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असम में बाढ़ का कहर: एक घंटे में नदी ने पूरा गांव निगला, सैकड़ों परिवार बेघर और हजारों मवेशी बहे

असम के शिवसागर जिले में डिखो नदी में आई भीषण बाढ़ ने महज एक घंटे के भीतर हिलोनी नेपाली खुती गांव को पूरी तरह तबाह कर दिया। लगभग 200 परिवारों के घर, आजीविका और करीब 4,000 मवेशी बाढ़ की चपेट में आ गए। यह घटना केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन, अनियमित मानसून और कमजोर बाढ़ प्रबंधन की गंभीर चुनौती को भी सामने लाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणाली, नदी प्रबंधन और आपदा तैयारियों को मजबूत करना बेहद जरूरी है।

Anshuman Mishra30 जुल. 2026, 07:18 PM IST
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असम में बाढ़ का कहर: एक घंटे में नदी ने पूरा गांव निगला, सैकड़ों परिवार बेघर और हजारों मवेशी बहे

असम में इस वर्ष मानसून ने एक बार फिर भारी तबाही मचाई है। शिवसागर जिले के डिखो (Dikhow) नदी किनारे बसे हिलोनी नेपाली खुती गांव का नाम अब बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की सबसे दर्दनाक घटनाओं में शामिल हो गया है। लगातार मूसलाधार बारिश के बाद नदी का जलस्तर अचानक इतना बढ़ा कि महज एक घंटे के भीतर पूरा गांव पानी की तेज धारा में समा गया। करीब 200 गोरखा परिवारों की बस्ती पूरी तरह तबाह हो गई। लोगों को अपनी जान बचाने तक का समय मुश्किल से मिला, जबकि घर, खेत, पशुधन और वर्षों की मेहनत देखते ही देखते बह गई।

क्या हुआ था उस दिन?
19 जुलाई को नागालैंड के ऊपरी कैचमेंट क्षेत्रों में लगातार हुई भारी बारिश के कारण डिखो नदी अचानक उफान पर आ गई। सामान्य दिनों में शांत रहने वाली नदी कुछ ही मिनटों में विकराल रूप धारण कर गई। स्थानीय लोगों के अनुसार वे हर साल आने वाली बाढ़ के आदी थे, लेकिन इस बार पानी इतनी तेजी से बढ़ा कि लोगों को अपना सामान तक निकालने का मौका नहीं मिला। कई परिवारों ने ऊंचे स्थानों पर शरण लेकर अपनी जान बचाई, जबकि राहत दलों को प्रभावित इलाकों तक पहुंचने में कई घंटे लग गए।

गांव की अर्थव्यवस्था पूरी तरह बर्बाद
यह गांव मुख्य रूप से डेयरी व्यवसाय पर निर्भर था। लगभग हर परिवार दूध उत्पादन और पशुपालन से अपनी आजीविका चलाता था। बाढ़ में लगभग 4,000 मवेशी बह गए, जो गांव की सबसे बड़ी आर्थिक संपत्ति थे। कई परिवारों की वर्षों की कमाई कुछ ही घंटों में समाप्त हो गई। स्थानीय निवासियों का कहना है कि प्रत्येक परिवार की मासिक आय लगभग 50 हजार रुपये तक थी, जो अब पूरी तरह खत्म हो चुकी है।

लोगों ने क्या बताया?
बाढ़ प्रभावित ग्रामीणों ने बताया कि पहले पानी धीरे-धीरे बढ़ता था, लेकिन इस बार नदी का बहाव इतना तेज था कि पूरा गांव कुछ ही समय में जलमग्न हो गया। कई ग्रामीणों ने अपने परिजनों, पशुओं और घरों को खो दिया। कुछ लोगों ने बताया कि उनकी दर्जनों गायें और भैंसें बह गईं, जबकि कई पड़ोसियों की मौत भी हुई। बचे हुए परिवार फिलहाल राहत शिविरों और सुरक्षित स्थानों पर रह रहे हैं।

असम में हर साल क्यों आती है इतनी भीषण बाढ़?
असम की भौगोलिक स्थिति इसे भारत के सबसे बाढ़ प्रभावित राज्यों में शामिल करती है।

मुख्य कारण हैं:
• ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों का विशाल जलग्रहण क्षेत्र
• अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मेघालय और भूटान के पहाड़ी इलाकों में भारी वर्षा
• नदियों में अत्यधिक गाद (सिल्ट) जमा होना
• नदी किनारों का लगातार कटाव (River Erosion)
• जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में वृद्धि

विशेषज्ञों के अनुसार असम में बाढ़ केवल पानी भरने की समस्या नहीं है, बल्कि नदी कटाव के कारण हर वर्ष हजारों हेक्टेयर जमीन और कई गांव स्थायी रूप से नक्शे से गायब हो जाते हैं।

यह घटना क्यों महत्वपूर्ण है?
यह हादसा केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन की बड़ी चुनौती को भी उजागर करता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अत्यधिक वर्षा, अचानक आने वाली बाढ़ (Flash Flood) और नदी कटाव की घटनाएं आने वाले वर्षों में और बढ़ सकती हैं। ऐसे में समय रहते चेतावनी प्रणाली, नदी प्रबंधन, मजबूत तटबंध और सुरक्षित पुनर्वास योजनाओं की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।

सरकार और राहत एजेंसियों की भूमिका
बाढ़ के बाद राज्य प्रशासन, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF), राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) और स्थानीय प्रशासन राहत एवं बचाव कार्यों में जुटे हैं। प्रभावित परिवारों को राहत शिविरों में भोजन, चिकित्सा सुविधा और अस्थायी आश्रय उपलब्ध कराया जा रहा है। साथ ही नुकसान का आकलन कर पुनर्वास और मुआवजे की प्रक्रिया भी शुरू की जा रही है।

भविष्य के लिए क्या सीख?
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल राहत कार्य पर्याप्त नहीं होंगे। भविष्य में ऐसी त्रासदियों को कम करने के लिए वैज्ञानिक नदी प्रबंधन, आधुनिक बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली, समय पर निकासी (Evacuation), जल निकासी परियोजनाओं और जलवायु अनुकूल विकास योजनाओं पर अधिक निवेश करना होगा। साथ ही नदी किनारे बसे संवेदनशील गांवों का सुरक्षित स्थानों पर पुनर्वास भी दीर्घकालिक समाधान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।

असम के हिलोनी नेपाली खुती गांव की यह त्रासदी दिखाती है कि प्राकृतिक आपदाएं अब पहले से अधिक तीव्र और विनाशकारी होती जा रही हैं। एक घंटे में पूरे गांव का उजड़ जाना केवल स्थानीय समुदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन, बाढ़ प्रबंधन और आपदा तैयारी को सर्वोच्च प्राथमिकता देना समय की मांग है।