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भारत में मृत जन्म के आधे मामले यूपी-बिहार से, मातृ स्वास्थ्य पर गंभीर सवाल

भारत में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को लेकर एक नई विश्लेषणात्मक रिपोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023 में देश में अनुमानित 5.65 लाख स्टिलबर्थ (मृत जन्म) दर्ज हुए, जिनमें लगभग आधे मामले केवल उत्तर प्रदेश और बिहार से सामने आए। यह स्थिति न केवल इन दोनों राज्यों में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियों को उजागर करती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि समय पर प्रसवपूर्व देखभाल, संस्थागत प्रसव, उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की पहचान और आपातकालीन प्रसूति सेवाओं को और मजबूत करने की आवश्यकता है।

Vindhya Dubey30 जुल. 2026, 07:18 PM IST
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भारत में मृत जन्म के आधे मामले यूपी-बिहार से, मातृ स्वास्थ्य पर गंभीर सवाल



विशेषज्ञों का मानना है कि स्टिलबर्थ केवल एक चिकित्सा समस्या नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं से जुड़ा एक जटिल मुद्दा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, यदि गर्भावस्था के 28 सप्ताह या उससे अधिक समय के बाद शिशु में जन्म के समय जीवन के कोई संकेत नहीं मिलते, तो उसे स्टिलबर्थ कहा जाता है।

क्या कहती है नई रिपोर्ट?

द लैंसेट से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किए गए विश्लेषण के अनुसार भारत में वर्ष 2023 के दौरान लगभग 5.65 लाख स्टिलबर्थ होने का अनुमान लगाया गया। इनमें उत्तर प्रदेश और बिहार की संयुक्त हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत रही। शोधकर्ताओं ने कहा कि इन राज्यों की बड़ी आबादी, अधिक जन्म दर और मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की असमान उपलब्धता इस स्थिति के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। रिपोर्ट में स्टिलबर्थ की बेहतर निगरानी, सही रिपोर्टिंग और गर्भवती महिलाओं तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने पर विशेष जोर दिया गया है। 

स्टिलबर्थ क्या होता है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, यदि गर्भावस्था के 28 सप्ताह या उससे अधिक समय के बाद बच्चा जन्म के समय सांस नहीं ले रहा हो, उसकी धड़कन न हो और उसमें जीवन के कोई संकेत न हों, तो उसे स्टिलबर्थ कहा जाता है। यह गर्भपात (Miscarriage) से अलग स्थिति है, क्योंकि गर्भपात सामान्यतः गर्भावस्था के शुरुआती चरण में होता है जबकि स्टिलबर्थ गर्भावस्था के अंतिम चरण में होता है। 

भारत में स्टिलबर्थ क्यों चिंता का विषय है?

विशेषज्ञों का कहना है कि स्टिलबर्थ के अधिकांश मामलों को समय पर पहचान और उचित चिकित्सा देखभाल से रोका जा सकता है। इसके बावजूद भारत में अभी भी कई क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं को नियमित एंटीनटल चेकअप, अल्ट्रासाउंड, एनीमिया की जांच, पोषण सहायता और विशेषज्ञ डॉक्टरों तक समय पर पहुंच नहीं मिल पाती। एक पूर्व शोध में यह भी पाया गया कि राष्ट्रीय स्तर पर स्टिलबर्थ की वास्तविक संख्या सरकारी आंकड़ों से अधिक हो सकती है, क्योंकि रिपोर्टिंग और पंजीकरण में कई राज्यों में कमी पाई गई है। इससे नीति निर्माण और संसाधनों की योजना प्रभावित होती है। 

उत्तर प्रदेश और बिहार में अधिक मामले क्यों?

विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं-

  • दोनों राज्यों की आबादी और जन्म दर देश में सबसे अधिक है।

  • ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण मातृ स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच।

  • गर्भवती महिलाओं में एनीमिया और कुपोषण की उच्च दर।

  • उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की समय पर पहचान न होना।

  • प्रसवपूर्व जांच (ANC) का अधूरा रह जाना।

  • संस्थागत प्रसव की असमान उपलब्धता।

  • समय पर रेफरल और आपातकालीन प्रसूति सेवाओं की कमी।

  • सामाजिक और आर्थिक असमानताएं।

विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि सभी स्टिलबर्थ केवल स्वास्थ्य प्रणाली की विफलता के कारण नहीं होते। कुछ मामलों में जन्मजात विकार, प्लेसेंटा की समस्याएं, गर्भावस्था के दौरान संक्रमण, उच्च रक्तचाप, मधुमेह या अन्य जटिल चिकित्सीय कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं। 

