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संघर्ष से स्वर्ण तक! त्रिपुरा की बेटी अस्मिता डे ने रचा इतिहास, कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत को दिलाया पहला जूडो गोल्ड

छोटे से गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंची अस्मिता डे ने अपने संघर्ष को जीत में बदल दिया। पिता के निधन के महज सात महीने बाद 23 वर्षीय जूडो खिलाड़ी ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के लिए जूडो का पहला स्वर्ण पदक जीतकर करोड़ों भारतीयों को गर्व का पल दिया।

Sonali01 अग. 2026, 02:43 PM IST
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संघर्ष से स्वर्ण तक! त्रिपुरा की बेटी अस्मिता डे ने रचा इतिहास, कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत को दिलाया पहला जूडो गोल्ड
ग्लासगो (Glasgow) में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत की जूडो खिलाड़ी अस्मिता डे ने इतिहास रच दिया। त्रिपुरा की 23 वर्षीय खिलाड़ी ने महिला 48 किलोग्राम वर्ग के फाइनल में कनाडा की हेइडी क्वाच को रोमांचक मुकाबले में हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इसके साथ ही अस्मिता डे कॉमनवेल्थ गेम्स में जूडो में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गई हैं। फाइनल मुकाबला बेहद कड़ा रहा और गोल्डन स्कोर तक पहुंचा। अस्मिता ने दबाव के बीच शानदार तकनीक और धैर्य का प्रदर्शन करते हुए मुकाबला अपने नाम किया। उनकी इस जीत ने भारतीय जूडो के इतिहास में नया अध्याय जोड़ दिया।

असमिता की यह सफलता केवल खेल उपलब्धि नहीं, बल्कि संघर्ष और हौसले की मिसाल भी है। उनके पिता का करीब सात महीने पहले ब्रेन स्ट्रोक के कारण निधन हो गया था। इस कठिन दौर के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार मेहनत जारी रखी। स्वर्ण पदक जीतने के बाद अस्मिता भावुक हो गईं और उन्होंने यह उपलब्धि अपने दिवंगत पिता, कोच और उन सभी लोगों को समर्पित की जिन्होंने कठिन समय में उनका साथ दिया।

त्रिपुरा के एक छोटे से गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने वाली अस्मिता डे की कहानी युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बन गई है। उन्होंने सीमित संसाधनों और व्यक्तिगत कठिनाइयों के बावजूद अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखा और देश को ऐतिहासिक सफलता दिलाई। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय जूडो दल के लिए यह दिन बेहद यादगार रहा। अस्मिता डे के स्वर्ण पदक ने भारत के पदक अभियान को नई गति दी और देशभर से उन्हें बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि यह जीत भारत में जूडो को नई पहचान और नई पीढ़ी के खिलाड़ियों को प्रेरणा देगी।