government
वीडियो कॉल पर 'डिजिटल गिरफ्तारी' का खेल अब पड़ेगा भारी! सुप्रीम कोर्ट बोला- बने अलग कानून, आरोपियों की संपत्ति भी हो सके फ्रीज
देशभर में फर्जी पुलिस, सीबीआई और अदालत के नाम पर लोगों को वीडियो कॉल के जरिए 'डिजिटल अरेस्ट' कर करोड़ों रुपये की ठगी करने वाले साइबर गिरोहों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से इस नए साइबर अपराध को अलग कानूनी पहचान देने और दोषियों के खिलाफ सख्त कानून बनाने पर विचार करने को कहा है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि पर्याप्त साक्ष्य मिलने पर आरोपियों की संपत्ति और बैंक खाते फ्रीज करने जैसे प्रावधान भी कानून का हिस्सा बनाए जा सकते हैं।

नई दिल्ली।
देशभर में तेजी से बढ़ रहे "डिजिटल अरेस्ट" साइबर फ्रॉड पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बड़ा सुझाव देते हुए कहा है कि इस अपराध को भारतीय आपराधिक कानूनों में एक अलग (Standalone) अपराध के रूप में शामिल करने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि किसी आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं तो उसकी संपत्तियों और बैंक खातों को भी शुरुआती चरण में फ्रीज करने का कानूनी प्रावधान बनाया जा सकता है। 28 जुलाई 2026 को हुई सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की तीन सदस्यीय पीठ ने डिजिटल अरेस्ट को साइबर अपराध का नया और संगठित स्वरूप बताते हुए कहा कि मौजूदा कानूनों में जबरन वसूली, धोखाधड़ी और आपराधिक धमकी जैसी धाराएं तो लागू होती हैं, लेकिन इस तरह के अपराधों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अलग कानूनी पहचान देने की आवश्यकता पर विचार होना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा कि डिजिटल अरेस्ट में जबरन वसूली और लूट जैसे अपराधों के तत्व मौजूद हैं। इसलिए सरकार को यह विचार करना चाहिए कि इसे अलग अपराध घोषित कर अधिक कठोर दंड का प्रावधान किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी आरोपी के खिलाफ तर्कसंगत और प्रथम दृष्टया साक्ष्य उपलब्ध हों तो उसकी संपत्तियों को भी फ्रीज करने का कानूनी प्रावधान प्रभावी साबित हो सकता है।
क्या होता है डिजिटल अरेस्ट?
डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी का ऐसा तरीका है जिसमें अपराधी स्वयं को सीबीआई, ईडी, पुलिस, एनसीबी, आयकर विभाग, आरबीआई या न्यायपालिका का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल या ऑडियो कॉल करते हैं। इसके बाद पीड़ित को मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स, राष्ट्रीय सुरक्षा या किसी आपराधिक मामले में फंसाने की धमकी देकर घंटों तक वीडियो कॉल पर रोके रखते हैं। इस दौरान फर्जी दस्तावेज, नकली गिरफ्तारी वारंट और कथित सुप्रीम कोर्ट या सरकारी आदेश दिखाकर लोगों से बैंक खातों में बड़ी रकम ट्रांसफर करवाई जाती है।
कैसे शुरू हुआ सुप्रीम कोर्ट का मामला?
यह मामला अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेने के बाद शुरू हुआ। एक बुजुर्ग दंपति ने सर्वोच्च न्यायालय को पत्र लिखकर बताया था कि सितंबर 2025 में साइबर ठगों ने स्वयं को सीबीआई, इंटेलिजेंस ब्यूरो और न्यायपालिका का अधिकारी बताकर उन्हें कई दिनों तक कथित "डिजिटल अरेस्ट" में रखा और फर्जी सुप्रीम कोर्ट के आदेश दिखाकर लगभग 1.5 करोड़ रुपये ठग लिए। इसी पत्र के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेकर मामले की सुनवाई शुरू की।
1 दिसंबर 2025 के आदेश में दिए थे बड़े निर्देश
यह 28 जुलाई 2026 का अंतिम फैसला नहीं बल्कि लंबित स्वतः संज्ञान मामले में हुई सुनवाई थी। इससे पहले 1 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को पूरे देश में डिजिटल अरेस्ट गिरोहों की एकीकृत जांच करने का निर्देश दिया था। अदालत ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से भी पूछा था कि साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे बैंक खातों की पहचान कर उन्हें तत्काल फ्रीज करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित तकनीक का व्यापक उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा। इसी आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि यदि साइबर अपराधों में इस्तेमाल होने वाले "म्यूल अकाउंट" खोलने में किसी बैंक अधिकारी की संलिप्तता पाई जाती है तो CBI भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत भी कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगी।
केंद्र सरकार ने अदालत को क्या बताया?
सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने बताया कि डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों से निपटने के लिए एक इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी (IDC) व्यापक रिपोर्ट तैयार कर रही है। इस रिपोर्ट में कानूनी कमियों की पहचान कर भविष्य के सुधारों का सुझाव दिया जाएगा। वहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार डिजिटल अरेस्ट, डीपफेक और अन्य आधुनिक साइबर अपराधों से निपटने के लिए नया विधेयक तैयार कर रही है। प्रस्तावित कानून में इन अपराधों से संबंधित विशेष प्रावधान शामिल किए जाएंगे।
अन्य कानूनी मंचों ने क्या कहा?
द फ्री प्रेस जर्नल, द न्यू इंडियन एक्सप्रेस तथा अन्य कानूनी रिपोर्टों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया कि डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों में सामान्य साइबर धोखाधड़ी की धाराओं से आगे बढ़कर विशेष कानूनी ढांचा तैयार करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। रिपोर्टों में यह भी उल्लेख किया गया कि अदालत ने आरोपियों की संपत्ति फ्रीज करने और कठोर दंड व्यवस्था पर गंभीर टिप्पणी की।
विशेषज्ञों की राय
साइबर कानून विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल अरेस्ट आज भारत में सबसे तेजी से बढ़ते साइबर अपराधों में शामिल हो चुका है। अपराधी मनोवैज्ञानिक दबाव, सरकारी एजेंसियों के नाम और फर्जी कानूनी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर लोगों से करोड़ों रुपये ठग रहे हैं। यदि इसे अलग अपराध के रूप में परिभाषित किया जाता है तो जांच एजेंसियों को अधिक स्पष्ट कानूनी अधिकार मिलेंगे और ऐसे संगठित गिरोहों के खिलाफ तेजी से कार्रवाई संभव होगी।
मामले की प्रमुख टाइमलाइन
• सितंबर 2025 – बुजुर्ग दंपति से फर्जी सीबीआई, आईबी और न्यायपालिका के अधिकारियों के नाम पर लगभग 1.5 करोड़ रुपये की ठगी।
• अक्टूबर 2025 – सुप्रीम कोर्ट ने मामले का स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर केंद्र सरकार, CBI और अन्य एजेंसियों से जवाब मांगा।
• 1 दिसंबर 2025 – सुप्रीम कोर्ट ने CBI को देशव्यापी जांच, RBI को AI आधारित निगरानी बढ़ाने तथा म्यूल अकाउंट्स पर कार्रवाई के निर्देश दिए।
• 28 जुलाई 2026 – CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार से डिजिटल अरेस्ट को अलग अपराध बनाने, कठोर दंड और आरोपियों की संपत्ति फ्रीज करने के प्रावधान पर विचार करने को कहा। यह सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणियां थीं, इस दिन कोई अंतिम लिखित निर्णय पारित नहीं किया गया।
