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7 साल की उम्र में मुंबई लोकल से अकेले प्रैक्टिस के लिए जाते थे अजिंक्य रहाणे, पिता की यह अनोखी ट्रिक 6 साल बाद पता चली तो हो गए भावुक
भारतीय क्रिकेट टीम के अनुभवी बल्लेबाज अजिंक्य रहाणे ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने की घोषणा कर अपने शानदार करियर को भावुक विदाई दी। इस मौके पर उनके बचपन का एक प्रेरणादायक किस्सा फिर चर्चा में आ गया। महज 7 साल की उम्र में डोंबिवली से मुंबई लोकल ट्रेन में अकेले क्रिकेट प्रैक्टिस के लिए जाने वाले अजिंक्य पर उनके पिता चुपचाप दूसरे डिब्बे से नजर रखते थे। कई साल बाद जब उन्हें इस बात की सच्चाई पता चली, तो वे भावुक हो गए और अपने माता-पिता के त्याग को अपनी सफलता की सबसे बड़ी वजह बताया।
Priyanka Gaikwad30 जुल. 2026, 07:17 PM IST

भारतीय क्रिकेट टीम के भरोसेमंद बल्लेबाज अजिंक्य रहाणे ने हाल ही में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने की घोषणा की। सोशल मीडिया पर एक भावुक वीडियो साझा करते हुए उन्होंने अपने क्रिकेट करियर को अलविदा कहा और इस सफर में साथ देने वाले परिवार, कोच, साथियों और प्रशंसकों का आभार व्यक्त किया। रहाणे के संन्यास के बाद उनके जीवन से जुड़ी कई प्रेरणादायक कहानियां एक बार फिर चर्चा में हैं। इनमें सबसे ज्यादा लोगों का दिल छूने वाली कहानी उनके बचपन और उनके पिता के त्याग से जुड़ी है। डोंबिवली के एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे अजिंक्य रहाणे को बचपन से ही क्रिकेट का बेहद शौक था। उनके इस सपने को पूरा करने के लिए उनके माता-पिता ने कई कठिनाइयों का सामना किया। महज सात साल की उम्र में अजिंक्य रोज सुबह अपनी क्रिकेट किट बैग लेकर भीड़भाड़ वाली मुंबई लोकल ट्रेन से प्रैक्टिस के लिए सफर करते थे। आज के समय में इतनी छोटी उम्र के बच्चे को अकेले लोकल ट्रेन से भेजने की कल्पना भी मुश्किल लगती है, लेकिन उनके पिता का उद्देश्य उन्हें जिम्मेदार और आत्मनिर्भर बनाना था।
बीबीसी के एक प्री-मैच शो में बातचीत के दौरान अजिंक्य रहाणे ने बताया कि प्रैक्टिस के पहले दिन उनके पिता उन्हें खुद छोड़ने गए थे। इसके लिए उन्हें ऑफिस से छुट्टी लेनी पड़ी थी और उस दिन की तनख्वाह भी नहीं मिली थी। अगले दिन उन्होंने अजिंक्य से कहा, "अब तुम्हें लोकल ट्रेन से अकेले ही जाना होगा।" उस समय छोटे अजिंक्य को लगा कि उनके पिता को उन पर पूरा भरोसा है, इसलिए उन्होंने उन्हें अकेले भेज दिया। लेकिन इस फैसले के पीछे पिता की चिंता कितनी गहरी थी, इसका पता उन्हें कई साल बाद चला। रहाणे ने बताया कि करीब पांच से छह साल बाद उनके पिता ने उन्हें एक राज बताया। जब वह सात साल की उम्र में अकेले लोकल ट्रेन से सफर करते थे, तब उनके पिता उसी ट्रेन के दूसरे डिब्बे में सफर करते थे। वे पूरे रास्ते इस बात का ध्यान रखते थे कि उनका बेटा सुरक्षित ट्रेन में चढ़ा है या नहीं, सही स्टेशन पर उतरा है या नहीं और प्रैक्टिस तक ठीक-ठाक पहुंच गया है या नहीं।
सबसे खास बात यह थी कि उन्होंने कभी भी अजिंक्य को इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि वे उन पर नजर रख रहे हैं। उन्हें हमेशा यही महसूस कराया कि वे अपने दम पर सफर कर रहे हैं। इसी वजह से अजिंक्य के भीतर आत्मविश्वास, जिम्मेदारी और आत्मनिर्भरता की भावना विकसित हुई। जब वर्षों बाद उन्हें अपने पिता की इस अनोखी सोच और त्याग का पता चला, तो वे बेहद भावुक हो गए। अजिंक्य रहाणे ने कहा कि उस दिन उन्होंने मन ही मन एक संकल्प लिया था कि वे अपने जीवन में जो भी हासिल करेंगे, चाहे महाराष्ट्र के लिए खेलना हो या भारतीय टीम के लिए, वह सब अपने माता-पिता को समर्पित करेंगे।
उनके माता-पिता ने जो त्याग और संघर्ष किया, वही उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा बन गया और उसी ने उन्हें हर मुश्किल दौर में आगे बढ़ने की ताकत दी। अजिंक्य रहाणे की यह कहानी सिर्फ एक क्रिकेटर के संघर्ष की नहीं, बल्कि माता-पिता के निस्वार्थ प्रेम, विश्वास और त्याग की मिसाल है। यह कहानी बताती है कि बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उनकी सुरक्षा का ख्याल रखना। रहाणे के पिता ने बिना जताए अपने बेटे का साथ दिया और यही संस्कार आगे चलकर अजिंक्य रहाणे की सफलता की मजबूत नींव बने। आज उनका यह किस्सा लाखों माता-पिता और युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है।
