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अनुच्छेद 21 बना राहत की वजह: सुप्रीम कोर्ट ने 12 साल से जेल में बंद दो UAPA आरोपियों को दी जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी आरोपी को केवल गंभीर आरोपों के आधार पर वर्षों तक जेल में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने माना कि जब ट्रायल आगे ही नहीं बढ़ रहा हो, तब लंबी कैद संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन बन जाती है।

मैंने उपलब्ध रिपोर्टों और सार्वजनिक जानकारी का मिलान किया। तथ्य मुख्य रूप से सही हैं। सुप्रीम कोर्ट की पीठ (न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता) ने मोहम्मद साकिब अंसारी और वकार अज़हर को लगभग 12 वर्ष की लंबी हिरासत तथा मुकदमे की बेहद धीमी सुनवाई को देखते हुए जमानत दी। अदालत ने माना कि ऐसी परिस्थितियों में निरंतर हिरासत संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली मामले में 197 गवाहों में से केवल 68 की ही गवाही पूरी हुई थी और जनवरी 2025 के बाद बेहद सीमित प्रगति हुई। यह तथ्य विभिन्न कानूनी रिपोर्टों से भी पुष्ट होता है।
12 साल से जेल में बंद UAPA के दो आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट से जमानत, कहा- अनिश्चितकाल तक कैद नहीं रख सकता कानून, धीमी सुनवाई से अनुच्छेद 21 का उल्लंघन
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत करीब 12 वर्षों से जेल में बंद दो आरोपियों को जमानत देते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि किसी भी आरोपी को केवल इसलिए अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता क्योंकि उस पर गंभीर आरोप लगे हैं। यदि मुकदमे की सुनवाई वर्षों तक आगे नहीं बढ़ती और उसके जल्द पूरा होने की संभावना नहीं है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मोहम्मद साकिब अंसारी और वकार अज़हर को जमानत देने का आदेश दिया। दोनों के खिलाफ दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने वर्ष 2011 में एफआईआर संख्या 54/2011 दर्ज की थी। अदालत ने कहा कि दोनों आरोपियों को ट्रायल कोर्ट द्वारा निर्धारित शर्तों के अधीन रिहा किया जाए, यदि वे किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं। यह आदेश 29 जुलाई 2026 को पारित किया गया।
दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज की थी जमानत
दोनों आरोपियों ने दिल्ली हाईकोर्ट के 24 अप्रैल 2026 के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने UAPA की धारा 43D(5) के तहत जमानत देने से इनकार किया था। इसके बाद दोनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
ई-कोर्ट रिकॉर्ड देखकर सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ई-कोर्ट्स पोर्टल पर उपलब्ध ट्रायल रिकॉर्ड का अवलोकन किया। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने कुल 197 गवाहों की सूची पेश की है, लेकिन अब तक केवल 68 गवाहों की ही गवाही दर्ज हो सकी है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह रहा कि जनवरी 2025 से जुलाई 2026 तक केवल दो गवाहों की ही गवाही हो सकी, जिनमें से एक की गवाही भी पूरी नहीं हुई। पीठ ने कहा कि मुकदमे की प्रगति अत्यंत धीमी है और निकट भविष्य में इसके समाप्त होने की कोई संभावना दिखाई नहीं देती। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि इस मामले में कुल 25 आरोपी हैं, जिससे सुनवाई और लंबी खिंच सकती है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला नवंबर 2011 में पाकिस्तानी नागरिक मोहम्मद क़तील सिद्दीकी की गिरफ्तारी के बाद सामने आया था। जांच एजेंसियों के अनुसार पूछताछ के दौरान उसने कथित तौर पर इंडियन मुजाहिदीन के राजस्थान मॉड्यूल के बारे में जानकारी दी थी। इसके आधार पर राजस्थान के जोधपुर और जयपुर में कुछ स्थानों पर छापेमारी की गई, जहां से जांच एजेंसियों ने विस्फोटक सामग्री और कथित आईईडी बनाने का सामान बरामद करने का दावा किया। इसी आधार पर राजस्थान में दो अलग-अलग एफआईआर और दिल्ली में यह मामला दर्ज किया गया।
तीनों मामलों में समान आरोप
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि दिल्ली और राजस्थान में दर्ज तीनों मामलों में लगाए गए आरोप काफी हद तक एक-दूसरे से जुड़े और समान प्रकृति के हैं। अदालत ने यह भी नोट किया कि राजस्थान के एक मामले में दोनों आरोपियों को वर्ष 2021 में दोषी ठहराया गया था, लेकिन बाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने उनकी सजा पर रोक लगाते हुए उन्हें राहत दे दी। दूसरे राजस्थान मामले में भी दोनों पहले से जमानत पर हैं। दिल्ली मामले में भी सह-आरोपी मोहम्मद मारूफ को पहले ही जमानत मिल चुकी है। इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि दोनों याचिकाकर्ताओं को लगातार जेल में रखना उचित नहीं है।
अनुच्छेद 21 सर्वोपरि
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। विशेष कानूनों जैसे UAPA में जमानत के लिए कड़े प्रावधान अवश्य हैं, लेकिन यदि मुकदमे में असाधारण देरी हो और आरोपी वर्षों तक जेल में रहे, तो संवैधानिक अदालतें व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए जमानत देने का अधिकार रखती हैं। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के उन निर्णयों की कड़ी में देखा जा रहा है, जिनमें अदालत ने कहा है कि "बेल नियम है और जेल अपवाद", तथा लंबी न्यायिक देरी के कारण किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता अनिश्चितकाल तक छीनी नहीं जा सकती।
मामले का विवरण
मामला: Mohd. Saquib Ansari vs State (NCT of Delhi) एवं संबद्ध मामला
पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता
निर्णय की तारीख: 29 जुलाई 2026
मुख्य मुद्दा: UAPA के तहत लंबी न्यायिक हिरासत, मुकदमे में अत्यधिक देरी और अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार।
