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हत्या के मुकदमे में चारों आरोपी बरी: गवाह मुकरे, CCTV और FSL रिपोर्ट पेश नहीं हुई, ठाणे कोर्ट ने कहा- संदेह के आधार पर नहीं हो सकती सजा
"संदेह नहीं, ठोस सबूत चाहिए"—ठाणे सत्र न्यायालय ने इसी सिद्धांत को दोहराते हुए हत्या के एक चर्चित मामले में चार आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि जब प्रत्यक्षदर्शी गवाह साथ छोड़ दें, वैज्ञानिक साक्ष्य रिकॉर्ड पर न हों और अभियोजन आरोप साबित करने में विफल रहे, तब किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना कानून के मूल सिद्धांतों के विपरीत होगा।

हत्या के एक बहुचर्चित मामले में ठाणे सत्र न्यायालय ने चार आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। न्यायालय ने पाया कि मामले के मुख्य प्रत्यक्षदर्शी गवाहों ने अदालत में अभियोजन का साथ नहीं दिया, एफआईआर विधिवत साबित नहीं की गई, सीसीटीवी फुटेज और फॉरेंसिक (केमिकल एनालाइजर) रिपोर्ट रिकॉर्ड पर पेश नहीं की गई तथा पहचान परेड भी घटना के लगभग 58 दिन बाद कराई गई। ऐसे में केवल आरोपियों के कथित खुलासे और बरामदगी के आधार पर दोषसिद्धि संभव नहीं है।
ठाणे के सत्र न्यायाधीश आर. डी. सावंत ने 27 जुलाई 2026 को सेशंस केस संख्या 158/2018 में यह फैसला सुनाया। अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 सहपठित धारा 34 के तहत चल रहे मुकदमे में राजेश सुरेश निषाद, हरिमोहन सुंदर निषाद, विष्णु चंद्रभान यादव और नरसिंह परस यादव को बरी कर दिया।
क्या था मामला?
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि चारों आरोपियों ने एक व्यक्ति को नायलॉन की रस्सी से बिजली के खंभे से बांधकर लकड़ी के डंडों और मोटे लकड़ी के पट्टों से हमला किया, जिससे उसकी मौत हो गई। जांच के दौरान पुलिस ने आरोपियों के कथित खुलासे के आधार पर कुछ कपड़े और लकड़ी के डंडे बरामद किए तथा चार्जशीट दाखिल की।
कोर्ट ने किन कमियों की ओर इशारा किया?
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि जिन दो गवाहों को प्रत्यक्षदर्शी बताया गया था, उन्होंने अदालत में अभियोजन के संस्करण का समर्थन नहीं किया। इसके अलावा एफआईआर दर्ज कराने वाले व्यक्ति और उसके साथ पुलिस स्टेशन जाने वाले अन्य व्यक्ति ने भी आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस गवाही नहीं दी। अदालत ने कहा कि ऐसे हालात में अभियोजन का पूरा मामला कमजोर हो जाता है। फैसले में यह भी कहा गया कि आरोपियों के कथित खुलासे और उनके आधार पर हुई बरामदगी अपने आप में दोष साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं होती, जब तक कि उन्हें स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्यों से पुष्ट न किया जाए। अदालत ने इसे "कमजोर साक्ष्य" माना।
CCTV, FSL रिपोर्ट और पहचान परेड पर सवाल
न्यायालय ने कहा कि जांच के दौरान जब्त किए गए सीसीटीवी फुटेज को अदालत में चलाकर साबित नहीं किया गया। इसी तरह जब्त वस्तुओं की केमिकल एनालाइजर (FSL) रिपोर्ट भी रिकॉर्ड पर पेश नहीं की गई। अदालत ने यह भी नोट किया कि पहचान परेड घटना के लगभग 58 दिन बाद कराई गई और पहचान परेड कराने वाले कार्यपालक मजिस्ट्रेट को गवाही के लिए पेश नहीं किया गया। इसलिए पहचान परेड को भी भरोसेमंद साक्ष्य नहीं माना जा सकता।
अदालत की अहम टिप्पणी
सत्र न्यायालय ने कहा कि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि घटना को अंजाम देने वाले यही आरोपी थे। जब घटनास्थल पर भीड़ मौजूद थी, एफआईआर में आरोपियों के नाम नहीं थे और स्वतंत्र पुष्टिकरण भी उपलब्ध नहीं था, तब केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। आपराधिक न्याय प्रणाली का सिद्धांत है कि यदि संदेह की गुंजाइश हो तो उसका लाभ आरोपी को दिया जाएगा।
अंततः कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
अदालत ने चारों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 के आरोपों से बरी कर दिया। साथ ही उनके जमानत बंधपत्र रद्द करने, जब्त की गई बेकार वस्तुओं को अपील अवधि समाप्त होने के बाद नष्ट करने तथा प्रत्येक आरोपी को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437A के तहत ₹15,000 के निजी एवं जमानती बांड प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
फैसले का महत्व
यह निर्णय एक बार फिर स्पष्ट करता है कि हत्या जैसे गंभीर मामलों में भी केवल संदेह, कथित खुलासे या बरामदगी के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती। अभियोजन पक्ष को प्रत्यक्ष, वैज्ञानिक और स्वतंत्र साक्ष्यों के माध्यम से आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करना आवश्यक है। यदि जांच या साक्ष्य प्रस्तुत करने में गंभीर कमियां रह जाती हैं, तो अदालत आरोपी को संदेह का लाभ देने के लिए बाध्य होती है।
मामले का विवरण
मामला: Sessions Case No. 158/2018
अदालत: सत्र न्यायालय, ठाणे
न्यायाधीश: आर. डी. सावंत
फैसले की तारीख: 27 जुलाई 2026
निर्णय: चारों आरोपी हत्या के आरोप से बरी
