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क्या स्क्रीन टाइम सच में बच्चों के दिमाग को नुकसान पहुंचाता है? नई रिपोर्ट ने खोली कई गलतफहमियों की परत
बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम अपने आप में मानसिक स्वास्थ्य या दिमाग के विकास के लिए सीधा खतरा साबित नहीं हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह ज्यादा महत्वपूर्ण है कि बच्चे स्क्रीन पर क्या देखते हैं, कितनी देर तक देखते हैं और उनका दैनिक जीवन कितना संतुलित है। पर्याप्त नींद, शारीरिक गतिविधि और पारिवारिक समय के साथ जिम्मेदार डिजिटल उपयोग बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए जरूरी है।
Vindhya Dubey29 जुल. 2026, 02:10 PM IST

कुछ वर्षों में बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम को लेकर दुनियाभर में चिंता बढ़ी है। स्मार्टफोन, टैबलेट, वीडियो गेम और सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग को मानसिक स्वास्थ्य, पढ़ाई और व्यवहार संबंधी समस्याओं से जोड़कर देखा जाता रहा है। लेकिन BBC की एक विस्तृत रिपोर्ट बताती है कि वैज्ञानिक तस्वीर इससे कहीं अधिक जटिल है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल स्क्रीन के सामने बिताया गया समय ही समस्या नहीं है, बल्कि यह अधिक महत्वपूर्ण है कि बच्चा स्क्रीन पर क्या देख रहा है, किस उद्देश्य से देख रहा है और उसका जीवन संतुलित है या नहीं।
क्या कहती है नई रिपोर्ट?
रिपोर्ट में कई मनोवैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का हवाला देते हुए बताया गया है कि अब तक उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण यह स्पष्ट रूप से साबित नहीं करते कि केवल अधिक स्क्रीन टाइम बच्चों में अवसाद, चिंता या मस्तिष्क के विकास में कमी का सीधा कारण बनता है। अधिकांश पुराने अध्ययन बच्चों और अभिभावकों द्वारा स्वयं बताई गई स्क्रीन उपयोग की जानकारी पर आधारित थे, जिससे परिणामों की सटीकता प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्क्रीन टाइम और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंध कई अन्य सामाजिक और पारिवारिक कारकों से भी प्रभावित होता है।
स्क्रीन टाइम से ज्यादा जरूरी है स्क्रीन का उपयोग कैसे हो रहा है
विशेषज्ञों का कहना है कि सभी प्रकार का स्क्रीन टाइम एक जैसा नहीं होता। यदि बच्चा ऑनलाइन पढ़ाई कर रहा है, नई भाषा सीख रहा है, रचनात्मक गतिविधियों में भाग ले रहा है या परिवार के साथ शैक्षणिक सामग्री देख रहा है, तो उसका प्रभाव मनोरंजन या बिना उद्देश्य के लगातार सोशल मीडिया स्क्रॉल करने से अलग होगा। इसलिए केवल घंटों की संख्या देखकर निष्कर्ष निकालना सही नहीं माना जाता।
क्या स्क्रीन टाइम का कोई नुकसान नहीं है?
ऐसा बिल्कुल नहीं है। डॉक्टरों का कहना है कि यदि स्क्रीन के कारण बच्चे की नींद कम हो रही है, शारीरिक गतिविधियां घट रही हैं, पढ़ाई प्रभावित हो रही है या सामाजिक मेलजोल कम हो रहा है, तो यह चिंता का विषय हो सकता है। लगातार कई घंटे स्क्रीन देखने से आंखों पर दबाव, शारीरिक निष्क्रियता, मोटापे का जोखिम और कुछ बच्चों में ध्यान केंद्रित करने की समस्या भी बढ़ सकती है। इसलिए संतुलित उपयोग सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
दिमाग के विकास पर क्या असर पड़ता है?
कुछ शोधों में स्क्रीन उपयोग के साथ मस्तिष्क के कुछ हिस्सों की कार्यप्रणाली में बदलाव देखे गए हैं, लेकिन अब तक यह स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला है कि इससे बच्चों की सोचने-समझने की क्षमता या मानसिक स्वास्थ्य पर सीधे नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी इस विषय पर लंबे समय तक चलने वाले और अधिक गुणवत्तापूर्ण शोध की आवश्यकता है।
यह रिपोर्ट क्यों महत्वपूर्ण है?
यह रिपोर्ट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अभिभावकों में अनावश्यक डर फैलाने के बजाय संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की सलाह देती है। विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों के डिजिटल जीवन का मूल्यांकन केवल स्क्रीन टाइम से नहीं बल्कि उनकी नींद, खेलकूद, पारिवारिक समय, पढ़ाई, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवहार के साथ मिलाकर किया जाना चाहिए। इससे माता-पिता बेहतर निर्णय ले सकते हैं और बच्चों पर अनावश्यक प्रतिबंध लगाने के बजाय स्वस्थ डिजिटल आदतें विकसित कर सकते हैं।
अभिभावकों के लिए क्या हैं सुझाव?
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बच्चों के लिए स्क्रीन उपयोग के स्पष्ट नियम बनाए जाएं। भोजन के समय, सोने से पहले और पारिवारिक बातचीत के दौरान स्क्रीन से दूरी रखी जाए। छोटे बच्चों के साथ मिलकर शैक्षणिक सामग्री देखना, नियमित आउटडोर खेल, पर्याप्त नींद और खुलकर बातचीत डिजिटल जीवन और वास्तविक जीवन के बीच बेहतर संतुलन बनाने में मदद कर सकते हैं।
नई रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश यह है कि स्क्रीन टाइम को केवल "अच्छा" या "बुरा" मानकर नहीं देखा जा सकता। असली सवाल यह है कि बच्चा स्क्रीन का उपयोग किस तरह कर रहा है, उसके जीवन में शारीरिक गतिविधि, पढ़ाई, नींद और परिवार के साथ समय का संतुलन कैसा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि संतुलित और जिम्मेदार डिजिटल उपयोग ही बच्चों के स्वस्थ विकास की सबसे प्रभावी रणनीति है।
