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भारत की मेडिकल रिसर्च को बड़ी कामयाबी, SGPGIMS ने लैब में उगाईं मानव हार्ट वाल्व कोशिकाएं
लखनऊ स्थित SGPGIMS के वैज्ञानिकों ने पहली बार मानव हृदय वाल्व की जीवित कोशिकाओं को प्रयोगशाला में सफलतापूर्वक अलग कर विकसित किया है। यह उपलब्धि भविष्य में मरीजों की अपनी कोशिकाओं से कृत्रिम लेकिन जीवित हार्ट वाल्व तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे हार्ट वाल्व रिप्लेसमेंट अधिक सुरक्षित, प्रभावी और व्यक्तिगत बनाया जा सकेगा। हालांकि यह तकनीक अभी शुरुआती शोध चरण में है और मरीजों तक पहुंचने से पहले इसे कई वैज्ञानिक परीक्षणों और क्लीनिकल ट्रायल्स से गुजरना होगा।
Vindhya Dubey30 जुल. 2026, 07:17 PM IST

भारत ने हृदय रोगों के इलाज की दिशा में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है। लखनऊ के संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGIMS) के शोधकर्ताओं ने पहली बार मानव हृदय वाल्व (Human Heart Valve) की जीवित कोशिकाओं को सफलतापूर्वक अलग कर प्रयोगशाला में विकसित किया है। यह उपलब्धि भविष्य में ऐसे कृत्रिम लेकिन जीवित हार्ट वाल्व विकसित करने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है, जो मरीज के शरीर के साथ बेहतर तालमेल बैठा सकें। यह शोध केवल एक प्रयोगशाला तक सीमित उपलब्धि नहीं है, बल्कि इससे रीजनरेटिव मेडिसिन, टिश्यू इंजीनियरिंग और आधुनिक हृदय चिकित्सा के क्षेत्र में नई संभावनाएं खुल सकती हैं।
आखिर हार्ट वाल्व क्या होता है?
मानव हृदय में चार वाल्व होते हैं, जिनका काम रक्त को सही दिशा में प्रवाहित करना होता है। यदि इनमें किसी भी प्रकार की खराबी आ जाए, जैसे वाल्व का संकरा हो जाना, पूरी तरह बंद न होना या रक्त का वापस लौटना, तो हृदय पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। समय रहते इलाज न मिलने पर यह समस्या हार्ट फेलियर, स्ट्रोक, अनियमित धड़कन और कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकती है। ऐसे मरीजों के लिए कई बार हार्ट वाल्व रिप्लेसमेंट सर्जरी ही एकमात्र विकल्प बचता है।
मौजूदा इलाज में क्या हैं चुनौतियां?
आज हार्ट वाल्व बदलने के लिए मुख्य रूप से दो प्रकार के वाल्व लगाए जाते हैं। पहला मैकेनिकल वाल्व, जो लंबे समय तक चलता है लेकिन मरीज को जीवनभर ब्लड थिनर दवाएं लेनी पड़ती हैं। दूसरा बायोलॉजिकल वाल्व, जो इंसानों या जानवरों के ऊतकों से तैयार किया जाता है, लेकिन इसकी उम्र सीमित होती है और कुछ वर्षों बाद दोबारा सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। यही वजह है कि दुनिया भर के वैज्ञानिक लंबे समय से ऐसे जीवित वाल्व विकसित करने पर काम कर रहे हैं जो शरीर के साथ स्वाभाविक रूप से कार्य करें और लंबे समय तक टिके रहें।
SGPGIMS के शोध ने क्या हासिल किया?
शोधकर्ताओं ने मानव हृदय वाल्व से विशेष कोशिकाओं को अलग कर नियंत्रित प्रयोगशाला वातावरण में सफलतापूर्वक विकसित किया। इन कोशिकाओं की वृद्धि और व्यवहार का अध्ययन किया गया, जिससे भविष्य में इन्हीं कोशिकाओं की मदद से बायोइंजीनियर्ड हार्ट वाल्व विकसित करने की संभावना मजबूत हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार यह उपलब्धि भविष्य में मरीज की अपनी कोशिकाओं से नया वाल्व तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार बन सकती है, जिससे शरीर द्वारा वाल्व को अस्वीकार करने की संभावना काफी कम हो सकती है।
मरीजों को भविष्य में क्या फायदा होगा?
