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परीक्षा नहीं, व्यवस्था की परीक्षा: भारत और चीन के एग्जाम मॉडल में कितना बड़ा अंतर?
भारत और चीन की सार्वजनिक परीक्षा प्रणालियों की तुलना की गई है। लेख के अनुसार, दोनों देशों में प्रतियोगी परीक्षाएं सामाजिक और आर्थिक उन्नति का प्रमुख माध्यम हैं, लेकिन भारत में परीक्षा प्रणाली लोकतांत्रिक बहस, पारदर्शिता और न्यायिक समीक्षा के दायरे में रहती है, जबकि चीन में इसे राज्य की प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक स्थिरता से जोड़कर देखा जाता है। भारत में हाल के वर्षों में NEET और अन्य परीक्षाओं को लेकर हुए विवादों ने पारदर्शिता, जवाबदेही और परीक्षा सुधार की मांग को तेज किया है।
Anshuman Mishra30 जुल. 2026, 07:18 PM IST

भारत और चीन दुनिया की दो सबसे बड़ी आबादी वाले देश हैं। दोनों देशों में प्रतियोगी परीक्षाएं लाखों-करोड़ों युवाओं के करियर का रास्ता तय करती हैं। लेकिन हाल के वर्षों में भारत में NEET, UGC-NET और अन्य परीक्षाओं में पेपर लीक तथा अनियमितताओं के आरोपों ने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं। इसी बीच चीन की परीक्षा प्रणाली और भारत की व्यवस्था की तुलना एक बार फिर चर्चा में है।
जहां भारत में परीक्षा प्रणाली लोकतांत्रिक बहस, न्यायिक समीक्षा और मीडिया की निगरानी के दायरे में रहती है, वहीं चीन में इसे सरकारी प्रशासन और राजनीतिक स्थिरता का अहम हिस्सा माना जाता है। यही वजह है कि दोनों देशों की परीक्षा व्यवस्था समान उद्देश्य होने के बावजूद अलग-अलग सिद्धांतों पर आधारित दिखाई देती है।
चीन की गाओकाओ परीक्षा क्या है?
चीन की राष्ट्रीय विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा 'गाओकाओ' (Gaokao) दुनिया की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षाओं में गिनी जाती है। हर वर्ष करीब 1.3 से 1.4 करोड़ छात्र इसमें शामिल होते हैं। यह परीक्षा छात्रों के लिए प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में प्रवेश का मुख्य आधार है।
गाओकाओ के दौरान चीन में अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था लागू की जाती है। परीक्षा केंद्रों के आसपास ड्रोन निगरानी, एआई आधारित चीटिंग डिटेक्शन, जैमर, ट्रैफिक नियंत्रण और सोशल मीडिया पर अफवाहों की निगरानी जैसी व्यवस्थाएं लागू रहती हैं। कई प्रांतों में निर्माण कार्य और तेज आवाज वाले कामों पर भी अस्थायी रोक लगा दी जाती है ताकि छात्रों को शांत वातावरण मिल सके।
भारत की परीक्षा व्यवस्था कैसे अलग है?
भारत में NEET, JEE, CUET, UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाएं पूरी तरह संवैधानिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत संचालित होती हैं। यदि किसी परीक्षा में अनियमितता की शिकायत आती है तो छात्र अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं, सरकार से जवाब मांग सकते हैं और मीडिया भी पूरे मामले की जांच-पड़ताल करता है।
हाल ही में NEET-UG परीक्षा को लेकर पेपर लीक और परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठे, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट तक सुनवाई हुई। इससे यह स्पष्ट हुआ कि भारत में परीक्षा प्रणाली केवल प्रशासनिक विषय नहीं बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही का भी हिस्सा है।
भारत और चीन की सबसे बड़ी समानता
दोनों देशों में प्रतियोगी परीक्षाएं सामाजिक और आर्थिक उन्नति का सबसे बड़ा माध्यम मानी जाती हैं। ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लाखों छात्र मानते हैं कि एक अच्छी परीक्षा उनके जीवन की दिशा बदल सकती है। इसी कारण परीक्षा को दोनों देशों में बेहद गंभीरता से लिया जाता है।
सबसे बड़ा अंतर क्या है?
विशेषज्ञों के अनुसार चीन की व्यवस्था में परीक्षा केवल शिक्षा का माध्यम नहीं बल्कि प्रशासनिक दक्षता और सरकारी व्यवस्था पर भरोसे का प्रतीक भी मानी जाती है। दूसरी ओर भारत में परीक्षा प्रणाली लोकतंत्र, पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही के साथ जुड़ी हुई है। यहां किसी भी विवाद पर न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक समाज सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
यह मुद्दा क्यों महत्वपूर्ण है?
परीक्षा व्यवस्था किसी भी देश की शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता तय करती है। यदि परीक्षाएं निष्पक्ष और पारदर्शी हों तो प्रतिभाशाली छात्रों को समान अवसर मिलता है। वहीं पेपर लीक, तकनीकी गड़बड़ी या अनियमितताओं से लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित हो सकता है। इसलिए भारत में लगातार परीक्षा सुधार, डिजिटल सुरक्षा, एआई आधारित निगरानी और मजबूत परीक्षा प्रबंधन प्रणाली की मांग बढ़ रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता बनाए रखते हुए तकनीकी सुरक्षा को और मजबूत करना होगा। साथ ही छात्रों का विश्वास बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। दूसरी ओर चीन का मॉडल सुरक्षा के लिहाज से मजबूत माना जाता है, लेकिन वहां पारदर्शिता और स्वतंत्र समीक्षा की सीमाओं को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।
भारत और चीन की परीक्षा प्रणालियों का अंतिम लक्ष्य प्रतिभा को आगे बढ़ाना है, लेकिन दोनों देशों का तरीका अलग है। भारत लोकतांत्रिक जवाबदेही और न्यायिक निगरानी पर भरोसा करता है, जबकि चीन प्रशासनिक नियंत्रण और सख्त अनुशासन को प्राथमिकता देता है। भविष्य में दोनों देशों के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऐसी परीक्षा प्रणाली विकसित करना होगी जो निष्पक्ष, पारदर्शी, सुरक्षित और छात्रों के विश्वास पर खरी उतर सके।
