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23 साल से लापता बेटे को ‘सिविल डेथ’ घोषित कराने की मां की लड़ाई को मिली नई उम्मीद, अदालत ने ट्रायल कोर्ट का आदेश पलटा
23 साल से लापता बेटे को कानूनी रूप से मृत घोषित कर उसका मृत्यु प्रमाणपत्र हासिल करने की लड़ाई लड़ रही 80 वर्षीय मां को बड़ी राहत मिली है। कल्याण की अदालत ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कहा कि केवल तकनीकी कमियों के आधार पर याचिका खारिज नहीं की जा सकती और वादी को अपना पक्ष साबित करने तथा याचिका में आवश्यक संशोधन करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।

23 वर्षों से लापता बेटे को कानूनी रूप से मृत (Civil Death) घोषित कर मृत्यु प्रमाणपत्र प्राप्त करने की कोशिश कर रही 80 वर्षीय मां को बड़ी राहत मिली है। महाराष्ट्र के कल्याण स्थित एड-हॉक जिला न्यायाधीश-1 की अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा उनकी याचिका को प्रारंभिक स्तर पर खारिज करने का आदेश रद्द करते हुए मामले की दोबारा सुनवाई का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि यदि याचिका में कुछ प्रक्रियात्मक कमियां हैं और उन्हें सुधारा जा सकता है, तो केवल उसी आधार पर वाद को खारिज नहीं किया जा सकता। न्यायालय का मानना है कि न्याय का उद्देश्य तकनीकी आधार पर मुकदमे समाप्त करना नहीं, बल्कि पक्षकारों को अपना मामला साबित करने का अवसर देना है।
27 जुलाई 2026 को एड-हॉक डिस्ट्रिक्ट जज-1 ए. एम. सामंत ने नियमित सिविल अपील संख्या 65/2025 में यह फैसला सुनाया। अदालत ने 16 अक्टूबर 2025 को सिविल जज (सीनियर डिवीजन), कल्याण द्वारा पारित उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत Order VII Rule 11(a) CPC के अंतर्गत वाद खारिज कर दिया गया था। साथ ही नियमित सिविल सूट संख्या 43/2025 को पुनः बहाल करते हुए ट्रायल कोर्ट को कानून के अनुसार नए सिरे से सुनवाई करने का निर्देश दिया गया।
क्या है पूरा मामला?
अपीलकर्ता सुलभा भार्गव कदम, जिनकी उम्र 80 वर्ष है, ने अदालत से प्रार्थना की थी कि उनके बेटे सुनील भार्गव कदम को भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 108 (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 में समकक्ष प्रावधान) के सिद्धांत के अनुसार सिविल रूप से मृत घोषित किया जाए। उनका कहना था कि उनका बेटा पिछले 23 वर्षों से लापता है और उसका कोई पता नहीं चला है। परिवार को उसके रोजगार से मिलने वाले वैधानिक लाभ प्राप्त करने के लिए मृत्यु प्रमाणपत्र की आवश्यकता है।
रिकॉर्ड के अनुसार, इससे पहले भी वर्ष 2013 में इसी प्रकार का वाद दायर किया गया था, जिसे जनवरी 2022 में खारिज कर दिया गया था। इसके बाद वर्ष 2025 में नई परिस्थितियों के आधार पर दोबारा मुकदमा दायर किया गया। इस बार नौसेना डॉकयार्ड (Naval Dockyard), जहां लापता व्यक्ति कार्यरत था, ने सेवा संबंधी बकाया लाभों के निपटारे के लिए मृत्यु प्रमाणपत्र की मांग की थी। इसके अलावा पुलिस द्वारा 23 जनवरी 2025 की नई मिसिंग रिपोर्ट भी जारी की गई थी। इन्हीं नए तथ्यों को आधार बनाकर दोबारा वाद दायर किया गया।
ट्रायल कोर्ट ने क्यों खारिज की थी याचिका?
ट्रायल कोर्ट ने माना था कि याचिका Specific Relief Act की धारा 34 और CPC की धारा 9 के तहत विचारणीय नहीं है तथा प्रारंभिक स्तर पर ही Order VII Rule 11(a) CPC के अंतर्गत वाद खारिज कर दिया था।
अपीलीय अदालत ने क्या कहा?
अपीलीय अदालत ने स्पष्ट किया कि Order VII Rule 11(a) CPC के तहत केवल यह देखा जाता है कि वादपत्र (Plaint) प्रथम दृष्टया कोई कारण-ए-वाद (Cause of Action) दर्शाता है या नहीं। इस स्तर पर अदालत को मामले के गुण-दोष या अंतिम अधिकारों का निर्णय नहीं करना चाहिए। अदालत ने पाया कि याचिका में पर्याप्त तथ्य मौजूद थे और उसमें बताई गई कमियां ऐसी थीं जिन्हें संशोधन के माध्यम से दूर किया जा सकता था। इसलिए सीधे वाद खारिज करना उचित नहीं था।
अदालत ने यह भी कहा कि प्रक्रियात्मक कमियां (Curable Defects) वास्तविक न्याय के रास्ते में बाधा नहीं बननी चाहिए। यदि आवश्यक पक्षकार को जोड़ा जा सकता है या आवश्यक तथ्यों को संशोधन के जरिए शामिल किया जा सकता है, तो वादी को ऐसा अवसर मिलना चाहिए।
कोर्ट ने किन संशोधनों की अनुमति दी?
अदालत ने अपीलकर्ता को वादपत्र में संशोधन करने की अनुमति देते हुए निर्देश दिया कि वह ठाणे के कलेक्टर को आवश्यक पक्षकार बनाए, स्वयं को लापता व्यक्ति की मां और कानूनी उत्तराधिकारी के रूप में स्पष्ट रूप से दर्शाए तथा सिविल डेथ की घोषणा से उत्पन्न होने वाले सभी परिणामी अधिकारों का दावा याचिका में शामिल करे।
कोर्ट ने मेरिट पर कोई राय नहीं दी महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने यह निर्णय नहीं दिया है कि लापता व्यक्ति को वास्तव में सिविल डेथ घोषित किया जाना चाहिए या नहीं। यह प्रश्न ट्रायल कोर्ट दोनों पक्षों की दलीलों और साक्ष्यों के आधार पर तय करेगा। अदालत ने केवल इतना कहा कि वादी को अपना मामला प्रस्तुत करने का अवसर मिलना चाहिए।
फैसले का व्यापक महत्व
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जाएगा, जहां लंबे समय से लापता व्यक्ति को कानूनी रूप से मृत घोषित कराने के लिए परिवार अदालत का दरवाजा खटखटाता है। अदालत ने दोहराया है कि तकनीकी या प्रक्रियात्मक त्रुटियों के आधार पर ऐसे मामलों को प्रारंभिक स्तर पर समाप्त करने के बजाय पक्षकारों को अपनी याचिका सुधारने और साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाना चाहिए। इससे न्याय तक पहुंच (Access to Justice) और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को मजबूती मिलती है।
मामले का विवरण
मामला: Smt. Sulbha Bhargav Kadam vs The Registrar of Birth and Death, KDMC
अदालत: एड-हॉक डिस्ट्रिक्ट जज-1, कल्याण, जिला ठाणे
न्यायाधीश: श्री ए. एम. सामंत
आदेश की तारीख: 27 जुलाई 2026
मुख्य मुद्दा: 23 वर्षों से लापता व्यक्ति को सिविल डेथ घोषित करने संबंधी वाद, Order VII Rule 11(a) CPC के तहत वाद खारिज करने का आदेश निरस्त
