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ब्रेस्ट कैंसर में समय के साथ बदली चिकित्सा, अब मरीज के हिसाब से होगा उपचार
ब्रेस्ट कैंसर दुनिया भर में महिलाओं में सबसे अधिक पाए जाने वाले कैंसरों में से एक है, लेकिन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान अब यह स्पष्ट कर रहा है कि हर ब्रेस्ट कैंसर एक जैसा नहीं होता। नई वैज्ञानिक रिसर्च के अनुसार, दो महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर की गांठ (Tumour) आकार, स्थान और बायोप्सी रिपोर्ट में लगभग एक जैसी दिखाई दे सकती है, लेकिन उनके भीतर मौजूद जैविक और आनुवंशिक (Genetic) विशेषताएं पूरी तरह अलग हो सकती हैं। यही कारण है कि दोनों मरीजों के लिए उपचार, दवाएं, सर्जरी की रणनीति और बीमारी के दोबारा लौटने का जोखिम भी अलग-अलग हो सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर के इलाज में अब केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि ट्यूमर कितना बड़ा है या किस स्टेज में है। आज के दौर में ट्यूमर की आणविक (Molecular) और जीन संबंधी प्रोफाइलिंग यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि मरीज को किस प्रकार का इलाज सबसे अधिक लाभ पहुंचाएगा। यही अवधारणा "प्रिसिजन मेडिसिन" या "व्यक्तिगत उपचार" (Personalised Medicine) की आधारशिला है। हाल ही में प्रकाशित शोध में वैज्ञानिकों ने बताया कि एक जैसे दिखाई देने वाले ब्रेस्ट कैंसर ट्यूमर के भीतर कोशिकाओं की संरचना, जीन की सक्रियता, प्रतिरक्षा कोशिकाओं की मौजूदगी और कैंसर के फैलने की क्षमता में महत्वपूर्ण अंतर हो सकता है। यही अंतर उपचार के परिणामों को भी प्रभावित करता है।
ब्रेस्ट कैंसर आखिर है क्या?
ब्रेस्ट कैंसर तब विकसित होता है जब स्तन की कुछ कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं और धीरे-धीरे एक गांठ का रूप ले लेती हैं। यदि समय पर इलाज न किया जाए तो ये कोशिकाएं शरीर के अन्य हिस्सों तक भी फैल सकती हैं, जिसे मेटास्टेटिक कैंसर कहा जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, ब्रेस्ट कैंसर दुनिया में महिलाओं में सबसे अधिक निदान किया जाने वाला कैंसर है। हर वर्ष लाखों नए मामले सामने आते हैं, लेकिन शुरुआती पहचान और आधुनिक उपचार से अधिकांश मरीजों के ठीक होने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
एक जैसी दिखने वाली गांठें अलग क्यों होती हैं?
डॉक्टर आमतौर पर मैमोग्राफी, अल्ट्रासाउंड, एमआरआई और बायोप्सी के जरिए ट्यूमर की जांच करते हैं। कई बार दो मरीजों की रिपोर्ट लगभग समान दिखाई देती है। लेकिन जब वैज्ञानिक उन ट्यूमर की जीन गतिविधि, प्रोटीन, डीएनए परिवर्तन और कोशिकाओं की सूक्ष्म संरचना का अध्ययन करते हैं, तो पता चलता है कि-
एक ट्यूमर तेजी से बढ़ने वाला हो सकता है, जबकि दूसरा अपेक्षाकृत धीमी गति से बढ़ता है।
एक ट्यूमर कीमोथेरेपी का अच्छा जवाब दे सकता है, जबकि दूसरा नहीं।
किसी मरीज में हार्मोन थेरेपी सबसे प्रभावी हो सकती है, जबकि दूसरे में टार्गेटेड थेरेपी की आवश्यकता हो सकती है।
कुछ ट्यूमर में कैंसर कोशिकाओं के आसपास प्रतिरक्षा कोशिकाएं अधिक होती हैं, जिससे इम्यूनोथेरेपी का लाभ मिल सकता है।
यही कारण है कि आधुनिक कैंसर उपचार अब "वन साइज फिट्स ऑल" मॉडल से आगे बढ़ चुका है।
ट्यूमर की आणविक प्रोफाइलिंग क्या होती है?
मॉलिक्यूलर प्रोफाइलिंग या जीनोमिक प्रोफाइलिंग वह प्रक्रिया है जिसमें कैंसर कोशिकाओं के डीएनए, आरएनए, प्रोटीन और अन्य जैविक संकेतकों का विस्तृत विश्लेषण किया जाता है।
इस जांच से डॉक्टर यह समझ पाते हैं कि—
कैंसर किस प्रकार का है।
कौन-सा जीन असामान्य रूप से सक्रिय है।
कौन-सी दवा सबसे अधिक प्रभावी होगी।
बीमारी दोबारा लौटने की कितनी संभावना है।
मरीज को कीमोथेरेपी की आवश्यकता है या नहीं।
विशेषज्ञों के अनुसार यह जांच अनावश्यक उपचार से बचाने में भी मदद करती है।
ब्रेस्ट कैंसर के प्रमुख प्रकार
ब्रेस्ट कैंसर केवल एक बीमारी नहीं है। इसे कई जैविक उपप्रकारों में बांटा जाता है-
Hormone Receptor Positive (HR+)
HER2 Positive
Triple Negative Breast Cancer (TNBC)
Luminal A
Luminal B
इन सभी प्रकारों का उपचार अलग-अलग हो सकता है। उदाहरण के लिए HER2 पॉजिटिव मरीजों को विशेष टार्गेटेड दवाएं दी जाती हैं, जबकि ट्रिपल नेगेटिव कैंसर में इम्यूनोथेरेपी या अन्य आधुनिक उपचार अधिक उपयोगी हो सकते हैं।
नई रिसर्च से क्या पता चला?