यदि आने वाले वर्षों में यह तकनीक सफल क्लीनिकल ट्रायल्स से गुजरती है, तो हार्ट वाल्व रिप्लेसमेंट पूरी तरह बदल सकता है। मरीजों को ऐसे वाल्व मिल सकते हैं जो उनके शरीर के अनुरूप हों, संक्रमण और इम्यून रिजेक्शन का खतरा कम हो, दोबारा सर्जरी की जरूरत घटे और लंबे समय तक बेहतर परिणाम मिलें। बच्चों में भी ऐसे वाल्व भविष्य में अधिक उपयोगी साबित हो सकते हैं क्योंकि वैज्ञानिक ऐसे वाल्व विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं जो शरीर के विकास के साथ अनुकूल हो सकें।
रीजनरेटिव मेडिसिन क्यों है भविष्य की चिकित्सा?
रीजनरेटिव मेडिसिन चिकित्सा विज्ञान का तेजी से विकसित होता क्षेत्र है, जिसमें शरीर की कोशिकाओं का उपयोग करके क्षतिग्रस्त अंगों और ऊतकों की मरम्मत या नए ऊतक विकसित किए जाते हैं। दुनिया भर में हृदय, लीवर, त्वचा, हड्डियों और नसों के इलाज के लिए इसी तकनीक पर तेजी से शोध हो रहा है। भारत में इस क्षेत्र में हुई यह उपलब्धि देश को वैश्विक बायोमेडिकल रिसर्च में नई पहचान दिला सकती है।
भारत के लिए यह उपलब्धि क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत में हर साल लाखों लोग हार्ट वाल्व संबंधी बीमारियों से प्रभावित होते हैं। बढ़ती उम्र, जन्मजात हृदय रोग, रूमेटिक हार्ट डिजीज और अन्य कार्डियक समस्याओं के कारण बड़ी संख्या में मरीजों को वाल्व रिप्लेसमेंट की जरूरत पड़ती है। यदि भविष्य में देश में ही आधुनिक बायोइंजीनियर्ड वाल्व विकसित होने लगते हैं, तो आयातित तकनीक पर निर्भरता कम होगी, इलाज अधिक सुलभ और किफायती बन सकेगा तथा भारत मेडिकल रिसर्च और हेल्थकेयर इनोवेशन के क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभा सकेगा।
क्या अभी मरीज इस तकनीक का लाभ उठा सकते हैं?
विशेषज्ञों का कहना है कि यह शोध अभी शुरुआती चरण में है। प्रयोगशाला में कोशिकाओं का सफल विकास एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन इन्हीं कोशिकाओं से सुरक्षित और प्रभावी हार्ट वाल्व बनाकर मरीजों में उपयोग करने से पहले कई वर्षों तक प्रीक्लीनिकल रिसर्च, क्लीनिकल ट्रायल और नियामकीय मंजूरी की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इसलिए फिलहाल यह खोज भविष्य की चिकित्सा के लिए उम्मीद जगाती है, लेकिन आम मरीजों के उपचार का हिस्सा बनने में अभी समय लगेगा। SGPGIMS का यह शोध भारतीय चिकित्सा विज्ञान के लिए एक मील का पत्थर माना जा रहा है। यह उपलब्धि बताती है कि भारत केवल आधुनिक उपचार अपनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य की चिकित्सा तकनीकों के विकास में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। यदि आगे के शोध सफल रहते हैं, तो आने वाले वर्षों में लाखों हृदय रोगियों को अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और व्यक्तिगत उपचार उपलब्ध कराने का रास्ता खुल सकता है।
