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मेंटेनेंस केस में बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- समानता का दावा जिम्मेदारियों से अलग नहीं हो सकता
मुंबई में एक वैवाहिक विवाद की सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट ने ऐसा फैसला सुनाया है, जो कामकाजी पति-पत्नी से जुड़े हजारों मामलों के लिए अहम मिसाल बन सकता है। अदालत ने कहा कि जब दोनों जीवनसाथी कमाते हैं, तो घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियां भी दोनों को मिलकर उठानी होंगी। केवल अधिकारों की बात कर जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हट सकते।

वैवाहिक विवादों से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पति और पत्नी दोनों आय अर्जित कर रहे हैं, तो घर चलाने और बच्चों की शिक्षा जैसी जिम्मेदारियों का बोझ भी दोनों को मिलकर उठाना चाहिए। अदालत ने कहा कि समानता का सिद्धांत केवल अधिकारों तक सीमित नहीं हो सकता, बल्कि जिम्मेदारियों के निर्वहन में भी समान रूप से लागू होना चाहिए।
न्यायमूर्ति एम. एम. साथाये (Justice M. M. Sathaye) की एकल पीठ ने 24 जुलाई 2026 को पारित आदेश में फैमिली कोर्ट के अंतरिम भरण-पोषण (इंटरिम मेंटेनेंस) के आदेश में संशोधन करते हुए पति द्वारा पत्नी और नाबालिग पुत्र के लिए देय मासिक राशि 50,000 रुपये से घटाकर 25,000 रुपये कर दी। यह आदेश 28 जुलाई 2026 को सार्वजनिक रिपोर्टों के माध्यम से सामने आया।
कैसे पहुंचा मामला हाईकोर्ट?
मामला एक दंपति के बीच चल रहे वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। पति पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) है। उसने बताया कि कोविड-19 महामारी के दौरान उसकी नौकरी चली गई, जिसके बाद उसकी आय में भारी कमी आ गई और उसे अपने गृह राज्य मध्य प्रदेश लौटकर प्रैक्टिस शुरू करनी पड़ी। दूसरी ओर, पत्नी शिक्षित है और स्वयं भी नौकरी कर रही है। पति ने फैमिली कोर्ट के जनवरी 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे 30 अक्टूबर 2021 से पत्नी और पुत्र के लिए प्रति माह 50,000 रुपये अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।
दो फ्लैट, ईएमआई और आर्थिक बोझ बना विवाद का कारण
सुनवाई के दौरान पति ने अदालत को बताया कि उसने मुंबई के अंधेरी और नवी मुंबई के पनवेल में दो फ्लैट खरीदे थे, जिनकी पूरी ईएमआई वह अकेले चुका रहा है। पत्नी अंधेरी स्थित फ्लैट में रह रही है, जबकि उसने पनवेल शिफ्ट होने से भी इनकार कर दिया। पति का कहना था कि कम आय, मकानों की ईएमआई, माता-पिता की जिम्मेदारी और मेंटेनेंस की राशि मिलाकर उस पर अत्यधिक आर्थिक दबाव है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
अदालत ने कहा कि यदि पत्नी मुंबई के प्रीमियम इलाके अंधेरी में रहना चाहती है, लेकिन मकान की ईएमआई में कोई योगदान नहीं देती, तो वह यह अपेक्षा नहीं कर सकती कि पति अकेले ही ईएमआई भी चुकाए और अधिक मेंटेनेंस भी देता रहे। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि "समानता का दावा चयनात्मक नहीं किया जा सकता। जब दोनों पक्ष कमाने वाले हैं और अपना जीवनस्तर बनाए रखना चाहते हैं, तो दोनों को आर्थिक योगदान देना होगा।" कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि दोनों माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा सर्वोत्तम शिक्षा प्राप्त करे, तो उसकी शिक्षा और अन्य आवश्यक खर्चों में भी दोनों का समान या अपनी-अपनी आर्थिक क्षमता के अनुरूप योगदान अपेक्षित है।
कोविड का असर भी माना अहम
हाईकोर्ट ने माना कि कोविड-19 महामारी के दौरान अनेक लोगों की नौकरियों और व्यवसाय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा था। ऐसे में पति की आय में आई कमी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने इसे मेंटेनेंस की राशि तय करने में एक महत्वपूर्ण कारक माना।
फैमिली कोर्ट को भी दिया निर्देश
हाईकोर्ट ने अंतरिम राहत में संशोधन करते हुए फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि वह मुख्य भरण-पोषण याचिका का यथाशीघ्र, अधिमानतः नौ महीने के भीतर, अंतिम निस्तारण करे ताकि विवाद लंबित न रहे।
कानूनी महत्व
यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां पति-पत्नी दोनों आर्थिक रूप से सक्षम हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण तय करते समय केवल पति की आय ही नहीं, बल्कि पत्नी की आय, दोनों की आर्थिक जिम्मेदारियां, गृह ऋण (ईएमआई), जीवन-यापन का स्तर और बच्चे के हित जैसे सभी पहलुओं पर संतुलित तरीके से विचार किया जाना चाहिए। साथ ही, अदालत ने दोहराया कि समानता का सिद्धांत अधिकारों के साथ-साथ जिम्मेदारियों पर भी समान रूप से लागू होता है।
