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10 साल बाद फिर खुलेगा डोंगरी का उर्दू मरकज़, BMC की पहल से भाषा और संस्कृति को मिलेगा नया जीवन

मुंबई के डोंगरी स्थित ऐतिहासिक उर्दू मरकज़ करीब 10 वर्षों बाद फिर से शुरू होने जा रहा है। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) द्वारा स्थान उपलब्ध कराए जाने के बाद यहां उर्दू और मराठी भाषा की कक्षाएं, साहित्यिक कार्यक्रम और सांस्कृतिक गतिविधियां दोबारा आयोजित की जाएंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल न केवल भाषा शिक्षा को बढ़ावा देगी, बल्कि मुंबई की बहुभाषी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और नई पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

Anshuman Mishra30 जुल. 2026, 07:17 PM IST
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10 साल बाद फिर खुलेगा डोंगरी का उर्दू मरकज़, BMC की पहल से भाषा और संस्कृति को मिलेगा नया जीवन

मुंबई: मुंबई के डोंगरी इलाके में स्थित ऐतिहासिक उर्दू मरकज़ (Urdu Markaz) करीब 10 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद फिर से शुरू होने जा रहा है। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) ने मरकज़ को अपनी गतिविधियां संचालित करने के लिए स्थान उपलब्ध कराया है, जिसके बाद यहां दोबारा उर्दू और मराठी भाषा की कक्षाएं शुरू करने की तैयारी की जा रही है। यह कदम केवल एक शैक्षणिक संस्थान के दोबारा खुलने तक सीमित नहीं है, बल्कि मुंबई की बहुभाषी और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

क्या है डोंगरी का उर्दू मरकज़?
उर्दू मरकज़ की स्थापना वर्ष 1999 में इस उद्देश्य से की गई थी कि उर्दू और मराठी भाषा के बीच सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा दिया जा सके। यहां भाषा सीखने के साथ-साथ साहित्य, कविता, मुशायरे, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामाजिक गतिविधियों का भी आयोजन होता था। समय के साथ यह संस्थान छात्रों, शोधकर्ताओं, साहित्यकारों और भाषा प्रेमियों का प्रमुख केंद्र बन गया। हालांकि, वर्ष 2016 में भवन संबंधी समस्याओं और प्रशासनिक कारणों से इसकी गतिविधियां बंद हो गई थीं। अब BMC के सहयोग से इसे दोबारा शुरू किया जा रहा है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
मुंबई भारत के सबसे बहुभाषी शहरों में से एक है, जहां मराठी, हिंदी, उर्दू, गुजराती, तमिल और कई अन्य भाषाएं बोली जाती हैं। ऐसे में किसी भाषा केंद्र का दोबारा शुरू होना केवल शिक्षा का विषय नहीं बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण का भी हिस्सा है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भाषा के संरक्षण के लिए केवल स्कूलों में पढ़ाई पर्याप्त नहीं होती। उसके साहित्य, इतिहास, कविता, कला और सामाजिक परंपराओं को भी जीवित रखना जरूरी होता है। ऐसे संस्थान नई पीढ़ी को अपनी भाषाई विरासत से जोड़ने का काम करते हैं।

यहां क्या-क्या होगा?
मरकज़ में उर्दू और मराठी भाषा की नियमित कक्षाओं के अलावा साहित्यिक गोष्ठियां, पुस्तक चर्चा, कविता पाठ, लेखन कार्यशालाएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इसके साथ ही भाषा सीखने के इच्छुक विद्यार्थियों, गृहिणियों, वरिष्ठ नागरिकों और शोधकर्ताओं के लिए भी विशेष पाठ्यक्रम तैयार किए जाने की योजना है। संस्था से जुड़े लोगों का कहना है कि भविष्य में डिजिटल माध्यम से भी भाषा शिक्षण और साहित्यिक कार्यक्रमों को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाएगा।

उर्दू भाषा का भारत में क्या महत्व है?
उर्दू भारत की संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 अनुसूचित भाषाओं में से एक है। यह केवल एक भाषा नहीं बल्कि भारतीय साहित्य, संगीत, रंगमंच और सिनेमा की समृद्ध परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। मिर्ज़ा ग़ालिब, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, जोश मलीहाबादी, फ़िराक़ गोरखपुरी और कैफ़ी आज़मी जैसे साहित्यकारों की रचनाओं ने उर्दू को वैश्विक पहचान दिलाई। आज भी पत्रकारिता, फ़िल्म, ग़ज़ल और शायरी में उर्दू का व्यापक उपयोग होता है।

छात्रों और समाज को क्या होगा लाभ?
उर्दू मरकज़ के दोबारा शुरू होने से विद्यार्थियों को भाषा सीखने का नया अवसर मिलेगा। प्रतियोगी परीक्षाओं, अनुवाद, पत्रकारिता, शिक्षा, शोध और साहित्य जैसे क्षेत्रों में रुचि रखने वाले लोगों को इसका लाभ मिलेगा। इसके अलावा यह केंद्र अलग-अलग भाषाई समुदायों के बीच संवाद और सामाजिक समरसता को भी बढ़ावा देगा। विशेषज्ञों का मानना है कि बहुभाषी समाज में भाषा केंद्र सांस्कृतिक दूरी कम करने और आपसी समझ बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

BMC की भूमिका क्यों अहम है?
किसी स्थानीय निकाय द्वारा भाषा और संस्कृति से जुड़े संस्थानों को सहयोग देना इस बात का संकेत है कि शहरी विकास केवल सड़क, भवन और बुनियादी सुविधाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए। सांस्कृतिक संस्थानों को संरक्षण देना भी शहर के समग्र विकास का हिस्सा है। BMC की इस पहल से भविष्य में मुंबई के अन्य ऐतिहासिक भाषा और सांस्कृतिक केंद्रों के संरक्षण को भी बढ़ावा मिल सकता है।

मरकज़ के संचालकों का उद्देश्य इसे केवल भाषा सिखाने वाला संस्थान नहीं, बल्कि साहित्य, संस्कृति और सामाजिक संवाद का जीवंत केंद्र बनाना है। यदि यहां नियमित कक्षाएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम और आधुनिक डिजिटल संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं, तो यह आने वाले वर्षों में मुंबई के प्रमुख भाषा केंद्रों में फिर से अपनी पहचान बना सकता है। करीब दस वर्षों बाद डोंगरी के उर्दू मरकज़ का फिर से शुरू होना मुंबई की सांस्कृतिक विविधता और भाषाई विरासत के संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। यह पहल न केवल उर्दू भाषा के प्रचार-प्रसार में मदद करेगी, बल्कि नई पीढ़ी को साहित्य, संस्कृति और बहुभाषी भारत की समृद्ध परंपरा से जोड़ने का भी महत्वपूर्ण माध्यम बनेगी।