health
ऑर्गन ट्रांसप्लांट में भारत की बड़ी उपलब्धि, लेकिन अंगदान की कमी बनी सबसे बड़ी चुनौती
भारत में ऑर्गन ट्रांसप्लांट की संख्या लगातार बढ़ रही है और देश दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हो चुका है। इसके बावजूद जरूरतमंद मरीजों की तुलना में प्रत्यारोपण की संख्या अभी भी बेहद कम है। विशेषज्ञों का कहना है कि मृतक अंगदान (Deceased Organ Donation) की कम दर, जागरूकता की कमी और सीमित स्वास्थ्य संसाधनों के कारण लाखों मरीज समय पर जीवनरक्षक अंग नहीं प्राप्त कर पाते। रिपोर्ट के अनुसार, अंगदान को बढ़ावा देना और ट्रांसप्लांट सिस्टम को मजबूत करना भारत के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी प्राथमिकता है।
Vindhya Dubey30 जुल. 2026, 07:17 PM IST

भारत: पिछले कुछ वर्षों में भारत ने ऑर्गन ट्रांसप्लांट के क्षेत्र में तेजी से प्रगति की है। किडनी, लिवर, हृदय और फेफड़ों के प्रत्यारोपण की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिससे भारत दुनिया में सबसे अधिक ऑर्गन ट्रांसप्लांट करने वाले देशों में शामिल हो गया है। लेकिन इस उपलब्धि के पीछे एक बड़ी चुनौती भी छिपी है। विशेषज्ञों के अनुसार देश में होने वाले ट्रांसप्लांट, जरूरतमंद मरीजों की वास्तविक संख्या की तुलना में अभी भी बहुत कम हैं। इसका मतलब है कि हजारों सफल सर्जरी के बावजूद लाखों मरीज अब भी जीवनरक्षक अंग मिलने का इंतजार कर रहे हैं।
ऑर्गन ट्रांसप्लांट एक ऐसी चिकित्सा प्रक्रिया है, जिसमें किसी गंभीर रूप से खराब हो चुके अंग को स्वस्थ दान किए गए अंग से बदला जाता है। यह उन मरीजों के लिए अंतिम और सबसे प्रभावी इलाज होता है, जिनकी किडनी, लिवर, हृदय, फेफड़े या अन्य महत्वपूर्ण अंग काम करना लगभग बंद कर चुके होते हैं। कुछ अंग, जैसे किडनी और लिवर का एक हिस्सा, जीवित व्यक्ति दान कर सकता है, जबकि हृदय और फेफड़े जैसे अंग केवल ब्रेन-डेड व्यक्ति से ही प्राप्त किए जा सकते हैं।
भारत में इतनी बड़ी कमी क्यों?
विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे बड़ी समस्या अंगों की उपलब्धता है। देश में प्रत्यारोपण कराने वाले मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन अंगदान करने वालों की संख्या उसी गति से नहीं बढ़ रही। भारत में अधिकांश ट्रांसप्लांट जीवित रिश्तेदारों द्वारा किए गए दान पर निर्भर हैं, जबकि विकसित देशों में बड़ी संख्या में अंग ब्रेन-डेड डोनर से प्राप्त होते हैं। भारत में ब्रेन डेथ को लेकर जागरूकता की कमी, सामाजिक भ्रांतियां, कानूनी प्रक्रिया की जानकारी का अभाव और परिवारों की हिचकिचाहट मृतक अंगदान को सीमित कर देती है।
किन मरीजों को सबसे अधिक जरूरत पड़ती है?
देश में सबसे ज्यादा जरूरत किडनी ट्रांसप्लांट की होती है। मधुमेह, उच्च रक्तचाप और क्रॉनिक किडनी डिजीज के बढ़ते मामलों के कारण हर साल लाखों मरीज अंतिम चरण की किडनी बीमारी तक पहुंच जाते हैं। इसके अलावा लिवर सिरोसिस, हार्ट फेलियर, जन्मजात हृदय रोग, फेफड़ों की गंभीर बीमारियां और कुछ दुर्लभ रोगों से पीड़ित मरीजों को भी समय पर ट्रांसप्लांट की आवश्यकता होती है। अंग नहीं मिलने की वजह से कई मरीज वर्षों तक प्रतीक्षा सूची में रहते हैं और अनेक मामलों में इलाज का मौका मिलने से पहले ही उनकी मृत्यु हो जाती है।
ऑर्गन डोनेशन क्यों है सबसे बड़ा समाधान?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार एक ब्रेन-डेड व्यक्ति कई लोगों को नया जीवन दे सकता है। उसके हृदय, दोनों किडनी, लिवर, दोनों फेफड़े, अग्न्याशय और कई ऊतकों का उपयोग अलग-अलग मरीजों के इलाज में किया जा सकता है। यानी एक व्यक्ति का अंगदान कई परिवारों के लिए जीवन की नई उम्मीद बन सकता है। यही कारण है कि दुनिया भर में मृतक अंगदान को बढ़ावा देने पर सबसे अधिक जोर दिया जाता है।
बढ़ते ट्रांसप्लांट से क्या होंगे फायदे?
यदि देश में अंगदान की दर बढ़ती है, तो प्रतीक्षा सूची छोटी होगी और मरीजों को समय पर जीवनरक्षक उपचार मिल सकेगा। इससे डायलिसिस जैसे लंबे और महंगे इलाज पर निर्भरता कम होगी, अस्पतालों पर दबाव घटेगा और गंभीर मरीजों की जीवन गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार आएगा। इसके साथ ही भारत स्वास्थ्य सेवाओं और ट्रांसप्लांट तकनीक के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर और मजबूत स्थिति हासिल कर सकता है।
सरकार क्या कर रही है?
भारत सरकार ने राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (NOTTO) के माध्यम से अंगदान और अंग आवंटन की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। कई राज्यों में ग्रीन कॉरिडोर की व्यवस्था, ऑनलाइन वेटिंग लिस्ट, ब्रेन डेथ सर्टिफिकेशन और ट्रांसप्लांट समन्वय प्रणाली को मजबूत किया गया है। इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता अभियान, अधिक ट्रांसप्लांट केंद्र, प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मी और ग्रामीण क्षेत्रों तक बेहतर सुविधाएं पहुंचाना अभी भी सबसे बड़ी जरूरत है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मुद्दा?
भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में से एक है, जहां जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। इसके कारण भविष्य में अंग प्रत्यारोपण की मांग और बढ़ने की संभावना है। यदि समय रहते अंगदान की संस्कृति को बढ़ावा नहीं दिया गया, तो लाखों मरीजों के लिए जीवनरक्षक इलाज तक पहुंच और मुश्किल हो सकती है। इसलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि अंगदान को केवल चिकित्सा प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और जनजागरूकता का अभियान बनाने की जरूरत है।
भारत ने ऑर्गन ट्रांसप्लांट के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब हर जरूरतमंद मरीज को समय पर जीवनरक्षक अंग उपलब्ध हो सके। इसके लिए आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के साथ-साथ समाज में अंगदान के प्रति विश्वास, जागरूकता और भागीदारी बढ़ाना सबसे महत्वपूर्ण होगा। यदि सरकार, अस्पताल और समाज मिलकर इस दिशा में काम करें, तो आने वाले वर्षों में लाखों लोगों को नया जीवन दिया जा सकता है।
