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बाबरी मस्जिद और वक्फ बिल के विरोध पर SDPI नेता को तड़ीपार करना पड़ा भारी, बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई को बताया असंवैधानिक
बाबरी मस्जिद विध्वंस और वक्फ संशोधन विधेयक के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में भाग लेने को आधार बनाकर SDPI नेता को शहर से बाहर करने की कार्रवाई पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध और सरकार की आलोचना संविधान प्रदत्त अधिकार हैं, इन्हें कानून-व्यवस्था के लिए खतरा मानकर किसी नागरिक को तड़ीपार नहीं किया जा सकता।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण विरोध और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के दो पदाधिकारियों के खिलाफ जारी तड़ीपार (Externment) आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि केवल सरकार की नीतियों का विरोध करने, वक्फ (संशोधन) विधेयक के खिलाफ प्रदर्शन करने या बाबरी मस्जिद विध्वंस के विरोध में नारे लगाने के आधार पर किसी व्यक्ति को शहर से बाहर करना कानून और संविधान की भावना के अनुरूप नहीं है।
न्यायमूर्ति माधव जमदार की एकलपीठ ने फिरोज अब्दुल वहाब खान और मोहम्मद रफीक गुलाम रसूल अंसारी द्वारा दायर आपराधिक रिट याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। दोनों याचिकाकर्ताओं ने मुंबई पुलिस द्वारा जारी एक वर्ष के तड़ीपार आदेश को चुनौती दी थी। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि राज्य सरकार द्वारा अपनाई गई कार्रवाई न केवल मनमानी थी, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन करती है।
क्या था पूरा मामला
मुंबई पुलिस ने वर्ष 2025 में महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत दोनों SDPI नेताओं को एक वर्ष के लिए मुंबई शहर और उससे जुड़े क्षेत्रों से तड़ीपार करने का आदेश जारी किया था। पुलिस का कहना था कि उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों के कारण सार्वजनिक शांति और कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। पुलिस ने तड़ीपार आदेश के समर्थन में मुख्य रूप से वर्ष 2024 और 2025 में दर्ज तीन एफआईआर का हवाला दिया। इनमें पहला मामला वक्फ (संशोधन) विधेयक के विरोध में आयोजित प्रदर्शन से जुड़ा था। दूसरा मामला बाबरी मस्जिद विध्वंस के विरोध में नारेबाजी और प्रदर्शन का था, जबकि तीसरा मामला मुंबई के चेंबूर इलाके में बढ़ते वायु प्रदूषण के खिलाफ स्थानीय नागरिकों के साथ किए गए आंदोलन से संबंधित था। याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में कहा गया कि इन तीनों मामलों में कहीं भी हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या किसी गंभीर अपराध का आरोप नहीं है। सभी मामले लोकतांत्रिक विरोध और सार्वजनिक आंदोलनों से जुड़े हैं, इसलिए इनके आधार पर तड़ीपार जैसी कठोर कार्रवाई उचित नहीं ठहराई जा सकती।
सिर्फ SDPI नेताओं पर कार्रवाई क्यों?
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य रखा गया कि अगस्त 2025 में वक्फ (संशोधन) विधेयक के विरोध में आयोजित प्रदर्शन में केवल SDPI ही नहीं बल्कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP), शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे), अन्य विपक्षी दलों के नेता तथा बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक भी शामिल थे। इसके बावजूद पुलिस ने तड़ीपार की कार्रवाई केवल SDPI नेताओं के खिलाफ की। अदालत ने इस पहलू को गंभीरता से लेते हुए कहा कि समान परिस्थितियों में केवल एक राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं को निशाना बनाना कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत के विपरीत है। न्यायमूर्ति माधव जमदार ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं के खिलाफ ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की गई। ऐसे में केवल याचिकाकर्ताओं को चुनकर तड़ीपार करना भेदभावपूर्ण और मनमाना प्रतीत होता है।
बाबरी मस्जिद विरोध पर सरकार का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से मुख्य लोक अभियोजक शिशिर हिराय ने अदालत में दलील दी कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के विरोध में लगाए गए कुछ नारे समाज में तनाव और विभाजन पैदा कर सकते हैं। इसलिए प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से कार्रवाई की। हालांकि अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि राज्य सरकार इस दावे के समर्थन में कोई ठोस सामग्री, रिपोर्ट या साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ताओं के नारों या प्रदर्शनों से वास्तव में सामाजिक अशांति या हिंसा की स्थिति उत्पन्न हुई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आशंका या अनुमान के आधार पर किसी नागरिक के खिलाफ तड़ीपार जैसी कठोर प्रशासनिक कार्रवाई नहीं की जा सकती। सरकार की आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जिन सभी एफआईआर को आधार बनाकर तड़ीपार आदेश जारी किया गया, वे केंद्र सरकार के विभिन्न निर्णयों के विरोध से संबंधित थीं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी नागरिक या राजनीतिक दल को सरकार की नीतियों का विरोध करने, प्रदर्शन करने और अपनी असहमति व्यक्त करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। अदालत ने कहा कि यदि शांतिपूर्ण विरोध को ही अपराध मान लिया जाएगा तो इससे लोकतांत्रिक मूल्यों को गंभीर क्षति पहुंचेगी। संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का अधिकार देता है और प्रशासन इन अधिकारों का मनमाने तरीके से हनन नहीं कर सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला
न्यायमूर्ति माधव जमदार ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट तथा बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि तड़ीपार जैसी कार्रवाई असाधारण परिस्थितियों में ही की जानी चाहिए। प्रशासन को यह साबित करना आवश्यक होता है कि संबंधित व्यक्ति की उपस्थिति से वास्तव में कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है। अदालत ने कहा कि इस मामले में राज्य सरकार ऐसा कोई ठोस आधार प्रस्तुत नहीं कर सकी जिससे यह सिद्ध हो कि याचिकाकर्ताओं की गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था के लिए वास्तविक खतरा थीं।
मौलिक अधिकारों का हुआ उल्लंघन
हाईकोर्ट ने कहा कि तड़ीपार आदेश के कारण याचिकाकर्ताओं के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, स्वतंत्र आवागमन के अधिकार और सम्मानपूर्वक जीवन जीने के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अदालत ने माना कि प्रशासनिक शक्तियों का उपयोग किसी व्यक्ति के राजनीतिक विचारों या शांतिपूर्ण विरोध को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना और विरोध को अपराध नहीं माना जा सकता, जब तक कि उससे वास्तविक हिंसा या सार्वजनिक व्यवस्था भंग होने का प्रमाण न हो।
हाईकोर्ट का अंतिम फैसला
सभी पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई पुलिस द्वारा जारी तड़ीपार आदेश को पूरी तरह रद्द और निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा की गई कार्रवाई कानून की कसौटी पर खरी नहीं उतरती और यह संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
मामले का विवरण
मामला: Firoz Abdul Wahab Khan & Anr. बनाम State of Maharashtra
याचिका: Criminal Writ Petition No. 2703 of 2026 सहित संबंधित याचिकाएं
न्यायाधीश: न्यायमूर्ति माधव जमदार
न्यायालय: बॉम्बे हाईकोर्ट
याचिकाकर्ताओं की ओर से: अधिवक्ता इब्राहीम के.एम.
राज्य की ओर से: मुख्य लोक अभियोजक शिशिर हिराय, अतिरिक्त लोक अभियोजक स्वप्निल वाल्वे तथा अन्य सरकारी अधिवक्ता उपस्थित रहे।
