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गुजरात में भूमि आवंटन प्रक्रिया होगी तेज, कलेक्टरों को मिले नए वित्तीय अधिकार
गुजरात सरकार ने सरकारी जमीन आवंटन की प्रक्रिया को तेज और अधिक प्रभावी बनाने के लिए जिला कलेक्टरों और जिला विकास अधिकारियों (DDO) की वित्तीय शक्तियों में उल्लेखनीय वृद्धि की है। नए नियमों के तहत अब कई मामलों में सरकारी भूमि आवंटन के लिए राज्य सरकार की मंजूरी की आवश्यकता नहीं होगी और जिला स्तर पर ही निर्णय लिए जा सकेंगे। सरकार का मानना है कि इस फैसले से प्रशासनिक देरी कम होगी, विकास परियोजनाओं को समय पर जमीन मिलेगी और राज्य में निवेश तथा बुनियादी ढांचे के विकास को गति मिलेगी।

अहमदाबाद: गुजरात सरकार ने सरकारी जमीन आवंटन की प्रक्रिया को अधिक तेज, पारदर्शी और प्रभावी बनाने के उद्देश्य से बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल की अध्यक्षता में राज्य सरकार ने जिला कलेक्टरों और जिला विकास अधिकारियों (District Development Officers-DDO) की वित्तीय शक्तियों में उल्लेखनीय वृद्धि को मंजूरी दी है। इस फैसले के बाद कई मामलों में सरकारी भूमि आवंटन के लिए अब प्रस्तावों को गांधीनगर स्थित राज्य सरकार के पास भेजने की आवश्यकता नहीं होगी। जिला स्तर पर ही निर्णय लिए जा सकेंगे, जिससे विकास परियोजनाओं को समय पर भूमि उपलब्ध कराने और प्रशासनिक देरी को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
राज्य सरकार के अनुसार यह निर्णय प्रशासनिक विकेंद्रीकरण (Decentralisation) की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। पिछले कुछ वर्षों में गुजरात में औद्योगिक निवेश, शहरी विकास, सार्वजनिक बुनियादी ढांचा और ग्रामीण विकास से जुड़ी परियोजनाओं की संख्या लगातार बढ़ी है। ऐसे में भूमि आवंटन की प्रक्रिया में होने वाली देरी कई बार परियोजनाओं की लागत बढ़ाने के साथ-साथ उनके क्रियान्वयन को भी प्रभावित करती थी। नई व्यवस्था का उद्देश्य इसी समस्या का समाधान करना है।
सरकार ने जिला कलेक्टरों की वित्तीय सीमा में कई गुना वृद्धि की है। अब राज्य सरकार के बोर्डों और निगमों को दो हेक्टेयर तक सरकारी भूमि आवंटित करने के मामलों में वित्तीय सीमा 15 लाख रुपये से बढ़ाकर 1 करोड़ रुपये कर दी गई है। वहीं सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए केंद्र सरकार के विभागों को एक हेक्टेयर तक सरकारी भूमि आवंटन की सीमा 15 लाख रुपये से बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दी गई है। इसका अर्थ है कि पहले जिन प्रस्तावों के लिए राज्य सरकार की मंजूरी आवश्यक होती थी, अब उनमें से बड़ी संख्या का निपटारा जिला स्तर पर ही किया जा सकेगा। सरकारी कर्मचारियों और अन्य पात्र व्यक्तियों के लिए आवासीय भूखंड आवंटन की सीमा भी बढ़ा दी गई है। पहले यह सीमा केवल 1 लाख रुपये थी, जिसे बढ़ाकर 20 लाख रुपये कर दिया गया है। इसी प्रकार सहकारी आवास समितियों के लिए भूमि आवंटन की सीमा 6 लाख रुपये से बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दी गई है। व्यावसायिक उपयोग के लिए नीलामी के माध्यम से भूमि आवंटन की सीमा 1 लाख रुपये से बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर दी गई है, जबकि सहकारी गोदामों और अन्य संस्थाओं के लिए यह सीमा 3 लाख रुपये से बढ़ाकर 15 लाख रुपये कर दी गई है।
जिला विकास अधिकारियों (DDO) को भी ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि आवंटन के मामलों में अधिक अधिकार दिए गए हैं। व्यक्तिगत आवासीय ग्रामतल भूखंडों के लिए उनकी वित्तीय सीमा 20 हजार रुपये से बढ़ाकर 1 लाख रुपये कर दी गई है। सहकारी आवास समितियों के लिए यह सीमा 1.5 लाख रुपये से बढ़ाकर 7.5 लाख रुपये कर दी गई है। इसके अलावा दुग्ध सहकारी समितियों, सहकारी गोदामों तथा ग्रामीण विकास से जुड़े अन्य संस्थानों के लिए भी भूमि आवंटन की सीमा में वृद्धि की गई है। सरकार का मानना है कि इससे गांवों में विकास कार्यों को गति मिलेगी और स्थानीय प्रशासन अधिक प्रभावी ढंग से निर्णय ले सकेगा।
सरकार ने भूमि आवंटन से जुड़ी भुगतान प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण बदलाव किया है। नए नियमों के तहत यदि कोई सरकारी बोर्ड, निगम या केंद्र सरकार का विभाग निर्धारित 90 दिनों के भीतर भूमि का प्रीमियम जमा नहीं कर पाता है, तो जिला कलेक्टर को जिला भूमि मूल्यांकन समिति के कार्यकाल तक भुगतान की समयसीमा बढ़ाने का अधिकार होगा। इससे केवल तकनीकी कारणों या प्रशासनिक देरी के चलते परियोजनाओं के अटकने की संभावना कम होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय राज्य में 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' को और मजबूत करेगा। उद्योगों, सरकारी संस्थानों, सार्वजनिक उपयोग की परियोजनाओं और सामाजिक विकास योजनाओं को समय पर भूमि उपलब्ध होने से परियोजनाओं की लागत और समय, दोनों में बचत होगी। साथ ही जिला स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया मजबूत होने से प्रशासनिक दक्षता में भी सुधार आएगा।
हालांकि, कुछ प्रशासनिक विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि जिला अधिकारियों को अधिक अधिकार दिए जाने के साथ पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक होगा। भूमि आवंटन जैसे संवेदनशील मामलों में स्पष्ट दिशा-निर्देश, नियमित निगरानी और डिजिटल रिकॉर्ड प्रणाली का प्रभावी उपयोग इस नई व्यवस्था की सफलता के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।राज्य सरकार का कहना है कि इस फैसले का उद्देश्य केवल अधिकारों का हस्तांतरण नहीं, बल्कि विकास परियोजनाओं को समय पर गति देना, निवेश को प्रोत्साहित करना और नागरिकों को बेहतर प्रशासनिक सेवाएं उपलब्ध कराना है। यदि यह मॉडल सफल रहता है, तो भविष्य में भूमि प्रशासन से जुड़े अन्य क्षेत्रों में भी इसी तरह के विकेंद्रीकरण पर विचार किया जा सकता है।