हालिया शोध में वैज्ञानिकों ने अत्याधुनिक तकनीकों की मदद से ब्रेस्ट कैंसर ट्यूमर का सूक्ष्म स्तर पर अध्ययन किया। शोध में पाया गया कि-
एक ही प्रकार के दिखने वाले ट्यूमर में भी कोशिकाओं की विविधता (Tumour Heterogeneity) काफी अलग हो सकती है।
कैंसर कोशिकाओं के आसपास मौजूद प्रतिरक्षा कोशिकाओं का व्यवहार अलग-अलग होता है।
ट्यूमर के भीतर मौजूद जीन गतिविधियां उपचार के प्रति प्रतिक्रिया को प्रभावित करती हैं।
एक मरीज में सफल रहने वाली दवा दूसरे मरीज पर उतनी प्रभावी नहीं हो सकती।
शोधकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), जीनोमिक्स और डिजिटल पैथोलॉजी के संयोजन से प्रत्येक मरीज के लिए अधिक सटीक उपचार योजना तैयार की जा सकेगी।
यह खोज क्यों महत्वपूर्ण है?
यह शोध कैंसर चिकित्सा में एक महत्वपूर्ण बदलाव की ओर संकेत करता है। पहले उपचार का निर्णय मुख्य रूप से ट्यूमर के आकार, स्टेज और माइक्रोस्कोपिक जांच पर आधारित होता था, लेकिन अब डॉक्टर ट्यूमर की "जैविक पहचान" को भी उतना ही महत्व दे रहे हैं। इससे-
मरीज को अधिक प्रभावी इलाज मिल सकता है।
अनावश्यक कीमोथेरेपी से बचा जा सकता है।
दुष्प्रभाव कम हो सकते हैं।
इलाज की सफलता बढ़ सकती है।
कैंसर दोबारा लौटने के जोखिम का बेहतर आकलन किया जा सकता है।
मरीज की जीवन गुणवत्ता बेहतर बनी रह सकती है।
मरीजों को इससे क्या लाभ होगा?
यदि अस्पतालों में जीनोमिक और मॉलिक्यूलर प्रोफाइलिंग का अधिक उपयोग होने लगे तो-
हर मरीज के लिए व्यक्तिगत उपचार योजना बनाई जा सकेगी।
सही दवा चुनने में आसानी होगी।
उपचार पर खर्च अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकेगा।
उपचार की सफलता दर बढ़ सकती है।
अनावश्यक दवाओं और प्रक्रियाओं से बचा जा सकेगा।
कैंसर की पुनरावृत्ति की संभावना का पहले से अनुमान लगाया जा सकेगा।
भारत के लिए इसका क्या महत्व है?
भारत में हर वर्ष लाखों महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का निदान होता है। कई मामलों में बीमारी देर से पकड़ में आती है, जिससे उपचार कठिन हो जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़े कैंसर केंद्रों के साथ-साथ क्षेत्रीय अस्पतालों में भी मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स और जीन प्रोफाइलिंग जैसी सुविधाओं का विस्तार किया जाए, तो मरीजों को अधिक सटीक और प्रभावी उपचार मिल सकेगा। हालांकि विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि ऐसी उन्नत जांच सभी मरीजों के लिए आवश्यक नहीं होती। किस मरीज को कौन-सी जांच करानी है, इसका निर्णय कैंसर विशेषज्ञ (ऑन्कोलॉजिस्ट) मरीज की स्थिति, कैंसर के प्रकार और उपचार योजना के आधार पर करते हैं।
विशेषज्ञों की सलाह
ऑन्कोलॉजिस्ट का कहना है कि महिलाओं को स्तन में किसी भी गांठ, त्वचा में बदलाव, निप्पल से असामान्य स्राव या लगातार दर्द को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। शुरुआती जांच, बायोप्सी और विशेषज्ञ से परामर्श उपचार की सफलता बढ़ाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार भविष्य का कैंसर उपचार "एक बीमारी–एक इलाज" की बजाय "हर मरीज के लिए अलग उपचार" के सिद्धांत पर आधारित होगा। नई रिसर्च इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है, जो यह समझने में मदद करती है कि एक जैसी दिखने वाली दो ब्रेस्ट कैंसर की गांठें भी जैविक रूप से पूरी तरह अलग हो सकती हैं और इसलिए उनका इलाज भी अलग होना चाहिए।
