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शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल: भारत के 1 लाख से अधिक स्कूलों में केवल एक शिक्षक

केंद्र सरकार द्वारा संसद में साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, भारत में 2025-26 के दौरान 1,00,843 स्कूल ऐसे हैं, जहां केवल एक शिक्षक पूरे विद्यालय का संचालन कर रहा है। आंध्र प्रदेश, झारखंड और महाराष्ट्र ऐसे राज्यों में शामिल हैं जहां सबसे अधिक एकल-शिक्षक स्कूल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षकों की कमी का सीधा असर छात्रों की पढ़ाई, सीखने की गुणवत्ता और नई शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन पर पड़ सकता है। यह स्थिति देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और रिक्त शिक्षक पदों को जल्द भरने की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

Anshuman Mishra30 जुल. 2026, 07:18 PM IST
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शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल: भारत के 1 लाख से अधिक स्कूलों में केवल एक शिक्षक
देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। केंद्र सरकार द्वारा संसद में साझा किए गए नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारत में एक लाख से अधिक सरकारी और निजी स्कूल ऐसे हैं, जहां पूरे विद्यालय की जिम्मेदारी केवल एक शिक्षक के कंधों पर है। यह स्थिति राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के लक्ष्यों और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के प्रयासों के सामने बड़ी चुनौती मानी जा रही है।

आंकड़ों के अनुसार देश में 2025-26 के दौरान कुल 1,00,843 एकल-शिक्षक (Single Teacher) स्कूल हैं। इनमें सबसे अधिक ऐसे स्कूल आंध्र प्रदेश में हैं, जबकि महाराष्ट्र भी इस सूची में प्रमुख राज्यों में शामिल है।

किन राज्यों में सबसे अधिक एकल-शिक्षक स्कूल?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार आंध्र प्रदेश में 16,357 स्कूल केवल एक शिक्षक के सहारे संचालित हो रहे हैं, जो देश में सबसे अधिक हैं।

इसके बाद प्रमुख राज्यों की स्थिति इस प्रकार है:
• आंध्र प्रदेश – 16,357
• झारखंड – 9,827
• महाराष्ट्र – 9,269
• कर्नाटक – 8,042
• उत्तर प्रदेश – 7,874
• राजस्थान – 7,200
• पश्चिम बंगाल – 6,769

वहीं तेलंगाना, तमिलनाडु, असम, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी हजारों ऐसे विद्यालय मौजूद हैं जहां एक ही शिक्षक पूरी व्यवस्था संभाल रहे हैं।

एकल-शिक्षक स्कूल क्या होते हैं?
एकल-शिक्षक स्कूल वे विद्यालय होते हैं जहां सभी कक्षाओं, सभी विषयों, विद्यार्थियों की उपस्थिति, प्रशासनिक कार्य, अभिभावकों से संवाद और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन जैसी सभी जिम्मेदारियां केवल एक शिक्षक निभाता है। ऐसी स्थिति में शिक्षक को एक साथ कई कक्षाओं को पढ़ाना पड़ता है, जिसे मल्टी-ग्रेड टीचिंग कहा जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार इसके कई कारण हैं:
• शिक्षकों के हजारों पद लंबे समय तक खाली रहना
• ग्रामीण, आदिवासी और दूरदराज क्षेत्रों में नियुक्ति की कमी
• सेवानिवृत्ति और तबादलों के बाद समय पर नई भर्ती न होना
• छात्र संख्या के आधार पर शिक्षकों का पुनर्वितरण
• दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षकों की तैनाती में कठिनाई

शिक्षा मंत्रालय का कहना है कि शिक्षक भर्ती और उनकी नियुक्ति का दायित्व मुख्य रूप से राज्य सरकारों का होता है।

इसका छात्रों पर क्या असर पड़ता है?
एक शिक्षक के पास सीमित समय होने के कारण प्रत्येक कक्षा और प्रत्येक छात्र को पर्याप्त ध्यान नहीं मिल पाता।

इसके परिणामस्वरूप:
• पढ़ाई की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
• विज्ञान, गणित और भाषा जैसे विषयों की अलग-अलग पढ़ाई कठिन हो जाती है।
• विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता प्रभावित होती है।
• ड्रॉपआउट दर बढ़ सकती है।
• नई शिक्षा नीति के तहत कौशल आधारित शिक्षा लागू करने में कठिनाई आती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती कक्षाओं में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण बच्चों की पूरी शैक्षणिक यात्रा की नींव तय करता है।

सरकार क्या कर रही है?
केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि शिक्षक भर्ती और नियुक्ति राज्य सरकारों का विषय है। हालांकि केंद्र, समग्र शिक्षा (Samagra Shiksha) योजना के माध्यम से राज्यों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराता है। सरकार ने राज्यों को नियमित शिक्षक भर्ती, पारदर्शी ट्रांसफर नीति, तकनीक आधारित शिक्षक योजना (Teacher Requirement Forecasting) और रिक्त पदों को शीघ्र भरने की सलाह दी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी प्रत्येक विद्यालय में पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता पर विशेष जोर दिया गया है।

यह खबर क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत दुनिया की सबसे बड़ी स्कूली शिक्षा प्रणाली वाला देश है। यदि लाखों बच्चे ऐसे स्कूलों में पढ़ रहे हैं जहां केवल एक शिक्षक उपलब्ध है, तो इसका सीधा असर देश की शिक्षा गुणवत्ता, सीखने के स्तर और भविष्य की कार्यशक्ति पर पड़ सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए केवल स्कूल भवन बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रशिक्षित और पर्याप्त संख्या में शिक्षकों की उपलब्धता भी उतनी ही आवश्यक है।

शिक्षा विशेषज्ञों का सुझाव है कि राज्यों को जल्द से जल्द रिक्त पद भरने, ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षकों को प्रोत्साहन देने, डिजिटल शिक्षा का बेहतर उपयोग करने और मल्टी-ग्रेड शिक्षण के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने चाहिए।

साथ ही नियमित शिक्षण मूल्यांकन और स्कूलों में शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात की निगरानी भी आवश्यक होगी। देश में एक लाख से अधिक स्कूलों का केवल एक शिक्षक के भरोसे चलना शिक्षा व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती है। यह केवल शिक्षकों की कमी का मुद्दा नहीं, बल्कि करोड़ों बच्चों के सीखने के अधिकार और देश के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। यदि समय रहते पर्याप्त भर्ती, बेहतर संसाधन और प्रभावी शिक्षा नीतियां लागू की जाती हैं, तो इस चुनौती को अवसर में बदला जा सकता है।