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सिर्फ ‘अवैध गिरफ्तारी’ का आरोप काफी नहीं! पुलिस पर अवमानना की कार्रवाई से बॉम्बे हाईकोर्ट का इनकार

क्या केवल यह कहना कि पुलिस ने अवैध तरीके से गिरफ्तार किया, अधिकारियों को अदालत की अवमानना का दोषी बना सकता है? बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस अहम कानूनी सवाल पर बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि गिरफ्तारी को 'अवैध' बताना भर पर्याप्त नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अवमानना की कार्रवाई तभी संभव है, जब न्यायालय के आदेशों की जानबूझकर अवहेलना के ठोस कानूनी आधार रिकॉर्ड पर मौजूद हों।

Sonali30 जुल. 2026, 07:17 PM IST
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सिर्फ ‘अवैध गिरफ्तारी’ का आरोप काफी नहीं! पुलिस पर अवमानना की कार्रवाई से बॉम्बे हाईकोर्ट का इनकार

मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी और पुलिस कार्रवाई से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल यह आरोप कि किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करते हुए की गई, पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है। अदालत ने कहा कि अवमानना की कार्यवाही तभी शुरू की जा सकती है जब न्यायालय के आदेशों की जानबूझकर अवहेलना या अवमानना अधिनियम के तहत आवश्यक कानूनी तत्व स्पष्ट रूप से स्थापित हों। न्यायमूर्ति सुमन श्याम और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की खंडपीठ ने मुंबई पुलिस के अधिकारियों के खिलाफ दायर अवमानना याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। याचिकाकर्ता बिनोद अग्रवाल ने दावा किया था कि वर्ष 2018 में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी एक्ट) के तहत दर्ज एक मामले में उनकी गिरफ्तारी सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करते हुए की गई थी।


क्या था मामला?

याचिकाकर्ता बिनोद अग्रवाल को अक्टूबर 2018 में मुंबई पुलिस ने आईटी एक्ट की धारा 43 (डेटा को नुकसान पहुंचाना) और धारा 66C (पहचान की चोरी) से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया था। आरोप था कि उन्हें करीब 65 दिनों तक हिरासत में रखा गया और दिसंबर 2018 में पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल किए जाने के बाद ही उन्हें रिहाई मिली। बाद में जून 2019 में दोनों पक्षों के बीच समझौता होने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ तथा उनके द्वारा दर्ज दोनों एफआईआर रद्द कर दी थीं।


याचिकाकर्ता का तर्क

अग्रवाल ने अदालत से कहा कि उनकी गिरफ्तारी सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों, विशेषकर Arnesh Kumar बनाम State of Bihar और Joginder Kumar बनाम State of Uttar Pradesh में निर्धारित दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करते हुए की गई। उनका कहना था कि इसलिए संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए।


हाईकोर्ट ने क्या कहा?

खंडपीठ ने कहा कि अवमानना की कार्यवाही एक असाधारण न्यायिक शक्ति है और इसे केवल आरोपों के आधार पर शुरू नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई न्यायिक आदेश या संतोष दर्ज नहीं है जिससे यह साबित हो कि अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 14 या धारा 15 के तहत कार्यवाही शुरू करने की आवश्यक शर्तें पूरी होती हैं। इसलिए केवल यह कहना कि गिरफ्तारी सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के विपरीत हुई, अवमानना का मामला नहीं बनाता।


Arnesh Kumar और Joginder Kumar फैसलों का महत्व

सुप्रीम कोर्ट ने Arnesh Kumar मामले में पुलिस को निर्देश दिया था कि सात वर्ष तक की सजा वाले मामलों में गिरफ्तारी अंतिम विकल्प होनी चाहिए और उसके लिए उचित कारण दर्ज किए जाएं। वहीं Joginder Kumar मामले में कहा गया था कि किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी मनमाने तरीके से नहीं की जा सकती और गिरफ्तारी के पीछे वैधानिक आधार होना चाहिए। हालांकि बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन दिशा-निर्देशों के कथित उल्लंघन का आरोप स्वतः अवमानना की कार्यवाही का आधार नहीं बनता।


फैसले का महत्व

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसकी गिरफ्तारी अवैध थी, तो उसके लिए कानून में अन्य उपयुक्त कानूनी उपाय उपलब्ध हैं। लेकिन केवल ऐसे आरोपों के आधार पर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती। अदालत ने दोहराया कि अवमानना कानून का उपयोग केवल उन्हीं मामलों में किया जाएगा जहां न्यायालय के आदेशों की स्पष्ट और जानबूझकर अवहेलना साबित हो।