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पंढरपुर में गूंजा 'ज्ञानबा-तुकाराम' का जयघोष, सैकड़ों दिंडियों के साथ मना भव्य गोपाळकाला उत्सव
महाराष्ट्र की वारकरी परंपरा का महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन गोपाळकाला उत्सव गुरुवार को पंढरपुर तालुका के गोपाळपुर में श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। श्रीकृष्ण मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना, संतों की पालकियों के आगमन और सैकड़ों दिंडियों के साथ हजारों वारकरियों की मौजूदगी ने पूरे क्षेत्र को भक्तिमय बना दिया। "ज्ञानबा-तुकाराम" और "विठ्ठल-विठ्ठल" के जयघोष से पूरा गोपाळपुर गूंज उठा। यह आयोजन वारकरी संप्रदाय की सदियों पुरानी आध्यात्मिक परंपरा, सामाजिक समरसता और सामूहिक भक्ति का प्रतीक माना जाता है।
Priyanka Gaikwad30 जुल. 2026, 07:17 PM IST

आषाढ़ी वारी के समापन से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजनों में शामिल गोपाळकाला उत्सव इस वर्ष भी पंढरपुर के गोपाळपुर में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ। तड़के लगभग साढ़े तीन बजे श्रीकृष्ण मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की विशेष पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद मंदिर श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दिया गया, जहां हजारों वारकरियों ने भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन कर मंदिर की परिक्रमा की और अभंग-कीर्तन में भाग लिया। सुबह होते ही गोपाळपुर की गलियां वारकरियों की भक्ति से सराबोर हो गईं। दूर-दूर से आई सैकड़ों दिंडियां और संतों की पालकियां गोपाळपुर पहुंचने लगीं। पूरे मार्ग पर "ज्ञानबा-तुकाराम", "विठ्ठल-विठ्ठल" और "गोपाळकाला गोड झाला, गोपाळाने गोड केला" जैसे जयघोष लगातार गूंजते रहे। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन, टाल-मृदंग की ताल और अभंग गायन ने वातावरण को पूरी तरह भक्तिमय बना दिया।
समाचार के अनुसार, गोपाळपुर में लगभग 450 दिंडियों के पहुंचने की परंपरा निभाई गई। इनमें संत ज्ञानेश्वर महाराज, संत तुकाराम महाराज, संत नामदेव महाराज, संत एकनाथ महाराज, संत सोपानकाका, संत मुक्ताबाई, संत गोरोबा काका, संत निळोबाराय और अन्य संत परंपराओं से जुड़ी पालकियां भी शामिल रहीं। प्रत्येक पालखी का श्रद्धालुओं ने फूलों की वर्षा और जयघोष के साथ स्वागत किया। मानाची अंभळनेरकर महाराज की दिंडी ने भी गोपाळकाला उत्सव में विशेष आकर्षण का केंद्र बनी। परंपरा के अनुसार, यह दिंडी प्रातःकाल श्रीकृष्ण मंदिर पहुंची, जहां भजन-कीर्तन और सामूहिक आरती का आयोजन किया गया। इसके बाद संत गजानन महाराज की पालखी सहित अन्य प्रमुख पालकियां भी गोपाळपुर पहुंचीं। श्रद्धालुओं ने संतों के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
गोपाळकाला उत्सव भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और वारकरी संप्रदाय की सामूहिक भक्ति का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर दही, पोहा, चिवड़ा, फल, दाल और अन्य प्रसाद सामग्री को एक साथ मिलाकर पारंपरिक "गोपाळकाला" तैयार किया जाता है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित करने के बाद श्रद्धालुओं में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। यह परंपरा समाज में समानता, एकता और भाईचारे का संदेश देती है। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए स्थानीय प्रशासन, पुलिस और श्री विठ्ठल-रुक्मिणी मंदिर समिति ने सुरक्षा, यातायात, पेयजल, चिकित्सा और आपातकालीन सेवाओं की विशेष व्यवस्था की। पूरे आयोजन के दौरान पुलिस बल तैनात रहा और श्रद्धालुओं की आवाजाही को सुचारु रूप से संचालित किया गया।
हर वर्ष लाखों वारकरी महाराष्ट्र सहित देश के विभिन्न राज्यों से पैदल यात्रा कर भगवान विठ्ठल के दर्शन के लिए पंढरपुर पहुंचते हैं। आषाढ़ी वारी के बाद गोपाळपुर में आयोजित होने वाला गोपाळकाला उत्सव इस आध्यात्मिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की संत परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक समरसता का जीवंत प्रतीक है, जो पीढ़ियों से लोगों की आस्था को जोड़ता आ रहा है।
