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11 साल बाद डॉ. मनमोहन सिंह के नाम से हटा कानूनी दाग, सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया ट्रायल कोर्ट का समन आदेश
करीब 11 साल पुराने कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को बड़ी मरणोपरांत कानूनी राहत दी है। शीर्ष अदालत ने ट्रायल कोर्ट का समन आदेश रद्द करते हुए CBI की क्लीन चिट को बरकरार रखा और स्पष्ट किया कि उनके खिलाफ मुकदमा चलाने का कोई पर्याप्त कानूनी आधार नहीं था।

नई दिल्ली।
कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को मरणोपरांत बड़ी कानूनी राहत देते हुए 2015 में विशेष CBI अदालत द्वारा जारी समन आदेश को रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि जांच के बाद CBI ने डॉ. सिंह को क्लीन चिट देते हुए क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी, ऐसे में ट्रायल कोर्ट के पास उसे खारिज कर उनके खिलाफ संज्ञान लेने का कोई औचित्य नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने CBI की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ सभी कार्यवाही समाप्त कर दी।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने बुधवार को यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि यद्यपि दिसंबर 2024 में डॉ. मनमोहन सिंह के निधन के कारण यह अपील तकनीकी रूप से निष्प्रभावी (Infructuous) हो सकती थी, लेकिन ट्रायल कोर्ट के आदेश में की गई प्रतिकूल टिप्पणियों और समन आदेश की वैधता पर निर्णय देना आवश्यक था।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला बहुचर्चित कोयला ब्लॉक आवंटन (कोलगेट) प्रकरण से जुड़ा है। CBI ने जांच के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की भूमिका की जांच की थी। जांच पूरी होने के बाद एजेंसी ने उनके खिलाफ कोई आपराधिक साक्ष्य नहीं मिलने पर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर उन्हें क्लीन चिट दे दी थी। हालांकि, वर्ष 2015 में विशेष CBI अदालत ने CBI की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करने से इनकार करते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत डॉ. मनमोहन सिंह सहित छह लोगों के खिलाफ संज्ञान लिया और समन जारी कर दिया था। इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि उसने CBI द्वारा दाखिल दोनों क्लोजर रिपोर्टों का विस्तार से अध्ययन किया है और पाया कि विशेष अदालत ने जांच एजेंसी की रिपोर्ट को अस्वीकार करते समय सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय कानूनी सिद्धांतों का पालन नहीं किया। पीठ ने कहा कि जांच एजेंसी की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर डॉ. मनमोहन सिंह के खिलाफ संज्ञान लेने का कोई पर्याप्त कारण नहीं था। इसलिए विशेष अदालत का आदेश कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता और उसे रद्द किया जाता है। साथ ही CBI की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर मामले को बंद किया जाता है।
निधन के बाद भी क्यों हुई सुनवाई?
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत से कहा कि डॉ. मनमोहन सिंह के निधन के बाद अपील भले ही तकनीकी रूप से समाप्त मानी जा सकती थी, लेकिन ट्रायल कोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियां उनके सम्मान और प्रतिष्ठा से जुड़ी थीं। इसलिए उन टिप्पणियों और समन आदेश को हटाना आवश्यक था।
CBI की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर.एस. चीमा ने भी अदालत को बताया कि संबंधित मामलों में कुछ कानूनी प्रश्न अभी भी लंबित हैं, जबकि वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने भी डॉ. मनमोहन सिंह से संबंधित टिप्पणियों को हटाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी द्वारा दाखिल क्लोजर रिपोर्ट पर विचार करते समय अदालत को स्थापित कानूनी मानकों का पालन करना होता है। यदि जांच में किसी व्यक्ति के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले हैं और क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की गई है, तो उसे अस्वीकार करने के लिए ठोस और कानूनी आधार होना आवश्यक है। इस मामले में विशेष अदालत ऐसा कोई आधार प्रस्तुत नहीं कर सकी।
देश की राजनीति और न्यायिक इतिहास में अहम फैसला
यह फैसला केवल डॉ. मनमोहन सिंह को मरणोपरांत कानूनी राहत देने तक सीमित नहीं है, बल्कि जांच एजेंसियों की क्लोजर रिपोर्ट पर ट्रायल कोर्ट के अधिकारों और न्यायिक विवेक की सीमाओं को भी स्पष्ट करता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह संदेश दिया कि जांच एजेंसी की रिपोर्ट को अस्वीकार करने के लिए न्यायालय के पास ठोस कानूनी कारण होना अनिवार्य है।
मामले का विवरण
मामला: Dr. Manmohan Singh v. CBI
क्रिमिनल अपील संख्या: 562-563/2015
