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पुलिस को हाईकोर्ट की दो टूक: शादी की नहीं, अपराध की जांच करें! बालिगों की पसंद में दखल पर सख्त टिप्पणी

क्या पुलिस दो बालिगों की शादी की जांच कर सकती है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस सवाल पर ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए साफ कहा कि वयस्कों को अपनी पसंद से शादी करने का पूरा संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने यूपी पुलिस की कार्रवाई को अनुचित बताते हुए एफआईआर रद्द कर दी और पुलिस अधिकारियों व शिकायतकर्ता पिता पर लागत भी लगाई।

Sonali30 जुल. 2026, 07:17 PM IST
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पुलिस को हाईकोर्ट की दो टूक: शादी की नहीं, अपराध की जांच करें! बालिगों की पसंद में दखल पर सख्त टिप्पणी

वयस्कों को अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने की संवैधानिक स्वतंत्रता को दोहराते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि पुलिस का दायित्व अपराध की जांच करना है, न कि दो बालिग व्यक्तियों के विवाह की पड़ताल करना। अदालत ने कहा कि पुलिस को ऐसे मामलों में "नोजी पार्कर" (अनावश्यक दखल देने वाला) बनने का कोई अधिकार नहीं है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने 27 जुलाई 2026 को सुनाए गए फैसले में की। अदालत ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 87 के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए कहा कि बालिग व्यक्तियों की स्वतंत्र इच्छा से हुई शादी में पुलिस की जांच संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन है। 


क्या था पूरा मामला?

मामला उत्तर प्रदेश के एक ऐसे दंपति से जुड़ा था, जिन्होंने फरवरी 2026 में अपनी मर्जी से विवाह किया था। विवाह के बाद युवती के पिता ने उसके पति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 87 के तहत एफआईआर दर्ज कर ली और विवाह की जांच शुरू कर दी।

दंपति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कहा कि दोनों बालिग हैं तथा उन्होंने अपनी स्वतंत्र इच्छा से विवाह किया है। इसके बावजूद पुलिस लगातार उन्हें परेशान कर रही है और लड़की के पिता के पक्ष में कार्रवाई कर रही है।


कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि दो बालिग व्यक्तियों का अपनी इच्छा से विवाह करना कोई अपराध नहीं है। यदि किसी अपराध का प्रथम दृष्टया कोई आधार नहीं है तो पुलिस को केवल विवाह की जांच के लिए अपनी शक्तियों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। अदालत ने कहा, "बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने और उससे विवाह करने की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा संरक्षित व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। पुलिस का काम विवाहों की जांच करना नहीं बल्कि अपराध की जांच करना है।" कोर्ट ने यह भी कहा कि वह पहले भी कई मामलों में पुलिस को ऐसी अनावश्यक दखलंदाजी से बचने की सलाह दे चुका है, लेकिन इसके बावजूद इस तरह की कार्रवाई जारी है।


पुलिस और शिकायतकर्ता पर लगाया जुर्माना

हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस की कार्रवाई अनुचित थी और शिकायतकर्ता के प्रभाव में की गई। अदालत ने संबंधित पुलिस अधिकारियों और शिकायतकर्ता पिता पर लागत भी लगाई। कोर्ट ने आदेश दिया कि संबंधित पुलिस अधीक्षक (SP) और थाना प्रभारी (SHO) संयुक्त रूप से युवती को ₹1,000 का भुगतान करेंगे, जबकि शिकायतकर्ता पिता को ₹5,000 की लागत अदा करनी होगी।


अनुच्छेद 21 का दिया हवाला

फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि भारत का संविधान प्रत्येक बालिग नागरिक को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने और उसके साथ जीवन बिताने का अधिकार देता है। जब तक किसी आपराधिक कृत्य का स्पष्ट आधार न हो, तब तक पुलिस किसी वयस्क के विवाह में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।


सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी यही सिद्धांत

हाईकोर्ट का यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों की भावना के अनुरूप है। सर्वोच्च न्यायालय पहले भी लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006), शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ (2018) और शफीन जहां बनाम अशोकन (हादिया केस, 2018) में स्पष्ट कर चुका है कि बालिग व्यक्तियों को अपनी पसंद से विवाह करने का मौलिक अधिकार है और राज्य का दायित्व ऐसे दंपतियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, न कि उन्हें प्रताड़ित करना।


इस फैसले का महत्व

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनमें अंतरजातीय, अंतरधार्मिक या परिवार की इच्छा के विरुद्ध हुए विवाह के बाद पुलिस पर दबाव डालकर आपराधिक कार्रवाई कराने की कोशिश की जाती है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि पुलिस को कानून के दायरे में रहकर केवल वास्तविक अपराधों की जांच करनी चाहिए, न कि बालिगों के निजी वैवाहिक निर्णयों में हस्तक्षेप करना चाहिए।