स्टिलबर्थ के प्रमुख जोखिम कारक

चिकित्सकीय अध्ययनों के अनुसार निम्न परिस्थितियों में स्टिलबर्थ का खतरा बढ़ सकता है-

  • गर्भावस्था में गंभीर एनीमिया

  • उच्च रक्तचाप या प्री-एक्लेम्प्सिया

  • गर्भकालीन मधुमेह

  • प्लेसेंटा से जुड़ी समस्याएं

  • गर्भ में संक्रमण

  • समय से पहले झिल्ली फटना

  • धूम्रपान या तंबाकू का सेवन

  • पर्याप्त पोषण का अभाव

  • नियमित प्रसवपूर्व जांच न कराना

  • प्रसव में अत्यधिक देरी

समय पर देखभाल से कैसे रोके जा सकते हैं कई मामले?

विशेषज्ञों का कहना है कि बड़ी संख्या में स्टिलबर्थ मामलों को निम्न उपायों से कम किया जा सकता है—

  • गर्भावस्था के दौरान नियमित ANC जांच।

  • प्रत्येक गर्भवती महिला का समय पर अल्ट्रासाउंड।

  • एनीमिया की पहचान और आयरन-फोलिक एसिड की पर्याप्त उपलब्धता।

  • उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था की प्रारंभिक पहचान।

  • प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की निगरानी में संस्थागत प्रसव।

  • आपातकालीन प्रसूति सेवाओं की उपलब्धता।

  • भ्रूण की गतिविधियों में कमी होने पर तत्काल चिकित्सकीय जांच।

  • समय पर रेफरल प्रणाली।

यह रिपोर्ट क्यों महत्वपूर्ण है?

यह विश्लेषण केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं है बल्कि देश की मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य प्रणाली की वास्तविक स्थिति को सामने लाता है। यदि किसी राज्य में स्टिलबर्थ की संख्या अधिक है तो इसका अर्थ है कि वहां गर्भवती महिलाओं तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच, पोषण, स्क्रीनिंग, प्रसव प्रबंधन या आपातकालीन देखभाल में सुधार की आवश्यकता हो सकती है। इस प्रकार के आंकड़े सरकारों को उन जिलों और क्षेत्रों की पहचान करने में मदद करते हैं जहां अतिरिक्त डॉक्टर, नर्स, विशेषज्ञ, एम्बुलेंस, ब्लड बैंक और मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रमों की जरूरत है।

बेहतर निगरानी से क्या लाभ होंगे?

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि स्टिलबर्थ की सही रिपोर्टिंग और निगरानी की जाए तो—

  • उच्च जोखिम वाले जिलों की पहचान आसान होगी।

  • मातृ मृत्यु और नवजात मृत्यु दोनों में कमी लाई जा सकेगी।

  • गर्भवती महिलाओं तक समय पर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचेंगी।

  • स्वास्थ्य योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन होगा।

  • संसाधनों का वैज्ञानिक तरीके से वितरण संभव होगा।

  • सतत विकास लक्ष्य (SDG-3) हासिल करने में मदद मिलेगी।

  • मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रमों की प्रभावशीलता बढ़ेगी।

भारत की वर्तमान चुनौती

भारत ने पिछले वर्षों में संस्थागत प्रसव, मातृ मृत्यु दर और नवजात मृत्यु दर कम करने में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन स्टिलबर्थ अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।  शोधकर्ताओं का कहना है कि केवल मामलों की संख्या कम करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी सटीक गणना, प्रत्येक मामले की चिकित्सकीय समीक्षा और कारणों का विश्लेषण भी उतना ही जरूरी है। इससे भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सकेगा।


सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब केवल सुरक्षित प्रसव पर ही नहीं, बल्कि "स्वस्थ गर्भावस्था से स्वस्थ जन्म" की पूरी श्रृंखला पर ध्यान देना होगा। नियमित जांच, पोषण, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता, समय पर रेफरल, आधुनिक प्रसूति सुविधाएं और प्रत्येक स्टिलबर्थ की अनिवार्य समीक्षा भविष्य में हजारों परिवारों को इस दुखद स्थिति से बचा सकती है। साथ ही, स्टिलबर्थ की सही रिपोर्टिंग और डेटा संग्रह को मजबूत करना भी उतना ही आवश्यक है, ताकि नीति निर्माण वास्तविक स्थिति के अनुरूप किया जा सके।