले का विवरण

  • मामला: Krishnan Narayana vs The State of Andhra Pradesh & Others
  • अदालत: सुप्रीम कोर्ट
  • पीठ: जस्टिस संजय करोल एवं जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
  • आदेश की तारीख: 27 जुलाई 2026
  • संबंधित प्रावधान: CrPC की धारा 451 एवं 457
  • निर्णय: अपील खारिज, प्रतिवादी कंपनी के पक्ष में अंतरिम कस्टडी बरकरार।