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नौकरी पक्की होने के बाद नहीं चलेगी मनमानी! सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, बिना विभागीय जांच सरकारी कर्मचारी को नहीं हटाया जा सकता
सरकारी कर्मचारियों के सेवा अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि नौकरी पक्की होने के बाद केवल कथित अवैध नियुक्ति का हवाला देकर किसी कर्मचारी को बिना विभागीय जांच सेवा से नहीं हटाया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 311(2) के तहत मिले संवैधानिक संरक्षण और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा।

सरकारी कर्मचारियों के सेवा अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी स्थायी (Confirmed) सरकारी कर्मचारी को केवल इस आधार पर नौकरी से नहीं निकाला जा सकता कि उसकी नियुक्ति में कथित तौर पर कोई अनियमितता या अवैधता थी। अदालत ने कहा कि यदि कर्मचारी की सेवा पहले ही पुष्टि (Confirmation) हो चुकी है, तो उसे बिना विभागीय जांच (Departmental Inquiry) के सेवा से हटाना संविधान के अनुच्छेद 311(2) का सीधा उल्लंघन होगा।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने 24 जुलाई 2026 को यह फैसला सुनाते हुए ओडिशा के जगतसिंहपुर जिला एवं सत्र न्यायाधीश कार्यालय में कार्यरत कॉपीइस्ट (Junior Clerk-cum-Copyist) कर्मचारियों की सेवाएं बहाल करने का आदेश दिया। फैसला 27 जुलाई 2026 को सार्वजनिक हुआ। अदालत ने कहा कि नौकरी की पुष्टि केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं बल्कि कर्मचारी को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने वाला महत्वपूर्ण दर्जा है।
क्या है पूरा मामला?
मामला ओडिशा के जगतसिंहपुर जिला एवं सत्र न्यायालय से जुड़ा है, जहां कुछ कर्मचारियों की नियुक्ति जूनियर क्लर्क-कम-कॉपीइस्ट के पद पर हुई थी। नियुक्ति के बाद उनकी सेवाएं नियमित और स्थायी कर दी गई थीं। कई वर्ष सेवा देने के बाद उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर कहा गया कि उनकी नियुक्तियां भर्ती विज्ञापन में घोषित रिक्तियों से अधिक पदों पर हुई थीं, इसलिए नियुक्ति शुरू से ही अवैध (Void Ab Initio) है। इसके बाद बिना विभागीय जांच कराए उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।
हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला?
कर्मचारियों ने पहले हाईकोर्ट की अपील समिति के समक्ष चुनौती दी, लेकिन राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की, जिसे भी खारिज कर दिया गया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के आदेशों को पलटते हुए कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सेवा की पुष्टि होने के बाद कर्मचारी को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त हो जाता है। यदि नियुक्ति में कथित गड़बड़ी का आरोप है, तो भी सरकार सीधे प्रशासनिक आदेश जारी कर सेवा समाप्त नहीं कर सकती। पीठ ने कहा कि यह तय करना कि नियुक्ति वास्तव में अवैध थी या नहीं, कर्मचारी की उसमें कोई भूमिका थी या नहीं, और क्या इतनी गंभीर कार्रवाई उचित है—इन सभी प्रश्नों का निर्णय अनुच्छेद 311(2) के तहत विधिसम्मत विभागीय जांच के बाद ही किया जा सकता है।
अनुच्छेद 311(2) क्या कहता है?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 311(2) सरकारी कर्मचारियों को महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है। इसके अनुसार किसी भी सरकारी कर्मचारी को बर्खास्त, पद से हटाया या पदावनत करने से पहले आरोपों की जानकारी देना, विभागीय जांच करना और अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना अनिवार्य है।
कोर्ट ने यह भी दोहराया कि केवल तीन विशेष परिस्थितियों में ही बिना जांच कार्रवाई की जा सकती है—
- यदि कर्मचारी किसी आपराधिक मामले में दोषी ठहराया गया हो।
- यदि सक्षम प्राधिकारी लिखित रूप से दर्ज करे कि जांच कराना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
- यदि राष्ट्रपति या राज्यपाल राज्य की सुरक्षा के हित में जांच न कराने को उचित मानें।
कोर्ट ने विभागीय जांच को क्यों बताया जरूरी?
पीठ ने कहा कि विभागीय जांच कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं बल्कि प्राकृतिक न्याय (Principles of Natural Justice) का मूल आधार है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी सरकारी कर्मचारी की नौकरी केवल प्रशासनिक विवेक पर समाप्त नहीं की जा सकती।
अदालत ने कहा कि संबंधित कर्मचारियों का मामला अनुच्छेद 311(2) में दिए गए किसी भी अपवाद के अंतर्गत नहीं आता था। इसलिए बिना विभागीय जांच उनकी सेवाएं समाप्त करना असंवैधानिक था।
सेवा बहाल, लेकिन सरकार के लिए रास्ता खुला
सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों की सेवा बहाल करने का आदेश दिया। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि संबंधित प्राधिकारी उचित समझे तो कानून के अनुसार नई विभागीय जांच शुरू कर सकता है, लेकिन वह कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 311(2) की पूरी प्रक्रिया का पालन करते हुए ही करनी होगी।
फैसले का व्यापक महत्व
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय देशभर के लाखों स्थायी सरकारी कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि नियुक्ति में कथित अनियमितता का आरोप लगाकर भी किसी कर्मचारी को बिना विभागीय जांच सेवा से नहीं हटाया जा सकता। यह फैसला प्राकृतिक न्याय, विधिसम्मत प्रक्रिया और सरकारी कर्मचारियों के संवैधानिक अधिकारों को मजबूत करता है।
मामले का विवरण
- मामला: Debashish Mohapatra & Others vs District and Sessions Judge, Jagatsinghpur & Others
- अदालत: सुप्रीम कोर्ट
- पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ एवं जस्टिस संदीप मेहता
- आदेश की तारीख: 24 जुलाई 2026
- निर्णय सार्वजनिक: 27 जुलाई 2026
- संबंधित प्रावधान: संविधान का अनुच्छेद 311(2)
